शिव पुराण एक समीक्षात्मक अध्ययन इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डी० फिल० की उपाधि हेतु प्रस्तुत
शोध-निर्देशक शोध-कर्ता डॉ० उमाकान्त यादव राजेश कुमार रीडर, संस्कृत-विभाग संस्कृत-विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद
फरर 2003
प्रमाण-पत्र
प्रमाणित किया जाता है कि राजेश कुमार ने मेरे निर्देशन में “शिव पुराण एक समीक्षात्मक अध्ययन '' विषय पर शोध कार्य सम्पन्न किया है। यह शोध- प्रबन्ध शोध-छात्र के मौलिक परिश्रय का परिणाम है एवं संस्कृत विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद (उ० प्रर) की डी० फिल्० की शोध-उपाधि हेतु मूल्याङ्कन योग्य है।
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स्थान : इलाहाबाद ( डॉ० उमाकान्त यादव )
दिनाङ्क : 5म्फघे,०3 शोध-निदेशक संस्कृत विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद
प्राक्कथन
प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध ` शिव पुराण एक समीक्षात्मक अध्ययन'' को विद्ठत्-समाज के समक्ष प्रस्तुत करते हुए आज अत्यन्त हर्ष एवं गौरव का अनुभव हो रहा हे | पुराणों पर अनुसंधान करने की मेरी बलवती इच्छा विद्यार्थी जीवन में ही जागृत हुई थी। यह एक संयोग
को बात है कि समय आने पर मुझे शिव पुराण पर अनुसंधान करने का अवसर मिला।
धार्मिक साहित्य में लोक-प्रियता की दृष्टि से विशिष्टता को प्राप्त पुराणों का मुख्य उद्देश्य प्राचीन युगों की घटनाओं और परम्परागत ऐतिहासिक कथाओं को सरल तथा मनोरंजक शैली में बर्णन करना रहा है, जिससे साधारण जन उसे सुनकर, अपनी बुद्धि तथा स्थिति के अनुकूल लाभ उठा सकें। पुराणों के लक्षण, सर्ग-प्रतिसर्ग आदि जटिल एवं विवादग्रस्त विषयों के साथ, देवासुर-संग्राम आदि अनेक मनोरंजक कहानियों को जोड़कर तथा पुराण में मानव जीवन के उच्चादर्शों को प्रस्तुत करने का अथक प्रयास किया गया है। मानव-मस्िष्क को ऐसी कोई भी कल्पना अथवा योजना नहीं है, जिसका निरूपण पुराणों में न हुआ हो।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत-विभाग में रीडर पद पर अभिषिक्त सम्मान्य गुरुवर्य डॉ० उमाकान्त यादव जी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ, जिन्होंने मुझे इस विषय पर शोध-कार्य करने के लिए मूलतः प्रेरित किया है और जिनके चरणोंमेंबैठकर मुझे प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। संस्कृत-विभाग के अन्य गुरुजनों में प्रो० चन्द्र भूषण मिश्र, प्रो० मृदुला त्रिपाठी, प्रो? राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ० राम किशोर शास्त्री, डॉ० मंजुला जायसवाल का भी मैं आभारी हूँ जिन्होंने समय-समय पर मुझे शोध सम्बन्धित अनेक सुझाव प्रदान किये हैं। मैं आभारी हूँ श्रद्धेय प्रो, हरीलाल वर्मा, अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग, का० सु० साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या, फैजाबाद का जिनके चरणों को शीतल स्नेहिल छाया में बैठकर ज्ञानार्जन का अवसर मिला।
मैं उन सभी भारतीय एवं पाश्चात्त्य विद्वानों एवं मनीषियों के प्रति विशेष रूप से कृतज्ञ हूँ, जिनके गौरवशाली, विपुलज्ञानसम्पदापूर्ण ग्रन्थों तथा विचारों का अनुशीलन करने का मुझे सौभाग्य एवं शुभावसर प्राप्त हुआ। उन वैदुष्यपूर्ण विद्वान् मनीषियों के चरणकमलों में श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ ।
अपने पूज्य पिताजी श्री सती प्रसाद वर्मा एवं पूजनीया माताजी श्रीमती सुभद्रा वर्मा के सतत् संरक्षण, कृपा एवं अशीर्वाद से ही मैं यह ज्ञानयज्ञ पूर्ण कर सका हूँ। उनके प्रभूत आशीर्वाद की कामना निरन्तर करता हूँ। अपने अनुज विनय कुमार वर्मा के महत्त्वपूर्ण सहयोग के लिए मैं उन्हें अपना धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।
अपने सहयोगियों एवं शुभेच्छकों में स्वर्गीय आदित्य कुमार, श्री देव कुमार यादव, श्री दिनेश सिंह यादव, श्री राम अचल पाल, श्री राजेश यादव, श्री महेन्द्र कुमार, श्री आलोक श्रीवास्तव, श्री हरिंशंकर, श्री विजयपाल वर्मा के प्रति भी मैं अपना आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने यथावसर पुस्तकों एवं विचार विनमय द्वारा मेरे शोध-प्रबन्ध को सम्पुटित करने में सहयोग प्रदान किया है।
श्री ओम प्रकाश वर्मा, पत्राचार विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद के प्रति भी मैं कृतज्ञ हूँ जिनके कहने पर “चन्द्रा प्रिंटिंग वर्क्स' के श्री अजय साहू ने अत्यन्त सावधानी पूर्वक मेरे शोध-प्रबन्ध का टंकण कार्य सम्पन्न किया है।
अन्त में पुनः अपने पूज्य गुरुवर डॉ० उमाकान्त यादव जी के प्रति नतमस्तक होकर अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मुझे प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध को मूल प्रेरणा प्रदान को ।
7०४ amos संस्कृत-विभाग (राजेश कुमार) इलाहाबाद, विश्वविद्यालय, इलाहाबाद शोध-करता
20 फरवरी, 2003
अनुक्रमणिका
प्रस्तावना
1.
2.
कट
4.
'पुराण' शब्द की निष्पत्ति पुराणों का आविर्भाव पुराणों का रचना-काल पुराण-लक्षण
. पुराणों का प्रतिपाद्य विषय पुराणों की संख्या
शिव पुराण का महत्त्व
शिव पुराण का काल
शिव पुराण की कथावस्तु
1. विद्येश्वर-संहिता
2. रुद्र-संहिता
3.
4
शतरुद्र-संहिता . कोटिरुद्र-संहिता
प्रथम : अध्याय
द्वितीय : अध्याय
5. उमा-संहिता 46
6. केलास-संहिता 48
7. वायवीय-संहिता 49 तृतीय : अध्याय
शिव पुराण के प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण 53-99
1. भगवान् शिव 53
2. सती 61
3. पार्वती 67
4. कुमार कार्तिकेय 74
5. गणेश प्र
6. ब्रह्मा 81
7. भगवान् विष्णु 87
8. शंखचूड 93
9. तारकासुर % चतुर्थं : अध्याय
शिव पुराण की धार्मिक अवधारणा 100-166
1. शिव-आराधना 102
2. लिङ्ग-पूजा 105
द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग
शिव आराधना के प्रमुख उपादान शैव-ब्रत
वर्णाश्रम- धर्म
शिव के विभिन्न अवतार
पंचम : अध्याय
शिव पुराण में अन्तर्निहित दार्शनिक तत्त्व
1.
2
3
शिव पुराण एवं शैव दर्शन परमात्म-शिव
शक्ति
. आत्म-तत्त्व
- अजन्य-तत्त्व—
(1) सदाशिव-तत्त्व
(11) इश्वर-तत्त्व
(11) सद्विद्या-तत्त्व
(1५) माया और पंचकंचुक
(५) बुद्धि आदि त्रिविंशति तत्त्व
(४1) षट्विंश तत्त्वों का वर्गीकरण
6. पाश (बन्धन) और मुक्ति
107
122
167-259
167
1/1
191
199
20/
20/
208
210
211
215
216
218
7. शक्तिपात एवं दीक्षा 227
8. योग 239
9. सर्ग-प्रतिसर्ग 255 षष्ठ : अध्याय
शिव पुराण का साहित्यिक अनुशीलन 260-321
1. रस-विधान 262
2. अलङ्कार-निरूपण 303
3. छन्दोयोजना 312
4. भाषा-शैली 314 सप्तम : अध्याय
शिव पुराण में लोक-चित्रण 322-340
1. सदाचार-सम्बन्धी ज्ञान 322
2. नारी-स्थिति एवं शिक्षा 327
3. लोकाचार 329
4. आभिचारिक क्रियायें 331
5. विवाह 334
6. दान का माहात्म्य 335
7. ललित कलायें 337
8. संस्कृति
9. समन्वय को भावना
अष्टम : अध्याय
शिव पुराण में अन्यान्य वर्णन
1.
2.
प्राकृतिक वर्णन हिमालय वर्णन सात द्वीपों का वर्णन
समाधि वर्णन
. युद्ध वर्णन
. अमूर्त भावों का मानवीकरण
नवम : अध्याय
परवर्ती कृतियो में शिव पुराण की उपजीव्यता
उपसंहार परिशिष्ट
दशम : अध्याय
सहायक ग्रन्थ सूची
संकेताक्षर सूची
338
341-374
341
345
348
349
3/2
375-386
387-392
393-400
393
490
प्रथम अध्याय
प्रस्तावना
1. 'पुराण' शब्द को निष्पत्ति 2. पुराणों का आविर्भाव
3. पुराणों का रचना-काल 4. पुराण-लक्षण
5. पुराणों का प्रतिपाद्य विषय 6. पुराणों को संख्या
7. शिव पुराण का महत्त्व
8. शिव पुराण का काल
प्रस्तावना
प्राचीन भारतीय साहित्य में पुराणों का एक विशेष स्थान है। इनमें भारतीय संस्कृति और धर्म के मूल तत्त्वों का लोकोपयोगी रूप में संकलन किया गया है । वास्तव में पुराणों की रचना का मूल उद्देश्य धर्म और अध्यात्म के गूढ़ तत्त्वों को सामान्य जनता के लिए सरल भाषा और सुगम शैली में उपस्थित करना था। वेद और उपनिषदों का ज्ञान मेधा-सम्पन्न विद्वानों तक सीमित रहा हे और उसे प्राप्त करने के लिए वर्षों तक सुयोग्य आचार्यों के चरणों में बैठकर परिश्रमपूर्वक अध्ययन करना अनिवार्य था। फिर भी सभी इस गूढ़ धर्म और अध्यात्म को समझने में समर्थ नहीं होते थे। इस कठिन समस्या को हल करने के लिए पुराणों का प्रणयन हुआ, जिनमें एक नवीन साहित्यिक शैली का अवलम्बन करके रोचक कथाओं, प्रभावशाली दृष्टान्तों और कवित्वमय वर्णनों के रूप में वेदों और उपनिषदों के गहन सिद्धान्तों को उपस्थित करके उनको सर्व साधारण के लिए बोधगम्य बना दिया गया। इसी का यह परिणाम हुआ कि सामान्य बुद्धि और प्रतिभा के व्यक्ति भी धर्म के उच्च सिंद्धान्तों को हृदयङ्गम करके अपने जीवन में नीति, सदाचार, परोपकार, उदारता आदि देव-दुर्लभ गुणों को चरितार्थ कर सके। जन-समूह में सामान्य बुद्धि के लोगों की अधिकता सदा से रही है और उनको समझाने के लिए अति-प्राचीन काल से कथा, कहानी, दृष्टान्त, रूपक, अलंकार आदि का प्रयोग होता आया है। इसी तथ्य को प्रकट करने के लिए “पद्म पुराण' में कहा गया है कि ब्रह्मा ने समस्त शास्त्रों से पहले पुराणों का स्मरण किया। ये संसार में सर्वश्रेष्ठ ज्ञान के उत्पादक एवं प्रचारक हैं --
'पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतय् । उत्तम सर्वलोकानां सर्वज्चानोप देशकम्॥'
अथर्ववेद में कहा गया है कि ऋक्, यजु, साम और अथर्ववेद के साथ ब्रह्मा ने पुराणों
(1)
का भी आविर्भाव किया।! छान्दोग्य उपनिषद् में पुराणों को पंचम वेद कहा गया है 2 भागवत पुराण में भी इसे पंचम वेद को संज्ञा प्रदान करते हुए ईश्वर के सहस्रमुखों से रचित बताया गया है -- “इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वर:। सर्वेभ्य एवं वक्त्रेभ्यः सयजे सर्वदर्शन: ॥'
पुराण भारतीय संस्कृति के भण्डागार हैं। इनमें भारत की सत्य और शाश्वत् आत्मा निहित है। ये भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के मेरूदण्ड हैं। इनके गम्भीर अध्ययन के बिना भारत के अतीत का ज्ञान अपूर्ण ही रह जाता है; साथ ही भारतीय जीवन का दृष्टिकोण भी पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं हो सकता | मनुष्य के गन्तव्य और पाथेय का ज्ञान नहीं हो सकता। इनमें आध्यात्मिक, आधिदैविक और अधिभौतिक सभी विद्याओं का विशद वर्णन है। लोक जीवन के सभी पक्ष इनमें भली-भाँति प्रतिपादित हैं। संसार में ऐसा कोई ज्ञान-विज्ञान नहीं, मानव मस्तिष्क की कोई ऐसी कल्पना एवं योजना नहीं, मनुष्य-जीवन का ऐसा कोई अंग नहीं, जिसका निरूपण पुराणों में न हुआ हो, जिन विषयों को अन्य माध्यमों से समझने में बहुत कठिनाई होती है, वे बडे रोचक ढंग से, सरल भाषा द्वारा आख्यान आदि के रूप में इनमें वर्णित हुए है |
धार्मिक दृष्टि से पुराणों का अत्यधिक महत्त्व है। ये सनातन धर्म के प्राण हैं। सनातन धर्म इनको वेदों के तुल्य आप्त और प्रामाणिक मानता है। ' वायु पुराण” के अनुसार पुराणों में बहुत से धर्मों का निरूपण हुआ है। यहाँ रागी, विरागी, यती, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, स्त्री, शूद्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा अन्यान्य संकर जातियों द्वारा विधेय धर्मों का वर्णन है
1. अथर्ववेद - 11 :7 : 24 2. ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि सामवेदमाथर्वणमितिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेदम् - छान्दोग्योपनिषद्
(2)
गङ्गा आदि महान् नदियां एवं विविध प्रकार के यज्ञो, तपों एवं ब्रतों के नियम इनमें वर्णित है । अनेक प्रकार के दान एवं नियम, योग-धर्म, सांख्य-धर्म, भागवत-धर्म, भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, वैराग्यमार्ग विविध उपासना, चित्त की संशुद्धि आदि का विधि-सहित वर्णन किया गया है | ब्राह्मण, शैव, वैष्णव, सौर, शाक्त, आर्हत, षड्दर्शन आदि विविध विषयों का विवेचन भी पुराणों में किया गया है।! इसी से मिलती-जुलती सूची भागवत महापुराण, विष्णु महापुराण आदि में भी दी गयी है। दया, क्षमा, उदारता, परोपकार, सज्जनता, आपत्तियों का सहन, वीरता, धैर्य, धर्मनिष्ठा, सत्य का पालन आदि का जैसा सजीव और सहज वर्णन पौराणिक उपाख्यानों में उपलब्ध है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। स्वार्थ को त्यागकर पारमार्थिक जीवन व्यतीत करने की, गृहस्थी और परिवार के उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए भी उच्च से उच्च त्यागमय जीवन व्यतीत करने की, नीच से नीच अवस्था में पहुँच जाने पर भी आन्तरिक निष्ठा और साधन के बल पर पुनः सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित होने की जैसी प्रेरणायें पुराणों में मिलती हैं वे निःसन्देह अनुपम हैं । सामान्य बुद्धि के पुरुष भी, जो वेद, उपनिषद् एवं स्मृतियों के गूढ़ तत्त्वों के रहस्य को समझ सकने में असमर्थ हैं, पुराणों के द्वारा धर्म के मूल सिद्धान्तों और तदनुसार आचरण के नियमों को जानने में समर्थ हो सकते हैं। बिन्टरनित्ज ने धार्मिक इतिहास की दृष्टि से पुराणों को अगणित मूल्य का बताया है -- “धार्मिक इतिहास को दृष्टि से पुराण अगणित मूल्य के हैं और केवल इसी विषय के लिए ही इनका अध्ययन अब अपेक्षाकृत अधिक ध्यानपूर्वक होना चाहिए। हिन्दू धर्म के सभी अङ्गों और रूपों में अन्तर्दृष्ट के लिए अन्य ग्रन्थों की अपेक्षा इनके द्वारा कहीं अधिक सहायता मिलती है।''2
दार्शनिक दृष्टि से भी पुराणों की उपादेयता स्वयं सिद्ध है। पुराणों में विभिन्न भारतीय दार्शनिक विधाओं का परिचय मिलता है। उनमें अन्तर्निहित तत्त्वमीमांसीय एवं ज्ञानमीमांसीय
1. वायु पुराण - 104 : 1-17 2. विन्टरनित्ज, ए हिस्ट्री आफ इंडियन लिटरेचर, भाग 10, पृष्ठ 529
{ 3)
तत्त्वों का विवेचन सहज ढंग के किया गया है। विभिन्न पुराणों में ही पुराण के पाँच लक्षण - सृष्टि, प्रलय, राजवंश, मन्वन्तर, और वंशानुचरित प्रतिपादित किये गये हैं।! उनमें सृष्टि और प्रलय दार्शनिक विवेचन के विषय हैं । इसके साथ ही भौतिक सृष्टि, चेतन सृष्टि, स्थिति, पालन, कर्म और वासना का वर्णन, प्रलय और मोक्ष का निरूपण आदि भी पुराणों में वर्ण्य विषय के रूप में निहित है -
'सुष्टिचापि विसृष्टिश्च स्थितिस्तेषां च पालनम् । कर्मणां वासना वार्ता चामूनां च क्रमेण च।। वर्णनं प्रलयानां च मोक्षस्य च निरूपणम् ।
उत्कीर्तन हरेरेव देवानां च पथक् पृथक् ॥'
यद्यपि भक्ति के दर्शन का विस्तृत विवेचन पुराणों में अन्तर्निहित है, फिर भी उसमें सांख्य दर्शन, योग दर्शन, शैव दर्शन, शाक्त दर्शन, वैष्णव दर्शन, तन्त्र एवं वेदान्त आदि दर्शनों का भी सम्यक् विवेचन है।
पुराणों का ऐतिहासिक महत्त्व धार्मिक महत्त्व को अपेक्षा कम नहीं है। पुराणों को दृष्टि ही भारतवर्ष के मनीषियों के विचार से सत्य इतिहास की पोषिका है। कलिवंशीय राजाओं का सच्चा वर्णन हमें पुराणों में ही उपलब्ध होता है, जिसको पुष्टि आधुनिक ऐतिहासिक उपकरणों-शिलालेख, ताम्रलेख, मुद्रा आदि से भी भली-भाति हो रही है। राजा परीक्षित् से लेकर पद्मनन्द तक का अज्ञात इतिहास पुराणों में ही मिलता है। पाश्चात्त्य विद्वान् पार्टिजर के ' एनसिएन्ट इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडीशन' के अनन्तर भारतीय तथा विदेशी विद्वानों का ध्यान पुराणों की ऐतिहासिक सामग्री की ओर आकृष्ट हुआ है, जिससे इधर प्रकाशित ग्रन्थ प्राचीन भारतीय इतिहास के अन्धकारपूर्ण काल को उज्ज्वल रूप से प्रकाशित करने में समर्थ
1. विष्णु पुराण - 3 : 6 : 24
हुए हें । मौर्य-वंशावली के लिए विष्णु-पुराण, आन्ध्र-वंशावली के लिए मत्स्य-पुराण और गुप्त-वंशावली के लिए वायु पुराण अत्यन्त प्रामाणिक सिद्ध हुए हें । इसके अतिरिक्त पुराण तमाम ऐतिहासिक दस्तावेजों को प्रस्तुत करते हैं ।
भौगोलिक दृष्टि से भी पुराणों का विशेष महत्त्व है। इनमें प्राचीन भूगोल का एक वृहत् अंश उपस्थित होता है, जिसे 'भुवन-कोष' की संज्ञा दी जाती है। पुराणों में चतुर्दीपा, वसुमती, सप्तद्वीपा वसुमती, 18 द्वीप, 14 भुवन, क्षीर सागर आदि का भू-विभाजन तीर्थो, समुद्रों, नदियों, पर्वतों एवं भौगोलिक महत्त्व के स्थानों का यत्र-तत्र वर्णन मिलता है । भारतवर्ष जम्बू द्वीप के नाम से जाना जाता था। इससे पहिले इसका नाम ' अजनाभ' था, जिसका शाब्दिक अर्थ है -- अज (ब्रह्मा) की नाभि से उत्पन्न होने वाला और यह नाम आर्यो के मूल निवास को भारतवर्ष में प्रतिष्ठित होने का स्पष्ट संकेत करता है। शकद्वीप में शक लोगों का निवास था यह जिस क्षीर सागर के द्वारा चारों ओर से वेष्ठित हे वही आज-कल का कैस्पियन सागर हे | कुशट्टीप के निवासी 'कुसाइट्स' के नाम से महान् सम्राट डेरियस (दारा) के शिलालेखों में अनेकत्र उल्लिखित हें । तात्पर्य यह है कि पुराणों का भूगोल कोई काल्पनिक नहीं है, प्रत्युत वह ठोस भूतल पर अवस्थित है। इसी प्रकार पुराणों में वर्णित पाताल भी आज-कल का मेक्सिको तथा दक्षिणी अमेरिका है। आज भी मेक्सिको तथा पेरू में प्राचीन सभ्यता के जो चिह अवशिष्ट हैं वे भारतीय भौगोलिक तथ्यों से बहुत कुछ साम्य रखते हैं । पुराण विशालकाय प्रासादों तथा महलों का निर्माण करने वाले पातालवासी 'मय' नामक असुर के संकेतों से भरे हुये हैं। फलतः यह 'मय' कोई काल्पनिक व्यक्ति न होकर जीते-जागते प्राणी थे, जो शिल्पकला के महनीय प्रतिष्ठापक माने जाते हैं। साथ ही पुराण अन्य भौगोलिक तथ्यों की जानकारी के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं ।
प्राचीन भारत का ज्ञान और विज्ञान, पशु तथा पक्षि-विज्ञान, वनस्पति तथा आयुर्वेद- सब एकत्र कर पुराणों में भर दिया गया है, जिसका परिणाम यह है कि पुराण विश्वविद्या के
($)
कोष हैं । जिस प्रकार आज-कल विश्वकोष (इनसाइक्लोपीडिया) लिखने का प्रचलन हे, जिससे विस्तृत विज्ञान संक्षेप में, शिक्षित जनता के ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत किया जाता है, उसी प्रकार अग्नि, नारद, गरुड आदि पुराणों की रचना ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने की दृष्टि से की गयी है। पुराण जनता का ग्रन्थ है, विद्वानों का नहीं; व्यावहारिक सरल भाषा में रचित ग्रन्थ है, शास्त्रीय भाषा में नहीं। उसका उद्देश्य ही है ज्ञान को सुगम बनाना। आज-कल के ' पापुलर-एजुकेशन' की दृष्टि से इस विषय में पौराणिक दृष्टि का अनुगमन करती है।
(6)
“पुराण ' शब्द की निष्पत्ति
आचार्य यास्क के निरूक्त (3, 19) के अनुसार पुराण को व्युत्पत्ति है, “पुरा नवं भवति' (अर्थात् जो प्राचीन होकर भी नवीन होता है) । नवीन इस अर्थ में कि पुराण में समय की गति के साथ नवीन बातों का भी समावेश होता चलता था। बह अत्यन्त पुरातन काल से अपने समय तक का सारा इतिहास अपने भीतर सँजोये रहता था। वह एक लम्बी अवधि का विश्वकोष होता था।
पुराण शब्द “पुरा' पूर्वक 'अन्' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय के योग से बना है। 'पुरा' का अर्थ है-पूर्वकालिक अथवा प्राचीन। ' अन्' धातु का अर्थ है-श्वास लेना या जीवन धारण करना | अर्थात् प्राचीन काल से आज तक अपनी परम्परा की रक्षा करने वाला वाङ्मय पुराण है। दूसरे रूप में विस्तार से इसकी सिद्धि इस प्रकार से होगी - 'पुरा' अव्यय पूर्वक 'णीज् प्रापणे' धातु से 'ड' प्रत्यय करने के पश्चात् 'टि' का लोप तथा नकार के स्थान पर णत्व करने पर *पुराण' शब्द सिद्ध होता है। “पुरा + नी + ड'- ये तीनों'अवयव मिलकर व्याकरण-शास्त्र के नियमानुसार 'पुराण' शब्द के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं, अथवा “पुराभवः' इस विग्रह में पुरा अव्यय से “सायं-चिरं-प्राह्वे-प्रगे-ऽव्ययेभ्य-ष्ट्यु-ट्युलौ तुट् च'1 इस सूत्र में 'ट्यु' प्रत्यय होने के बाद टकार की इत्संज्ञा और लोप हो जाने के बाद 'युवोरनाकौ'2 से 'अन' और ' अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि'3 से णत्व करके 'पुराण' शब्द बनता है। पाणिनीय व्याकरण को इस व्युत्पत्ति से पुराण साहित्य की ऐतिहासिकता सूचित होती है।
पुराण-साहित्य भारत की ऐतिहासिक धरोहर है। भारतीय जीवन के आदर्श, भारत को
1. अष्टाध्यायी - 4/3/23 2. अष्टाध्यायी - 7/1/1 3. अष्टाध्यायी - 8/4/2
सभ्यता एवं संस्कृति तथा भारत के विद्या-वैभव के उत्कर्ष का वास्तविक ज्ञान पुराणों से ही हो सकता है। पुराणों में ऐतिहासिक विवेचन मात्र न होकर उनमें विश्व-कल्याणकारी उन्नति का मार्ग भी प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन कथानक, वंशावली एवं इतिहास के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान का उल्लेख भी पुराणों में प्राप्त होता है। पुराण शब्द की अनेक निरुक्तियाँ पुराणों में ही को गई हैं। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार 'पुरा एतद् अभूत्' अर्थात् प्राचीन काल में एसा हुआ है।! यही पुराण शब्द का अर्थ है। वायु-पुराण के अनुसार 'जो प्राचीन समय में सजीव था, उसे पुराण कहते हैं ।'2 तथा “प्राचीन परम्परा के प्रतिपादक ग्रन्थों को पुराण कहते हैं ।'3 पद्म पुराण में इसको व्युत्पत्ति कुछ भिन्न है - “पुरा परम्परां वष्टि कामयते' अर्थात् जो परम्परा की कामना करता है, वह पुराण कहा जाता है।4
इसके अतिरिक्त अन्य. विद्वानों ने भी पुराण शब्द को व्याख्या को है। मधुसूदन सरस्वती विश्व-रचना के इतिहास को पुराण को संज्ञा प्रदान करते हैं।5 सायण संसार को उत्पत्ति और विकास-क्रम के बोधक को पुराण स्वीकार करते हैं 16
इन सभी व्युत्पत्तियों से यह बात पूर्ण स्पष्ट हो जाती है कि पुराण भारत को ऐतिहासिक धरोहर के साथ-साथ भारतीय जीवन के आदर्श, भारत की सभ्यता एवं संस्कृति तथा भारत के विद्या-वैभव के उत्कर्ष का प्रकाश-पुंज है जो विशव-कल्याणकारी उन्नत्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
SUSE PS SO RE INTIS NPI CRIES IS SSI णाची
1. यस्मात् पुरा ह्यभूच्चैतत् पुराणं तेन तत् स्मृतम् ।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ब्रह्माण्ड पुराण 1 : 1 : 173 2. यस्मात् पुरा हि अनति इदं पुराणम्। वायु पुराण 1203 3. पुरा परम्परां वक्ति पुराणं तेन वै स्मृतम् । वायु पुराण 1/253 4. पद्म पुराण A oS 5. विश्वसृष्टेरितिहासः पुराणम् । -मधुसूदन सरस्वती, पुराणोत्पत्तिप्रसंग 6. जगतः प्रागवस्थामनुक्रम्य सर्गेप्रतिपादकं वाक्यजातं पुराणम् | - सायण, ऐ०बा० को भूमिका
(8)
पुराणों का आविर्भाव
पुराणों के आविर्भाव के सन्दर्भ में पुराणों तथा अन्य ग्रन्थों में अनेक सूत्र इतस्तत: प्रकीर्ण रूप में प्राप्त होते हैं। पुराणों के विकास में दो प्रकार की विचारधारायें परिलक्षित होती हैं --
1- व्यासपूर्व विचारधारा
2- व्यासोत्तर विचारधारा
वेदव्यास का मुख्य कार्य ' पुराण संहिता' का निर्माण करना था। फलतः उन्होंने आख्यान, उपाख्यान, गाथा तथा कल्पशुद्धि के आधार पर “पुराण संहिता' की रचना कौ ।! इसके विपरीत कतिपय विद्वानों का कथन है कि पुराण प्राचीन समय में प्राकृत भाषा में थे; बाद में इनका संस्कृत में अनुबाद हुआ। यह विचार पाजीटर, स्मिथ, रैप्सन, विण्टरनिट्ज तथा कुछ अन्य पाश्चात्यों के साथ उनके अनुयायी भारतीय विद्वानों का भौ है। इस विचारधारा का मूल कारण जैन पुराणों का प्राकृत भाषा में प्राप्त होना है, जबकि वास्तविकता यह है कि 'जेन पुराण” बहुत बाद में प्राकृत काल में लिखे गये। सनातम धर्म के परम्परागत पुराणों को ऐसी एक भी प्रति हस्तलिखित या प्रकाशित रूप में किसी पुस्तकालय में नहीं प्राप्त होती, जिससे पुराणों को सर्वप्रथम प्राकृत भाषा में रचित माना जा सके | इसके अतिरिक्त प्राकृत भाषा संस्कृत से ही निःसृत स्वीकार की जाती है - 'संस्कृत के ही विकृत रूप का नाम प्राकृत भाषा हे | प्रकृति का अर्थ है - मूलभाषा अर्थात् संस्कृत। उससे निकली हुई भाषा को प्राकृत भाषा कहते हैं 12 इस सम्बन्ध में डा० राम जी तिवारी ने अपने शोध-प्रबन्ध में यह स्पष्ट किया है -
1. आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गाथाभिः कल्पजोक्तिभिः। पुराणसंहितां चक्रे पुराणार्थविशारदः ॥ - ब्रह्माण्ड पुराण 2:3: 3 2. संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास - डा० कपिलदेव द्विवेदी
(9)
'कदाचित् यह मान भी लिया जाए कि पहले भो कोई प्राकृत्त ग्राम्य भाषा रही होगी, तो भी आरम्भ में वह लिखने-पढ़ने की भाषा नहीं थी। यही कारण है कि पुराने नाटकों में प्राकृत का कोई स्थान नहीं दिखाई पड़ता। महानाटक, हनुमन्नाटक आदि इसके प्रमाण हैं। भविष्य पुराण के अनुसार भी गौडी, पाञ्चाली, मागधी, अर्धमागधी शौरसेनी आदि सभी प्राकृत-भेद कलियुग में ही प्रसृत हुए। अत: यह विचार सर्वथा भ्रामक एवं आधारविहीन है कि पुराण पहले प्राकृत भाषा में थे
प्राचीन काल में ' पुराण' शब्द “विद्या-विशेष' का वाचक था, क्योंकि प्राचीन काल के ग्रन्थों में “पुराण' शब्द का ही प्रयोग मिलता है, 'पुराण-संहिता' का नहीं; फलतः यह शब्द किसी ग्रन्थ विशेष को न बतलाकर विद्या-विशेष को ही द्योतित करता है | पुराण के आविर्भाव को मत्स्य पुराण में वेद के आविर्भाव से पूर्ववर्ती बताया गया हे | ब्रह्मा ने सब शास्त्रों में पुराण को ही प्रथम स्मरण किया और उसके पश्चात् उनके मुखों से वेद निःसृत हुए-
“पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। नित्यं शन्दमयं पुण्यं शवकोटिप्रविस्तरम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता:॥ 2
यहाँ पर *शतकोटिप्रविस्तम्' शब्द को किसी निश्चित रूप का संकेत न मानकर पुराण के अनिश्चित या विप्रकीर्ण रूप का द्योतक माना जा सकता है। अत: पुराण शब्द का प्रयोग प्राचीन ग्रन्थों में 'विद्या-विशेष' के लिए हुआ है। इसी लोक-प्रचलित, किन्तु अव्यवस्थित 'विद्या-विशेष' पुराण को एकत्र कर वेदव्यास ने 'पुराण-संहिता' का निर्माण किया। उसे पुराण-संहिता इसलिए कहते हैं; क्योंकि उसमें पुराण पद से अभिहित तथा ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में उल्लिखित सृष्टि-विद्या का एक स्थान पर संग्रह किया गया है। निर्माण के पश्चात् वेदव्यास
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1. भविष्यपुराण एक अनुशीलन - डा० राम जी तिवारी 2. मत्स्य पुराण - 3 : 3-4
ने अपने शिष्य लोमहर्षण को वह संहिता पढ़ायी। लोमहर्षण ने सम्पूर्ण संहिता को पढ़कर उसे अपने छह शिष्यों 1-सुमति, 2-अनिग्नवर्चा, 3-मित्रायु, 4-शांशपायन, 5-अकृतत्रण, तथा 6-सावर्णि को पढ़ाया। इनमें से अन्तिम तीन ने अपनी-अपनी संहिताएं बनायी। इन तीनों में लोमहर्षण की संहिता को जोड़ देने पर चार पुराण-संहितायें निष्पन्न होती हैं।! आगे चलकर उन चारों संहिताओं में उल्लिखित कथाओं में भिन्नता आ गई | इसका कारण यह है कि समय-समय पर मुनियों की गोष्ठियों में उन पर चर्चा होती रही, जिसमें सात्त्विक, राजस तथा तामस उपासना के भेद से उसको भिन्न-भिन्न प्रकार से निरूपित किया गया। फलत: मुख्य उद्देश्य में भिन्नता आ जाने से इतिहास और प्रबन्ध में भी भेद हो गया।2 कालान्तर में आराध्य देव को भिन्नता के आधार पर भिन्न-भिन्न नामों से पुराणों का प्रणयन हुआ।
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1. विष्णु पुराण - 3/6/17-19 तथा अग्नि पुराण - 271/11-12 2. ब्रह्म पुराण की भूमिका - तारिणीश झा
{ 11)
पुराणों का रचना-काल
पुराण का उल्लेख अथर्ववेद, बृहदारण्यक, उपनिषद्, यास्क के निरुक्त, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, गौतम के धर्मसूत्र, महाभारत, मनुस्मृति, वाल्मीकीय रामायण, पतंजलि के महाभाष्य, आपस्तम्ब-धर्मसूत्र, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में हुआ है। इससे सिद्ध हे कि ईसा पूर्व पाँचवी शताब्दी से पहले कुछ पुराण अवश्य थे; क्योंकि आपस्तम्ब और गौतम के धर्मसूत्र इसापूर्व पाचवी शताब्दी के हैं । किन्तु सभी पुराण उस समय के नहीं हैं। सभी पुराणों की गणना भागवत पुराण में है। भागवत का रचनाकाल शंकराचार्य की तीसरी पीढी में हए चित्सुखाचार्य से पहले है; क्योंकि चित्सुखाचार्य ने भागवत पर एक टीका लिखी है | बाणभट्ट ने कादम्बरी में वायु पुराण का नामोल्लेख किया है और कहा है कि उन्होंने वायु पुराण को अपने जन्मस्थान में सुना था। इससे सिद्ध है कि सभी पुराणों की रचना बाणभट्ट के पूर्व समाप्त हो गयी थी। अतः छठी शती ई० पू० से छठी शती इसवी तक पुराणों का रचनाकाल माना जा सकता हे |
( 12)
पुराण-लक्षण
पुराणों में ही 'पुराण' के लक्षण दृष्टिगत होते हैं । वहाँ स्वल्प शब्दान्तर से पुराण का निम्नलिखित पञ्चात्मक लक्षण प्राप्त होता है --
““सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचारितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् । 0
अर्थात् 1-सर्ग, 2-प्रतिसर्ग, 3-वंश, 4-मन्वन्तर तथा 5-वंशानुचरित-पुराणों के ये पाँच लक्षण हैं। जगत् तथा उसके नाना पदार्थों की उत्पत्ति अथवा सृष्टि को 'सर्ग' कहा जाता है। सृष्टि के विपरीत अर्थात् प्रलय तथा पुनः सृष्टिकरण को “प्रतिसर्ग? कहा जाता है। देव, ऋषि तथा मनुष्यों की संतान-परम्परा का उल्लेख करना “वंश” कहलाता है तथा सृष्टिक्रम की काल-गणना 'मन्वन्तर' में मानी जाती है। राजाओं के चरित्र-वर्णन को 'बंशानुचरित' कहते
हैं।
1. यह श्लोक विष्णु पुराण (3/6/24), मत्स्य पुराण (53/64), मार्कण्डेय पुराण (137/13), देवी भागवत पुराण (1/2/18), शिव पुराण, वायवीय संहिता (1/14), अग्नि पुराण (1/14), ब्रह्मवैवर्त पुराण (131/6), स्कन्द पुराण, प्रभास खण्ड (2/84), ब्रह्माण्ड पुराण (1/38), भविष्य पुराण (1/2/5-6), इत्यादि अनेक स्थलों में प्राप्त होता है।
( 13 )
पुराणों का प्रतिपाद्य विषय
पुराणों में पुराण के सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुरचित-जो ये पाँच लक्षण प्राप्त होते हैं, उनके द्वारा पुराणों के प्रतिपाद्य विषय पर प्रकाश पडता है। विष्णु पुराण में पुराणों के प्रतिपाद्य विषय की सूची इस प्रकार दी गयी है--' भौतिक सृष्टि, चेतन सृष्टि, स्थिति, पालन, कर्म और वासना का वर्णन, प्रलय एवं मोक्ष का निरूपण, भगवान् और देवताओं का पृथक्-प्रथक् कीर्तन - ये ही पुराणों के वर्ण्य विषय हैं।'!
यदि पुराणों पर एक विहंगम-दृष्टि डाली जाय तो हमें प्रथमत: यह दृष्टिगोचर होता हे कि प्रत्येक पुराण में किसी देव या देवी की उपासना का विवेचन है। जिस पुराण का जो इष्ट है उसी को सबसे बडी शक्ति के रूप में दर्शाया गया है तथा अन्य देवों से उसे श्रेष्ठ बतलाया गया है। सामान्यतया ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से किसी एक को इष्टदेव के रूप में स्वीकार किया गया है। इसके साथ ही इष्ट की फ्राप्ति के लिए ब्रत, जप, उपवास, प्रार्थना, उपासना आदि के अतिरिक्त विविध अनुष्ठानों का विवेचन पुराणों में प्रदर्शित होता है। पुराणों में भक्तिमार्ग का प्रमुखता के साथ विवेचन है। इसमें सगुणोपासना पर विशेष बल दिया गया है। अवतारवाद, मूर्तिपूजा एवं देवी-देवताओं में अतिशय श्रद्धा की स्थापना पुराणों में प्रमुखता के साथ परिलक्षित होती है।
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का विवेचन भी लगभग सभी पुराणों में परिलक्षित होता है। इसके साथ ही देवों, ऋषियों और महर्षियों की वंशावली तथा उनका जीवनवृत भी
क न क 7 ए.... न 00 कशाला चाचा
1. सृष्टिचापि विसृष्टिश्च स्थितिस्तेषां च पालनम्। कर्म॑णा वासना वार्ता चामूनां च क्रमेण च।। वर्णनं प्रलयानां च मोक्षस्य च निरूपणम् । उत्कीर्तनं हरेरेव देवानां च पृथक् पृथक् ॥ - विष्णु पुराण
(14)
वहाँ दृष्टिगोचर होता है। प्रत्येक मनु का नाम, उनका समय एवं तत्कालीन प्रमुख घटनाओं का विवेचन पुराणों को ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। वहाँ नन्द, मौर्य, शुंग, आन्ध्र और गुप्त आदि सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी राजाओं का वर्णन भी उल्लिखित है। तीर्थो भौगोलिक स्थानों एवं तीर्थयात्राओं आदि का वर्णन पुराणों के भौगोलिक पक्ष को इंगित करता है ।
इसके अतिरिक्त दार्शनिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं आचार-शास्त्रीय महत्त्वपूर्ण विषयों का विश्लेषण बहुत ही सहज ढंग से पुराणों में प्रतिपादित है; साथ ही व्याकरण, काव्यशास्त्र, ज्योतिष, शरीर-विज्ञान, आयुर्वेद आदि शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक विषयों से सम्बद्ध तथ्यों का संकलन भी पुराणों में प्राप्त होता है।
(158)
पुराणों की संख्या
सामान्यतया पुराणों की संख्या अठारह (अष्टादश) विद्वानों द्वारा मान्य है । शिव पुराण में भी पुराणों की संख्या अष्टादश ही स्वीकृत है ।! इनके नाम इस प्रकार हैं --
1-ब्रह्म पुराण, 2-पद्म पुराण, 3-विष्णु पुराण, 4-शिव पुराण, 5-भागवत पुराण, 6-भविष्य पुराण, 7-नारद पुराण, 8-मार्कण्डेय पुराण, 9-अग्नि पुराण, 10-ब्रह्मवैवर्त पुराण, 11- लिङ्ग पुराण, 12-वाराह पुराण, 13-स्कन्द पुराण, 14-वामन पुराण, 15-कूर्म पुराण, 16-मत्स्य पुराण, 17-गरुड पुराण, 18-ब्रह्माण्ड पुराण।
अधिकांश पुराणों में पुराणों की यही नामावली दी गई है ।2 इन्हें महापुराण भी कहा जाता है। इन महापुराणों से 18 उपपुराण निकले हैं और उनसे 18 औपपुराण निकले हैं 13
उपपुराण
पुराणों के बाद उपपुराणों की रचना हुई। पुराणों की भाँति उपपुराणों की संख्या भी 18 मानी गई है। उपपुराणों में स्थानीय सम्प्रदाय एवं पृथकू-पृथक् सम्प्रदायों की धार्मिक आश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। गरुड़ पुराणानुसार 18 उपपुराणों के नाम और क्रम इस प्रकार
हे
1. दशधा चाष्टधा चैतत्पुराणमुपदिश्यते।
ब्राह्मं पादमं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा।
भविष्यं नारदीयं च मार्कण्डेयमतः परम् ॥
आग्नेयं ब्रह्मवैवर्त लैङ्गं वाराहमेव च।
स्कान्दं च वामनं चेव कौर्म मात्स्यं च गारुडम् ॥
ब्रह्माण्डं चेति पुण्योऽयं पुराणानामनुक्रमः। शि०पु०, वा०सं०, पू०खं० 1 : 43-45 तथा शि०पु०, उ०सं०, 44 : 19-122
3. संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास - डा० कपिलदेव द्विवेदी
शि०पु०, वा०संणपृ०खें० 1-42
t ~
( 16 )
(1) सनतू, (2) कुमार, (3) स्कान्द, (4) शिवधर्म, (5) आश्चर्य, (6) नारदीय, (7) कपिल, (8) वामन, (9) औशनस, (10) ब्रह्माण्ड, (11) वारूण, (12) कालिका, (13) माहेश्वर, (14) साम्ब, (15) सौर, (16) पाराशर, (17) मारीच, (18) भार्गव |
औपपुराण उपपुराणों की भाँति औपपुराणों की संख्या भी अठारह ही है। ओपपुराणों के नाम एवं
क्रम इस प्रकार हैं
(1) सनत्कुमार, (2) बृहन्नारदीय, (3) आदित्य, (4) मानव, (5) नन्दिकेश्वर, (6) कौर्म्म, (7) भागवत, (8) वशिष्ठ, (9) भार्गव, (10) मुद्गल, (11) कल्कि, (12) देवी, (13) महाभागवत, (14) बृहद्धर्म्म, (15) परानन्द, (16) पशुपति, (17) वहिन, (18) हरिवंश।
इस प्रकार पुराण, उपपुराण एवं औपपुराण को मिलाकर कुल 54 ग्रन्थ “पुराण' नाम से विख्यात है, इनमें लगभग 32 ग्रन्थ यत्र-तत्र प्रकाशित हो चुके हैं ।
सम्प्रदायों के अनुसार पुराणों का विभाजन इस प्रकार है-
(क ) शैव पुराण (1) शिव, (2) भविष्य, (3) मार्कण्डेय, (4) लिंग, (5) वाराह, (6) स्कन्द, (7) मत्स्य, (8) कूर्म, (9) वामन, (10) ब्रह्माण्ड ।
( ख ) ब्राह्म पुराण-- (1) ब्रह्मवैर्वत, (2) ब्रह्म, (3) ब्रह्माण्ड, (4) पद्म। (ग) शक्ति पुराण (1) देवीभागवत | ( घ ) वैष्णव पुराण--(1) विष्णु, (2) भागवत |
( 17)
शिव पुराण का महत्त्व
पुराणों में शिव पुराण का विशेष स्थान है । 24000 श्लोकों एवं 7 संहिताओं में निबद्ध इस महाग्रन्थ को परम श्रेष्ठ शास्त्र को संज्ञा से अभिहित किया गया है ।1 यद्यपि 18 पुराणों में 10 पुराण शिव परक कहे गये हैं 2, किन्तु शिव के नाम से अभिहित शिव पुराण तो अन्यतम ही है; क्योंकि भगवान् शिव त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु, महेश में श्रेष्ठ हैं। उनको 'सर्वेश्वर' संज्ञा पुराणों में बहुतायत परिलक्षित होती है।3 शिव पुराण-माहात्म्य खण्ड के प्रथम अध्याय में इसे भगवान् शिव के श्री मुख से निःसृत कहा गया है। कालान्तर में सनत्कुमार से उपदिष्ट होकर व्यास जी ने जनकल्याणार्थ इसका प्रणयन किया !4 इस ग्रन्थ का मूल उद्देश्य--कलियुग में उत्पन्न होने वाले मनुष्यों का परम हित-साधन प्रतिपादित है। व्यास जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कलि-काल में मुक्ति का साधन शिव पुराण के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म नहीं है-
“विशेषतः कलौशेवपुराणश्रवणादूते । परो धर्मो न गुंसां हि मुक्तिसाधनकंमुने॥'5
कालरूपी महासर्प के विध्वंसक परमश्रेष्ठ इस ग्रन्थ में उसी व्यक्ति को प्रवृत्ति होती है, जिसने जन्म-जन्मान्तर में अत्यन्त श्रेष्ठ और पुण्य कर्मों को सम्पादित किया हो ।6 जो मनुष्य इस पुराण का श्रवण करते हैं बे मनुष्य नहीं, अपितु साक्षात् रूद्र रूप हो जाते हैं और उनका चरण-रज भी तीर्थ स्वरूप है-एऐसा मुनि-जनों का कथन है | इसका श्रवण, मनन, निदिध्यासन
. एतच्छिपुराणं हि परमं शास्त्रमुत्तमम्। शि० पु०, मा० 1 : 12
. अष्टादशपुराणेषु दशभिर्गीयते शिवः। स्कन्द पुराण, केदारखण्ड। शि० पु०, रु० सं०, स० ख० - 35 : 7
. शि० पुः, मा० - 1: 9
वही - 1 : 25
. शि० पु०, मा० - 1 : 8-9
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(IB)
कर भक्त सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है ।1 अन्यत्र कहा गया है कि जो इस कथा का श्रवण करते हैं उन्हीं का जन्म लेना सार्थक है और वे इस कथा के माध्यम से निश्चित रूपसे संसार-सागर से पार हो जाते हैं ।2 यह कथा परम पवित्र करने वाली कही गयी है3, जो चतुर्वर्गप्रदात्री£ त्रितापनाशिका5 सुखदात्री6 अत्मज्ञान प्रदान करने वाली तथा भवरोग-निवारण करने वाली है।
शिव पुराण का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए, महर्षि शौनक के प्रति, सूत जी का कथन है कि राजसूय यज्ञ या सौ अग्निष्टोम से जो पुण्य प्राप्त होता हैवह शिव जी को इस कथा को सुनने मात्र से ही मिल जाता है। इसका श्रवण मनुष्यों के लिए कल्प वृक्ष के समान फलदायी होने के साथ-साथ उसे कुल सहित अजर-अमर कर देता है।? यह ग्रन्थ अपनी श्रेष्ठता के कारण ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं के लिए प्राणों के समान प्रिय है। इसी कारण इसे समस्त पुराणों के भाल का तिलक स्वीकार किया गया है।
शिव पुराण की विषय-वस्तु पर दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि यह ग्रन्थ शिव की भक्ति का प्रचार करके लोगों में परमार्थ की भावनायें जागृत करने के निमित्त रचा गया है, जिसमें भारतीय संस्कृति और धर्म के मूल तत्त्वों का लोकोपयोगी रूप में संकलन है। इसकी सरल भाषा और सुगम शैली में शिव का चरित्र परम त्याग, तपस्या, परोपकार, दीनवत्सलता आदि गुणों से युक्त चित्रित है; साथ ही दया, क्षमा, उदारता, सञ्जनता,
शि० पु०, मा० - 1 : 13-15
वही - 7: 48, 49
एतच्छिवपुराणस्य कथा परमपावनी । शि० पु०, मा० - 1 : 29
चतुर्वर्गप्रदं शैवं पुराणममलं परम्। वही - 1 : 48
, तापत्रयाभिशमनंसुखदंसदैव प्राणप्रियं विधिहरीशमुखामराणाम्। वही - 1 : 50 . सेवनीयं प्रयत्ने परत्रेह सुखेप्सुना। वही - 1 : 47
शि० पु०, मा० - 1 : 16, 24, 26
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( 19)
धर्मनिष्ठा, सत्य, ब्रत आदि नेतिक गुणों का सहज रूप में चित्रण है। इसके अतिरिक्त विशिष्ट पात्रों के माध्यम से स्वार्थ को त्यागकर पारमार्थिक जीवन व्यतीत करने, गृहस्थ एवं परिवार के उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए भी उच्च से उच्च त्यागमय जीवन व्यतीत करने, नीच से नीच अवस्था में, पहुँच जाने पर भी आन्तरिक निष्ठा और साधन के बल पर पुनः उत्कृष्ठ पद पर प्रतिष्ठित होने जैसी प्रेरणायें शिव पुराण में परिलक्षित होती हें ।
सात संहिताओं में निबद्ध शिव पुराण की प्रथम संहिता ' विद्येश्वर' में सर्वप्रथम कलियुग में पापों की घोर वृद्धि तथा आचार-विचार के नष्ट होने का वर्णन करके परित्राण पाने के लिए शिव-भक्ति का उपदेश किया गया है। शिव पुराण की कथा को प्रकट करने वाली द्वितीय रूद्र-संहिता है। उसके प्रथम 'सृष्टि-खण्ड' में जगत् के आदि कारण निर्गुण ब्रह्म का, तदनन्तर उसके साकार शिव तथा आद्य शक्ति (माया) के आविर्भाव का, तत्पश्चात् शिव के द्वारा विष्णु तथा विष्णु से ब्रह्मा को उत्पत्ति का वर्णन हे | रूद्र-संहिता का दूसरा भाग 'सती-खण्ड' है | इसमें सती के जन्म, शिव जी के साथ विवाह और अन्त में दक्ष के यज्ञ में देह-त्याग करने की कथा विस्तार पूर्वक कही गई है | रूद्र-संहिता के तीसरे भाग 'पार्वती-खण्ड' में पार्वती द्वारा शिव के साथ विवाह करने के दृढ निश्चय और उनके अभूतपूर्व तप की कथा का विशद वर्णन है । चौथे 'कुमार-खण्ड' में स्कन्द के जन्म तथा पालन-पोषण एवं पाँचवें ' युद्ध-खण्ड' में शिव जी द्वारा अनेक दैत्यों के वध का वर्णन किया गया है | तृतीय ' शतरुद्र-संहिता' में शिव जी द्वारा जगत् में किये गये अनेक चरित्रों का वर्णन है जिनको पुराणकार ने शिव का अवतार कहा हे | इसमें हनुमान् जी को शिव का अवतार स्वीकार किया गया है। समुद्र-मन्थन के समय देवताओं का अहंकार दूर करने वाले यक्षेशवर को यहाँ शिव ही माना गया है। चतुर्थ “कोरि रुद्र-संहिता' में शिव के द्वादश लिंगों का वर्णन है जो देश के विभिन्न भागों में स्थापित हैं और जिनकी अर्चना कर भक्त अपने को धन्य मानते हैं। पंचम 'उमा-संहिता' में विभिन्न पापों तथा उनके दण्ड-स्वरूप मिलने वाले नरकों की यातनाओं का विस्तार से वर्णन किया
गया है । षष्ठ 'कैलास-संहिता' में योगशास्त्र के आसन, प्राणायाम, जप, ध्यान के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करके सांसारिक बन्धनों से छुटकारा पाने का मार्ग-दर्शन है । सप्तम 'वायु- संहिता' में विस्तार के साथ निर्गुण और सगुण ब्रह्म का विवेचन करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि शिव द्वारा साकार रूप में मनुष्यवत् किये गये कार्यों से उनके *परब्रह्म' होने में कोई दोष उत्पन्न नहीं होता।
(21)
शिव पुराण का काल
शिव पुराण को कैलास-संहिता के सोलहवें तथा सत्रहवें अध्याय में प्रत्यभिज्ञा-दर्शन के विशद विवेचन के अवसर पर 'शिवसूत्र' के दो सूत्रों-चैतन्यमात्मा' एवं 'ज्ञानं बन्धः' का तथा तत्सम्बद्ध 'वार्तिक' का स्पष्ट निर्देश किया गया है॥ “शिव सूत्र ' एवं उस पर लिखित “वार्तिक' का काल क्रमश: नवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध तथा दशवीं शताब्दी का उत्तराद्ध माना जाता हे 12 शिव पुराण में शिव सूत्र का उल्लेख एकाधिक स्थलों पर हुआ है।3 अलबरूनी (1030 ई०) भी पुराणों के उद्धरण के प्रसंग में शिव पुराण का उल्लेख करता है।
इसके अतिरिक्त शिव पुराण की कोरिरूद्र-संहिता में महर्षि गौतम,जो एक ऋषि थे को कथा वर्णित है।4 उनका कुछ ऋषियों से कलहचल रहा था। कुछ समय के अनन्तर उन ऋषियों के षड्यंत्र के कारण गौतम को अपना आश्रम छोड़ना पड़ा। उनका यह आश्रम दक्षिण दिशा में 'ब्रह्मगिरि' पर्वत पर था। बाद में गौतम को जब इस षड्यन्त्र का पता चला तो उन्होंने उन लोगों को शाप देते हुये कहा--''मुझ शिव भक्त को दुःख देने वाले तुम सब दुरात्मा हो। तुम सब वेद विमुख होओगे। आज से तुम लोगों के मस्तक मृत्तिका से लिप्त हुआ करेंगे और इसी कारण तुम लोगों को नरक यातना भी भोगनी पड़ेगी। उसके बाद तुम सब दु:ख-दारिट्रय से पीडित, दूसरे की निन्दा करने वाले, शठ, चाण्डाल होओगे। तुम्हारा शरीर तप्त मुद्रा से अंकित होगा।''5 महर्षि के इस शाप को सुनकर शैव धर्म-नहिष्कृत, खिन्न हृदय वे सम्पूर्ण ऋषि
शि० पु०, कै० सं०- 16 : 44-46 |
. “पुराण विमर्श” का 105वाँ पृष्ट |
. मूलविद्या शिवं शैवं सूत्रं पंचाक्षरं तथा शि० पु०, वा० सं०, उ० ख० - 13 : 5। शि० पु०, को० रु० सं० - 27 : 35।
. वही- 27 : 35, 38, 431
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(22)
“कांची ' नगरी में जाकर निवास करने लगे 11
निश्चय ही यह कथा वैष्णव ऋषि रामानुज एवं उनके अनुयायियों की ओर स्पष्ट संकेत करती है । रामानुज के जीवन का उत्तरार्द्ध *कांची' में ही व्यतीत हुआ था। अत: उनके मत के अनुयायियों का वह नगरी केन्द्र मानी जाती है । बाल में मृतिकालेपन, तप्त मुद्रा से शरीर को अंकति करना आदि बातें रामानुज सम्प्रदाय की विशेषता हे ।
दक्षिण भारत में शैवों एवं वैष्णवों (विशेषत: रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायियों) में एक लम्बी अवधि तक संघर्ष चलता रहा | रामानुज का कालबारहवीं शताब्दी माना जाता है । अत: शिव पुराण का उत्तर काल तेरहवीं शताब्दी मानना ही उपयुक्त होगा |
rr र ण भरा ककल-िननननास्वा न पव सनक,
1. शि० पु०, को०रु०सं० - 27 : 45।
( 23 )
शिव पुराण की कथावस्तु
विद्येशवर-संहिता रुद्र-संहिता शतरुद्र-संहिता कोरटिरुद्र-संहिता उमा-संहिता कैलास-संहिता वायवीय-संहिता
HO MT “कि. NH पी का
शिव पुराण की कथावस्तु
शिव पुराण के जो संस्करण आज उपलब्ध हैं वे सात संहिताओं में विभक्त है । प्रारम्भ में शिव पुराण के माहात्म्य का विवेचन किया गया है। तत्पश्चात्-विद्येश्वर-संहिता, रुद्र- संहिता, शतरुद्र-संहिता, कोटिरुद्र-संहिता, उमा-संहिता, कैलास-संहिता एवं वायवीय- संहिता--इन सात संहिताओं में सुव्यवस्थित ढंग से शिव पुराण की कथावस्तु का संयोजन किया गया है । इस पुराण की विद्येश्वर-संहिता में उल्लेख है कि प्रारम्भ में विद्येश्वर, रुद्र, विनायक, उमा, मातू, एकादशरुद्र, कैलास, शतरुद्र, कोटिरुद्र, सहस्रकोटिरुद्र, वायवीय और धर्म--ये बारह संहितायें थी॥ ये संहितायें एक लाख श्लोकों में निबद्ध थीं 2 कालान्तर में व्यास जी ने इनका संक्षेप करके शिव पुराण को सात संहिताओं में निबद्ध किया। यह सारगर्भित संस्करण चौबीस हजार श्लोकों से युक्त है 3
ग्रन्थ के आरम्भ में शिव पुराण-माहात्म्य का विवेचन सात अध्यायों में किया गया है। यहाँ सर्वप्रथम शौनक जी के साधन-विषयक प्रश्न करने पर सूत जी द्वारा उन्हें शिव पुराण की उत्कृष्ट महिमा का श्रमण कराने का वर्णन है।4 इसके पश्चात् प्रतिष्ठानपुर (झसी-प्रयाग) के शिवालय में शिव पुराण को कथा के श्रवण से किरात-नगर-वासी पथभ्रष्ट ब्राह्मण देवराज को शिवलोक को प्राप्ति5, वाष्कल-ग्राम-निवासी अधम ब्राह्मण बिन्दुग एवं उसकी पत्नी चञ्चुला द्वारा गन्धर्वराज तुम्बुरू से विन्ध्य पर्वत पर शिव पुराण की कथा सुनकर शिवधाम की प्राप्ति
शि० पु०, वि०, सं० - 2 : 49-51 वही - 2 : 55
वही - 2 : 59
शि० पु०, मा० अध्याय 1
. शिन पु०, मार
वही
ल (2 > >) (> ४
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तथा अन्त में शिव पुराण के श्रवण की विधि एवं श्रोताओ के पालन करने योग्य नियमों का विवेचन है।!
शिव पुराण-माहात्म्य के विवेचन के पश्चात् व्यास जी ने 456 अध्यायों में वर्ण्य-विषय के अनुसार सप्त संहिताओं के माध्यम से इस ग्रन्थ की कथावस्तु को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है, जिसमें परात्पर परब्रह्म परमेश्वर के शिव-स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा एवं उपासना का सुविस्तृत वर्णन है। इसके अतिरिक्त भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, धार्मिक, दार्शनिक एवं नैतिक मान्यताओं का बहुत ही सहज ढंग से विवेचन किया गया है। संहिताओं के क्रम में शिव पुराण की कथावस्तु का विवेचन निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है।
1. शिल पु०, मा०
विद्येश्वर-संहिता
आद्यन्तमङ्गलमजातसयानभाव- मार्य तमीशमजरामरमात्मदेवम् । पञ्चाननं प्रबलपञ्चविनोदशीलं
सम्भावये मनसि शंकरमम्बिकेशम् ॥
विद्येशवर-संहिता के प्रथम अध्याय के मंगल श्लोक में अम्बिकापति भगवान् शंकर की स्तुति के उपरान्त ब्रह्मलोक के मार्ग परम पुण्य प्रयाग में महातेजस्वी महाभाग महात्मा मुनियों द्वारा ज्ञानयज्ञ के आयोजन में पौराणिक-शिरोमणि व्यास-शिष्य रोमहर्षण सूत जी के आगमन पर महामुनियों द्वारा चारों वर्णो के, स्वधर्म त्यागकरअनेक-कुकर्मरत, पथभ्रष्ट, कलियुगी स्त्री - पुरुषों के उद्धार-हेतु संक्षिप्त उपाय के विषय में प्रश्न एवं पुराण-विद्या-श्रबण की अभिलाषा का वर्णन किया गया है। द्वितीय अध्याय में समस्त पाप राशियों के नाशक के रूप में शिव पुराण को इंगित किया गया है, साथ ही शिव पुराण का परिचय एवं उसकी विशिष्टता का चित्रण है। वहाँ इसे वेद के तुल्य प्रामाणिक एवं सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थो का प्रदाता, त्रिविध पापों का नाशक एवं समस्त जीव-समुदाय का उपकारक आदि कहा गया हे |
तृतीय एवं चतुर्थं अध्यायों में साध्य-साधन आदि का विचार तथा श्रवण, कीर्तन एवं मनन इन तीन साधनों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है। यहां शिवपद की प्राप्ति ही साध्य है और श्रवण, कीर्तन और मनन साध्य के ये तीन महान् साधन हैं। पॉचवें और छठें अध्यायों में श्रवण, कीर्तन और मनन--इन तीनों साधनों के अनुष्ठान में असमर्थ लोगों के लिए
क
1. शि० पु०, वि० सं० - 1:1
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शिव के लिङ्ग एवं मूर्ति को पूजा का विधान है। सातवें अध्याय में ब्रह्मा और विष्णु के विवाद एवं युद्ध का वर्णन है, जिसमें दोनों स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ बतलाते हैं। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान् शिव ने भेरव को भेजकर युद्ध को नियन्त्रित किया तथा महा अग्नि-स्तम्भ के समान, महा भयंकर आकृति के समान, उन दोनों के बीच में निर्गुण ब्रह्म के रूप में स्थित हुए।
आठवें और नोवें अध्यायों में शिवजी ने ब्रह्मा-विष्णु से महाशिवरात्रि के ब्रत के महाफल का निरूपण किया है। भगवान् शिव ने स्वयं कहा है कि जो फल निरन्तर एक वर्ष पूजन करने से मिलता है, वह एक शिवरात्रि के दिन मेरा पूजन करने से प्राप्त होता है। दसवें अध्याय में पञ्च कृत्यों तथा ओंकार का उपदेश किया गया है। यहाँ सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह-ये पाँच जगत् के कृत्य वर्णित हैं, जिन्हें नित्य स्वीकार किया गया है। इन्हीं पञ्च कृत्यों को धारण करने के कारण शिव के पाँच मुख हैं।
ग्यारहवें अध्याय में शिवलिङ्ग की स्थापना, पूजन एवं दान आदि के विषय में विस्तृत वर्णन है। शिवलिङ्ग का प्रमाण बारह अंगुल उत्तम माना गया है, जिसके पूजन, अर्चन एवं दर्शन से विभिन्न प्रकार के मुक्तिदायक फलों का वर्णन है | बारहवें अध्याय में शिव-क्षेत्र का विवेचन है, जिसमें पृथ्वी का प्रमाण 50 करोड़ योजन शैल, वन, कानन सहित बताया गया है। इस शिव-क्षेत्र में व्याप्त गंगा, शोणभद्र, नर्मदा, रेवा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि पवित्र नदियों में स्नान दान, दर्शन से पुण्य, ऐश्वर्य की प्राप्ति एवं कायिक, वाचिक एवं मानसिक पापों के नाश की चर्चा की गयी है।
विद्येश्वर संहिता के तेरहवें अध्याय में सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्म धारण, संध्यावन्दन, प्रणव-जप, गायत्री-जप, दान, न्यायतः धनोपार्जन के अतिरिक्त अग्निहोत्र आदि को विधि एवं महिमा का विवेचन किया गया है। चौदहवें अध्याय में अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन है तथा भगवान् शिव के द्वारा सातों वारों (दिनों) का निर्माण एवं
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उनमें देवाराधन से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन है । पन्द्रहवें अध्याय में देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार किया गया है। सोलहवें अध्याय में पृथ्वी आदि से निर्मित देव-प्रतिमाओं के पूजन की विधि उनके लिए नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरूप का विवेचन किया गया है। सत्रहवें अध्याय में षड्लिङ्ग स्वरूप प्रणव का महात्म्य तथा उसके सूक्ष्म रूप (३५कार) और स्थूल रूप (पञ्चाक्षर मन्त्र) का वर्णन, साथ ही इनके जप की विधि एवं महिमा का भी दिग्दर्शन यहाँ प्राप्त होता है। इसी अध्याय में शिवलोक के अनिर्वचनीय वैभव का निरूपण तथा शिवभक्तों के सत्कार की महत्ता का भी कथन है।
अठारहवें अध्याय में बन्धन और मोक्ष के स्वरूप का विवेचन है। लिङ्ग आदि में शिव पूजन का क्या विधान है इसे स्पष्ट करते हुए भस्म के स्वरूप का निरूपण और उसके महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है। उन्नीसवें एवं बीसवें अध्यायों में पार्थिवलिङ्ग के निर्माण की रीति तथा वेद-मन्त्रों द्वारा उसको पूजन-विधि का वर्णन किया गया है। इक्कोसवें तथा बाईसवें अध्यायों में पार्थिव पूजा की महिमा, शिव-नेवेद्य-भक्षण के विषय में निर्णय तथा बिल्व का माहात्म्य, चौबीसवें अध्याय में भस्म-माहात्म्य तथा पचीसवें अध्याय में रुद्राक्ष-माहात्म्य तथा उसके विविध भेदों का विवेचन है। अन्त में विद्येशवर-संहिता को सम्पूर्ण सिद्धियों को प्रदान करने वाली तथा भगवान् शिव को आज्ञा से नित्य मोक्ष प्रदान करने वाली कहा गया
है।! इस तरह साध्य-साधन खण्ड नामवाली विद्येशवर-संहिता की विषय-वस्तु वर्णित की गयी है ।
1. शि० पु०, वि० सं० - 25 : 95
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रुद्र-संहिता
शिव पुराण की सबसे बडी और शिव-परिवार की कथा को प्रकट करने वाली रूद्र- संहिता है । 197 अध्यायों में निबद्ध इस संहिता के सृष्टि, सती, पार्वती, कुमार और युद्ध ये पाँच खण्ड हैं। इस संहिता में शिव के परम स्वरूप, शिव और पार्वती के दिव्य चरित्र, निर्गुण महेश्वर लोक में सगुण रूप कैसे धारण करते हैं? सृष्टि के पूर्व भगवान् शिव किस प्रकार अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं? सृष्टि के मध्यकाल में किस प्रकार व्यवहार करते हैं? सृष्टि के अन्त में वे किस रूप में स्थित रहते हैं? ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्राकट्य की कथा तथा उनके विशेष चरित्रों के वर्णन के अतिरिक्त उमा के आविर्भाव, उनके विवाह की कथा एवं गार्हस्थ्य धर्म आदि का विवेचन है।
सृष्टि-खण्ड के प्रथम पाँच अध्यायों में नारद-मोह-प्रसंग, माया निर्मित नगर में शीलनिधि की कन्या पर मोहित हुए नारद जी का भगवान् विष्णु से उनका रूप मांगने, भगवान् विष्णु का अपने रूप के साथ उन्हें वनार का सा मुँह प्रदान करने, फलस्वरूप कन्या द्वारा नारद का वरण न कर भगवान् विष्णु का वरण करने तथा कुपित नारद का भगवान् विष्णु सहित शिवगणों को शाप देने और माया के दूर हो जाने पर नारद के पश्चाताप पूर्वक भगवान् के चरणों में गिरने और शुद्धि का उपाय पूछे जाने पर भगवान् विष्णु द्वारा शिव-माहात्म्य के ज्ञान- हेतु ब्रह्म जी के पास भेजने, नारद जी द्वारा शिव तीर्थो में भ्रमण तथा ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्मा जी से शिव तत्त्व के विषय में जिज्ञासा करने आदि का विवेचन है।
छठें अध्याय में महाप्रलय काल में सद्ब्रह्म की सत्ता का प्रतिपादन, उस सद्ब्रह्म से ईश्वर-मूर्ति (सदाशिव) के प्राकट्य, सदाशिव द्वारा स्वरूपभूता शक्ति (अम्बिका) के प्रकटीकरण, सदाशिव एवं अम्बिका के द्वारा शिवलोक के निर्माण, शिव के वामाङ्ग से परम पुरुष (विष्णु) के आविर्भाव तथा उनके सकाश से प्राकृत तत्त्रों की उत्पत्ति का वर्णन है
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सातवें अध्याय में भगवान् विष्णु की नाभि से कमलके प्रादुर्भाव, शिवजी की इच्छा से ब्रह्मा जी के प्रकट होने, कमलनाल के उद्गम का पता लगाने में असमर्थ ब्रह्मा के तप करने तथा हरि का उन्हें दर्शन देने आदि का विवेचन है। आठवें अध्याय में ब्रह्मा और विष्णु को भगवान् शिव के शब्दमय शरीर के दर्शन का वर्णन है। नौवें अध्याय में उमा सहित भगवान् शिव के प्रकट होने एवं अपने स्वरूप का विवेचन करने तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश--इन तीनों देवताओं की एकता का प्रतिपादन किया गया है। दसवें अध्याय में भगवान् शिव द्वारा श्री हरि को सृष्टि की रक्षा का भार एवं भोग-मोक्ष-दान का अधिकार प्रदान कर उनके अन्तर्हित होने का कथन है।
ग्यारहवें अध्याय में शिव पूजन की विधि तथा फल का विवेचन करके बारहवें अध्याय में भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन किया गया है। तेरहवें अध्याय में शिव पूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन है, जिसमें आवाहन, अर्ध्यमन्त्र, पुष्पाञ्जलि-मन्त्र, विसर्जन आदि का विशेष उल्लेख किया गया है। चौदहवें अध्याय में विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादि की धाराओं से शिव जी की पूजा का माहात्म्य दर्शाया गया है।
पन्द्रहवें अध्याय में सृष्टि का वर्णन तथा सोलहवें अध्याय में मनु, शतरूपा, ऋषियों और दक्ष-कन्याओं की सन्तानों का वर्णन तथा सती एवं शिव की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। सत्रहवें से उन्नीसवें अध्यायों में यज्ञदत्त-कुमार को भगवान् शिव की कृपा से कुबेर पद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिव के साथ मैत्री का वर्णन है। अन्तिम बीसवें अध्याय में भगवान् शिव का कैलास पर्वत पर गमन तथा सृष्टि-खण्ड के उपसंहार का कथन है।
सती-खण्ड रुद्र-संहिता का दूसरा भाग सती-खण्ड है। सती-खण्ड में कुल 43 अध्याय हैं । प्रथम और द्वितीय अध्यायों में नारद जी के प्रश्न और ब्रह्मा जी के द्वारा उनका उत्तर, सदाशिव से
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त्रिदेवों की उत्पत्ति तथा ब्रह्माजी से देवता आदि की सृष्टि के पश्चात् एक नारी और एक पुरुष के प्राकट्य की कथा का वर्णन है । तृतीय से पंचम अध्यायों में कामदेव के विभिन्न नामों का निर्देश, उसका रति के साथ विवाह तथा कुमारी संध्या का चरित्र और वशिष्ठ मुनि द्वारा चन्द्रभाग पर्वत पर संध्या को तपस्या की विधि बताने का कथन है। छठें अध्याय में संध्या की तपस्या, उसके द्वारा भगवान् शिव की स्तुति तथा उससे सन्तुष्ट हुए भगवान् शिव का उसे अभीष्ट वर देकर मेधातिथि के यज्ञ में भेजने का विवेचन किया गया है | सातवें से दसवें अध्याय में संध्या को आत्माहुति, उसका अरुन्धती के रूप में अवतीर्ण होकर मुनिवर वशिष्ठ केसाथ विवाह करना, ब्रह्मा जी का रुद्र के विवाह के लिए प्रयत्न और चिन्ता तथा भगवान् विष्णु का उन्हें “शिवा' को आराधना के लिये उपदेश देकर चिन्तामुक्त करने का वर्णन है।
सती-खण्ड के ग्यारहवें से चौदहवें अध्यायों के बीच दक्ष की तपस्या और देवी शिवा का उन्हें बरदान देने, ब्रह्माजी की आज्ञा से दक्ष द्वारा मेथुनी सृष्टि के आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों और शवलाश्वों को निवृत्ति मार्ग में भेजने के कारण दक्ष का नारद को शाप देने, दक्ष की साठ कन्याओं के विवाह, दक्ष और वारिणी के यहाँ देवी शिवा के अवतार, दक्ष द्वारा उनकी स्तुति तथा सती के सद्गुणों एवं चेष्टाओं से माता-पिता को प्रसन्नता का चित्रण किया गया है । पन्द्रहवें अध्याय में सती की तपस्या से सन्तुष्ट सभी देवता कैलास पर्वत पर जाकर भगवान् शिव का स्तवन करते हैं। सोलहवें अध्याय में ब्रह्मा जी का रुद्रदेव से सती के साथ विवाह करने के अनुरोध, श्री विष्णु द्वारा उसके अनुमोदन और श्री रुद्र को इसके लिये स्वीकृति का कथन है। सत्रहवें अध्याय में सती को शिव से वर की प्राप्ति तथा भगवान् शिव का ब्रह्मा जी को दक्ष के पास भेजकर सती का वरण करने आदि का विवेचन किया गया है। अठारहवें अध्याय में ब्रह्मा जी के माध्यम से दक्ष की अनुमति पाकर देवताओं और मुनियों सहित भगवान् शिव का दक्ष के घर जाने, दक्ष द्वारा सबका सत्कार करने तथा सती और शिव के विवाह का वर्णन है।
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उन्नीसवें और बीसवें अध्यायों में सती और शिव के द्वारा अग्नि की परिक्रमा, श्री हरि द्वारा शिवतत्त्व के वर्णन, ब्रह्मा जी को दिये हुए वर के अनुसार वेदी पर सदा के लिए शिव के अवस्थान तथा शिव और सती का विदा होकर कैलास पर्वत पर जाने का उल्लेख किया गया है। इक्कोसवें से तेईसवें अध्यायों में सती के प्रश्न तथा उसके उत्तर में भगवान् शिव द्वारा ज्ञान तथा नवधा भक्ति के स्वरूप का विवेचन है। चौबीसवें अध्याय में शिव को श्रीराम के प्रति मस्तक झुकाते देकर उत्पन्न सती के मोह तथा शिवकी आज्ञा से सती द्वारा श्रीराम को परीक्षा का वर्णन है। पच्चीसवें अध्याय में शिव के द्वारा गोलोकधाम में विष्णु का गोपेश के पद पर अभिषेक तथा उनके प्रति प्रणाम का प्रसङ्ग सुनाकर श्रीराम का सती के मन का संदेह दूर करने और सती के शिव के द्वारा मानसिक त्याग का प्रतिपादन है।
छब्बीसवें अध्याय में प्रयाग में समस्त महात्मा मुनियों द्वारा किये गये यज्ञ में दक्ष का भगवान् शिव को तिस्कार पूर्वक शाप देने तथा नन्दी द्वारा ब्राह्मण कुल को शाप प्रदान करने पर भगवान् शिव द्वारा नन्दी को शान्त करने का उल्लेख है। सत्ताईसवें अध्याय में दक्ष के द्वारा महान् यज्ञ के आयोजन, उसमें ब्रह्मा, विष्णु, देवताओं और ऋषियों के आगमन, दक्ष द्वारा सबके सत्कार, दधीच द्वारा भगवान् शिव को बुलाने के अनुरोध और दक्ष के विरोध करने पर शिव-भक्तों के वहाँ से निकल जाने का वर्णन है | दक्ष-यज्ञ का समाचार पाकर सती के शिव से वहाँ चलने के लिए अनुरोध तथा दक्ष के शिव-द्रोह को जानकर भगवान् शिव की आज्ञा से देवी सती के, पिता के यज्ञ-मण्डप को ओर शिवगणों के साथ प्रस्थान का वर्णन अट्ठाईसवें अध्याय में किया गया है। उन्तीसवें अध्याय में यज्ञशाला में शिव का भाग न देखकर तथा दक्ष द्वारा शिव की निन्दा सुनकर सती द्वारा दक्ष और देवताओं को धिक्कार-फटकार कर अपने प्राण-त्याग का निश्चय किया गया है। तीसवें अध्याय में सती का योगाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर देना और इकत्तीसवें अध्याय में आकाशवाणी द्वारा दक्ष की भर्त्सना और उनके विनाश की सूचना वर्णित है।
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बत्तीसवें अध्याय में गणों के मुख से और नारद से भी सती के दग्ध होने की बात सुनकर दक्ष पर कुपित हुए भगवान शिव अपनी जटा से वीरभद्र और महाकाली को प्रकट करके, उन्हें यज्ञ-विध्वंस करने और विरोधियों को जला डालने की आज्ञा देते हें । तेंतीसवें और चौंतीसवें अध्यायों में वीरभद्र और महाकाली का दक्ष-यज्ञ-विध्वंस के लिए प्रस्थान, दक्ष तथा देवताओं को अपशकुन एवं उत्पात सूचक लक्षणों का दर्शन एवं भय वर्णित हे । पैंतीसवें अध्याय में दक्ष की, यज्ञ की रक्षा के लिए भगवान् विष्णु से प्रार्थना, भगवान् का शिवद्रोहजनित संकट को टालने में अपनी असमर्थता बताते हुए दक्ष को समझाने तथा सेना सहित वीरभद्र के आगमन का वर्णन है । छत्तीसवें और सैंतीसवें अध्यायों में वीरभद्र का देवताओं को युद्ध के लिए ललकारना, विष्णु और वीरभद्र कौ बातचीत तथा विष्णु आदि का अपने लोकों में जाना
एवं दक्ष और यज्ञ का विनाश करके वीरभद्र का कैलास पर्वत पर जाना निरूपित हे ।
अड़तीसबें अध्याय में विष्णु की पराजय में दधीच मुनि के शाप को कारण बताते हुए दधीच और क्षुव के विवाद का इतिहास, मृत्युञ्जय-मन्त्र के अनुष्ठान से दधीच को अवध्यता तथा श्रीहरि का क्षुव को दधीच की पराजय के लिए यत्न करने का आश्वासन निरूपित है। उन्तालीसबें अध्याय में विष्णु और देवताओं से अपराजित दधीच के उनके लिए शाप और क्षुव पर अनुग्रह का वर्णन है। चालीसवें अध्याय में, देवताओं सहित ब्रह्मा और विष्णु, भगवान् शिव से क्षमा माँगने के लिए कैलास पर्वत पर जाते हैं। इक्तालीसवें और बयालीसवें अध्यायों में देवताओं द्वारा भगवान् शिव की स्तुति तथा भगवान् शिव का दक्ष के जीवित होने का वरदान देने का कथन हैं। तिरालीसवें अध्याय में भगवान् शिव का दक्ष को अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्त की श्रेष्ठता तथां तीनों देवताओं की एकता बताने और दक्ष द्वारा अपने यज्ञ को पूर्ण करने का प्रतिपादन किया गया है।
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पार्वती-खण्ड
रुद्र-संहिता के पार्वती-खण्ड के 55 अध्यायों में जगज्जननी पार्वती को कथा लोक में प्रसिद्ध है। पार्वती-खण्ड के प्रथम दो अध्यायों में हिमालय के मेना के साथ विवाह तथा मेना आदि को पुनर्जन्म में प्राप्त हुए सनकादि के शाप एवं वरदान का कथन किया गया है। तृतीय अध्याय में देवताओं और हिमालय द्वारा उमा देवी की स्तुति की जाती है। चतुर्थ अध्याय में उमा देवी दिव्य रूप से देवताओं को दर्शन देती हैं तथा देवताओं के निवेदन पर अवतार लेने का आश्वासन देती हैं। पंचम अध्याय में मेना को प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिवा देवी के, उन्हें अभीष्ट वरदान से सन्तुष्ट करने तथा मेना से मैना के जन्म की कथा का वर्णन है।
छठें से आठवें अध्यायों में पार्वती का नामकरण और विद्याध्ययन, नारद का हिमवान् के यहाँ जाना, पार्वती का हाथ देखकर भावी फल बताना और हिमवान् से पार्वती का विवाह शिवजी के साथ करने का कथन वर्णित है। नौवें तथा दसवें अध्यायों में पार्वती तथा हिमवान् के स्वप्न और भगवान् शिव से 'मंगल' ग्रह को उत्पत्ति का प्रसंग है। ग्यारहवें अध्याय में भगवान् शिव का गङ्गावतरण तीर्थ में तपस्या के लिए आना और हिमवान् द्वारा उनका स्वागत, पूजन तथा स्तवन उल्लिखित है। बारहवें अध्याय में हिमवान् के, पार्वती को शिव की सेवा में रखने के लिए उनसे आज्ञा माँगने पर, शिव के कारण बताते हुए इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने का कथन है | तेरहवें अध्याय में पार्वती और शिव के बीच दार्शनिक संवाद तथा शिव का पार्वती को अपनी सेवा में रखने का वर्णन है |
चौदहवें से सोलहवें अध्यायों में तारकासुर द्वारा सताये हुए देवताओं का ब्रह्मा जी को अपनी कष्ट कथा सुनाने, ब्रह्मा जी का उन्हें पार्वती के साथ शिव के विवाह के लिए उद्योग करने का आदेश देने, ब्रह्मा जी के समझाने से तारकासुर के स्वर्ग को छोड्ने और देवताओं के वहाँ रहकर लक्ष्य-सिद्धि के लिए यत्नशील होने का विवेचन है। सत्रहवें अध्याय में इन्द्र के कहने से काम के, शिव को मोहने के लिए, प्रस्थान का वर्णन है । अठारहवें और उन्नीसवें अध्यायों में रुद्र की नेत्राग्नि से काम के भस्म होने, रति के विलाप, देवताओं को प्रार्थना से
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शिव के काम को द्वापर में प्रद्युम्न-रूप से नूतन शरीर की प्राप्ति के लिए वर देने का कथन है | बीसवें और इक्कीसवें अध्यायों में ब्रह्मा जी द्वारा शिव की क्रोधाग्नि को 'वड़वानल' को संज्ञा देकर, समुद्र में स्थापित करके, संसार के भय को दूर करना, शिव के विरह से पार्वती का शोक तथा नारद जी के द्वारा उन्हें तपस्या के लिए उपदेशपूर्वक पञ्चाक्षर-मन्त्र की प्राप्ति प्रतिपादित है।
बाईसवें अध्याय में शिव की आराधना के लिए पार्वती जी की दुष्कर तपस्या और तेईसवें अध्याय में पार्वती की उग्र तपस्या को देखकर समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा और विष्णु का भगवान् शिव के स्थान पर जाने का विवेचन किया गया है। चौबीसवें अध्याय में देवताओं का भगवान् शिव से पार्वती के साथ विवाह करने का अनुरोध, भगवान् का विवाह के दोष बताकर उसे अस्वीकार करना तथा उनके पुन: प्रार्थना करने पर उसे स्वीकार कर लेना वर्णित है। पच्चीसवें अध्याय में भगवान् शिव की आज्ञा से सप्तर्षियों के, पार्वती के आश्रम पर जाकर उनके शिव-विषयक अनुराग की परीक्षा करने और भगवान् शिव को सब वृतान्त बताकर पुन: स्वर्ग जाने का उल्लेख है।
छब्बीसवें अध्याय में भगवान् शंकर जटिल तपस्वी ब्राह्मण के रूप में पार्वती के आश्रम पर जाकर उनसे उनकी तपस्या का कारण पूछते हैं। सत्ताईसवें अध्याय में पार्वती की बात सुनकर जटाधारी ब्राह्मण-रूप शिव, शिव की निन्दा करते हुए पार्वती को उनकी ओर से मन को हटा लेने का आदेश देते हैं। अट्ठाइसवें अध्याय में पार्वती जी के, जटिल ब्राह्मण के प्रति परमेश्वर शिव की महत्ता का प्रतिपादन करने, रोषपूर्वक जटिल ब्राह्मण को फटकारने तथा भगवान् शिव के, उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर अपने साथ चलने को कहने का वर्णन किया गया है। उन्तीसवें अध्याय में शिव और पार्वती को बातचीत तथा शिव के, पार्वती के अनुरोध को स्वीकार करने का कथन है। तीसवें अध्याय में पिता के घर में पार्वती के सत्कार, महादेव जी को नटलीला के चमत्कार, उनके मेना आदि से पार्वती को माँगने और माता-पिता के इन्कार
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करने पर अन्तर्हित हो जाने का विवेचन हे ।
इकतीसवें से तैंतीसवें अध्यायों में भगवान् शिव के, हिमवान् के पास सप्तर्षियों को भेजने, हिमवान् द्वारा उनके सत्कार एवं सप्तर्षियों, अरुन्धती और महर्षि वशिष्ठ के, मेना और हिमवान् को समझाकर पार्वती का विवाह भगवान् शिव के साथ करने के लिये कहने का उल्लेख है। चौतीसवें से छत्तीसवें अध्यायों में सप्तर्षियों के समझाने तथा मेरु आदि के कहने से हिमवान् का शिव के साथ अपनी पुत्री के विवाह का निश्चय वर्णित है। सैंतीसवें और अड्तीसबें अध्यायों में हिमवान् का भगवान् शिव के पास लग्नपत्रिका भेजना, विवाह के लिए आवश्यक सामान जुटाना, मङ्गलाचार का आरम्भ करना, उनका निमन्त्रण पाकर पर्वतों और नदियों का दिव्य रूप में आना तथा विश्वकर्मा द्वारा दिव्य मण्डप एवं देवताओं के निवास के लिए दिव्यलोकों का निर्माण प्रतिपादित है।
उन्तालीसवें अध्याय में भगवान् शिव के नारद जी के द्वारा सब देवताओं को निमन्त्रण भेजने तथा सबके आगमन का विवेचन है। चालीसवें अध्याय में भगवान् शिव के. बारात लेकर हिमालय पुरी की ओर प्रस्थान करने का चित्रण है। इक्तालीसवें से तिरालीसवें अध्यायों में हिमवान् द्वारा शिव को बारात को अगवानी, सबके अभिनन्दन एवं वन्दन तथा मेना के, शिव और उनके गणों को देखकर भय से मूर्च्छित होने का कथन है। चौवालीसवें अध्याय में मेना का विलाप, शिव के साथ कन्या का विवाह न करने का हठ तथा भगवान् शिव द्वारा सुन्दर रूप धारण करने पर ही उनको कन्या देने का विचार वर्णित हे | पैंतालीसवें और छियालीसवें अध्यायों में मेना द्वारा द्वार पर भगवान् शिव का परिछन, पार्वती का अम्बिका-पूजन के लिये बाहर निकलना तथा देवताओं और भगवान् शिव का, उनके सुन्दर रूप को देखकर प्रसन्न होना निरूपित है। | के
सैंतालीसवें अध्याय में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे के पूजन और अडतालीसवें अध्याय में शिव-पार्वती के विवाह के आरम्भ, हिमालय द्वारा शिव के गोत्र के विषय में प्रश्न होने पर
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नारद जी द्वारा उत्तर, हिमालय के, कन्यादान करके शिव को दहेज देने तथा शिवा के अभिषेक का वर्णन किया गया है। उन्चासबें से इक्यावनवें अध्यायों के बीच वर-वधू का कोहबर और वास-भवन में जाना, वहाँ स्त्रियों का उनसे लोकाचार का पालन कराना, रति की प्रार्थना से शिव द्वारा काम को जीवनदान एवं वर-प्रदान करना वर्णित है। बावनवें अध्याय में रात को परम सुन्दर सजे हुए वासगृह में शयन करके प्रातःकाल भगवान् शिव के, जनवास में आगमन का वर्णन है। तिरपनवें और चौवनवें अध्यायों में मेना के, शिव को अपनी कन्या सौंपने तथा मेना की इच्छा के अनुसार एक ब्राह्मण-पत्नी के पार्वती को पतिब्रत-धर्म के उपदेश का कथन है। पार्वती-खण्ड के अन्तिम अध्याय में शिव-पार्वती तथा उनकी बारात की बिदाई, भगवान् शिव के, समस्त देवताओं को बिदा करके, कैलास पर रहने और पार्वती-खण्ड के श्रवण को महिमा का विवेचन किया गया है।
कुमार-खण्ड
रुद्र-संहिता का चौथा खण्ड 'कुमार-खण्ड' है। कुमार स्कन्द भगवान् शंकर के ज्येष्ठ पुत्र हैं। इस खण्ड में कुल 20 अध्याय हैं। प्रथम आठ अध्यायों में देवताओं द्वारा स्कन्द का शिव-पार्वती के पास लाया जाना, देवों के माँगने पर शिव जी का उन्हें तारक-वध के लिए स्वामी कार्तिकेय को देना, कुमार की अध्यक्षता में देव-सेना का प्रस्थान, मही-सागर-संगम पर तारकासुर का आना और दोनों सेनाओं में मुठभेड़, वीरभद्र का तारक के साथ घोर संग्राम, पुन: श्रीहरि और तारक में भयानक युद्ध वर्णित है। नौवें से बारहवें अध्यायों में ब्रह्मा जी को आज्ञा से कुमार का युद्ध के लिये जाना, तारक के साथ भीषण संग्राम और उनके द्वारा तारक का वध, तत्पश्चात् देवों क्रा कुमार का अभिनन्दन और स्तवन और कुमार का उन्हें वरदान देकर कैलास पर जाकर शिव-पार्वती के पास निवास करना उल्लिखित है।
इसी खण्ड कै तेरहवें से अठारहवें अध्यायो में शिवा का अपनी मैल से गणेश को उत्पन्न करके द्वारपाल-पद पर नियुक्त करना, गणेश द्वारा शिव जी को रोके जाने पर उनका
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शिवगणों के साथ भयंकर संग्राम, शिवजी द्वारा गणेश का शिरश्छेदन, कुपित हुई शिवा का शक्तियों को उत्पन्न करना और उनके द्वारा प्रलय मचाया जाना, देवताओं और ऋषियों का स्तवन द्वारा पार्वती को प्रसन्न करना, उनके द्वारा पुत्र को जिलाये जाने की बात कही जाने पर शिवजी को आज्ञानुसार हाथी का सिर लाया जाना और उसे गणेश के धड से जोड़कर उन्हें पुन: जीवित करना प्रतिपादित है।
उन्नीसबें अध्याय में पार्वती द्वारा गणेश जी को वरदान, देवों द्वारा उन्हें अग्रपूज्य माने जाने, शिवजी हारा गणेश की सर्वाध्यक्ष पद प्रदान करने और गणेश-चतुर्थी ब्रत का वर्णन है। अन्तिम अध्याय में स्वामिकार्तिक और गणेश की बाल-लीला, दोनों का परस्पर विवाह के विषय में विवाद, शिवजी द्वरा पृथ्वी-परिक्रमा का आदेश, कार्तिकेय का प्रस्थान, गणेश का माता-पिता की परिक्रमा करके उनसे पृथ्वी-परिक्रमा स्वीकृत कराना, विश्वरूप की सिद्धि और बुद्धि नामक दोनों कन्याओं के साथ गणेश का विवाह और उनसे क्षेम तथा लाभ नामक दो पुत्रों की उत्पत्ति तथा कुमार का पृथ्वी परिक्रमा करके लौटना और क्षुब्ध होकर क्रौंच पर्वत पर चले जाना वर्णित है। इस खण्ड को पढ्ने या सुनने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसकी सभी शुभ कामनाए पूर्ण हो जाती हैं ।
युद्ध-खण्ड
रुद्र-संहिता के युद्ध-खण्ड में शिव जी द्वारा अनेक दैत्यों के वध का वर्णन किया गया है। युद्ध-खण्ड कुल 59 अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय में तारक-पुत्र तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष की तपस्या, ब्रह्मा द्वारा उन्हें वर प्रदान करना तथा मायावी मय द्वारा उनके लिए तीन पुरों का निर्माण वर्णित है। द्वितीय से पंचम अध्यायों में तारक-पुत्रो के प्रभाव से संतप्त हुए देवों की ब्रह्मा के पास करुण पुकार, ब्रह्मा के उन्हें शिव के पास भेजने, शिव की आज्ञा से देवों के विष्णु की शरण में जाने और विष्णु के उन दैत्यों को मोहित करके उन्हें आचार-भ्रष्ट करने का विवेचन है।
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छठें से आठवें अध्यायों में देवों का शिव जी के पास जाकर उनका स्तवन करना, शिव जी की प्रसन्नता और उनके लिए विश्वकर्मा द्वारा सर्वदेवमय रथ का निर्माण प्रतिपादित है। नौवें और दसवें अध्यायों में सर्वदेवमय रथ का वर्णन, शिवजी का उस रथ पर चढ़कर युद्ध के लिए प्रस्थान, शिव जी द्वारा गणेश का पूजन और त्रिपुर-दाह तथा मय दानव का त्रिपुर से जीवित बच निकलना निरूपित है। ग्यारहवें और बारहवें अध्यायों में मय दानव का शिव जी के समीप आना और उनसे वर-याचना करना तथा शिव जी से वर पाकर मय का वितल लोक में जाना वर्णित है।
इस खण्ड के तेरहवें से उन्तीसवें अध्यायों के बीच दम्भ की तपस्या और विष्णु द्वारा उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान, शङ्कचूड का जन्म, तप और उसे वर-प्राप्ति, ब्रह्मा जी की आज्ञा से उसका पुष्कर में तुलसी के पास आना और उसके साथ वार्तालाप, ब्रह्मा जी का पुनः वहाँ प्रकट होकर दोनों को आशीर्वाद देना और शङ्खचूड का गान्धर्व विवाह की विधि से तुलसी का पारिंग्रहण प्रतिपादित है।
तीसवें अध्याय में शङ्कचूड के असुर-राज्य पर अभिषेक और उसके द्वारा देवों के अधिकार छीने जाने का वर्णन है। इकतीसवें से पैंतीसवें अध्यायों के बीच देवताओं का रुद्र के पास जाकर अपना दुःख निवेदन करना, रुद्र द्वारा उन्हें आश्वासन और चित्ररथ को शङ्कचूड के पास भेजना, चित्ररथ के लौटने पर रुद्र का गणों, पुत्रों और भद्रकाली-सहित युद्ध के लिए प्रस्थान तथा शङ्कचूड का सेना-सहित पुष्पभद्रा के तट पर पड़ाव डालना प्रतिपादित है। छत्तीसवें से चालीसवें अध्यायों में देवताओं और दानवों का युद्ध, शिव जी का शङ्कचूड के साथ युद्ध और आकाशवाणी सुनकर युद्ध से निवृत्त हो विष्णु को प्रेरित करना, विष्णु द्वारा शङ्कचूड के कवच और तुलसी के शील का अपहरण और फिर रुद्र के हाथों त्रिशूल द्वारा शङ्कचूड का वध निरूपित है। इक्तालीसवें अध्याय में विष्णु द्वारा तुलसी के शील-हरण का वर्णन, कुपित हुई तुलसी द्वारा विष्णु को शाप और शम्भु द्वारा तुलसी तथा शालग्राम-शिला का माहात्म्य दर्शाया गया है ।
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बयालीसवें अध्याय में शम्भु के नेत्र मूँद लेने पर अन्धकार में शम्भु के पसीने से अन्धकासुर को उत्पत्ति, हिश्याक्ष की पुत्रार्थ तपस्या और शिव का उसे पुत्र रूप में अन्धक को देना, हिएयाक्ष का त्रिलोकी को जीतकर पृथ्वी को रसातल में ले जाना और वाराह रूपधारी विष्णु द्वारा उसका वध वर्णित है ।
तिरालीसवें अध्याय में हिरण्यकशिपु की तपस्या और ब्रह्मा से वरदान पाकर उसके
अत्याचार, नृसिंह द्वारा उसके वध और प्रहलाद को राज्य-प्राप्ति का उल्लेख है।
चौवालीसवें से छियालीसवें अध्यायों में अन्धक का घोर तप और वर पाकर त्रिलोकी को जीतकर स्वेच्छाचार में प्रवृत्त होना, उसके मन्त्रियों द्वारा शिव-परिवार का वर्णन, पार्वती के सौन्दर्य पर मोहित होकर अन्धक का वहाँ जाना और पार्वती के आवाहन से देवियों का प्रकट होकर युद्ध करना, शिव का आगमन और युद्ध तथा शिव का अन्धक को अपने त्रिशूल में पिरोने की कथा वर्णित है।
सैतालीसवें से उन्चासवें अध्यायों में नन्दीश्वर द्वारा शुक्राचार्य के अपहरण और शिव द्वारा उनके निगल जाना, सौ वर्षो के बाद शुक्र के शिवलिङ्ग के रास्ते बाहर निकलने, शिव द्वारा उनका 'शुक्र' नाम रखे जाने तथा शुक्र द्वारा जपे गये मृत्युञ्जय-मन्त्र और शिबाष्टोत्तरशतनामस्त्रोत का वर्णन है। पचासवें अध्याय में शुक्राचार्य को घोर तपस्या और
शिव जी का प्रसन्न होकर उन्हें मृतसञ्जीवनी विद्या प्रदान करने का उल्लेख है ।
इसी खण्ड के इक्यावनवें से चौवनवें अध्यायों में बाणासुर की तपस्या और शिव द्वारा वर-प्राप्ति, बाण-पुत्री ऊषा का रात के समय स्वप्न में अनिरुद्ध के साथ मिलन, बाण का अनिरुद्ध को नागपाश में बांधने, दुर्गा के स्तवन से अनिरुद्ध के बन्धन-मुक्त होने और शिव की आज्ञा से श्रीकृष्ण का उन्हें जुम्भणास्त्र से मोहित करके बाण को सेना का संहार करने का कथन किया गया है । पचपनवें और छप्पनवें अध्यायों में श्री कृष्ण द्वारा बाण की भुजाओं के
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काटे जाने, बाण का ताण्डव नृत्य द्वारा शिव को प्रसन्न करने और शिव द्वारा उसे अन्यान्य वरदानों के साथ महाकालत्व की प्राप्ति का प्रतिपादन है ।
सत्तावनवें अध्याय में गजासुर की तपस्या, वर-प्राप्ति और उसका अत्याचार, शिव द्वारा उसका वध, उसकी प्रार्थना से शिव का उसका चर्म धारण करना और “कृत्तिवासा' नाम से विख्यात होना दर्शाया गया है। अट्ठावनवें अध्याय में दुन्दुभिनिर्हाद नामक दैत्य के व्याघ्र-रूप से शिव भक्त पर आक्रमण करने के विचार और शिव द्वारा उसके वध का वर्णन है। उन्सठवें अध्याय में विदल और उत्पल नामक दैत्यों के पार्वती पर मोहित होने और पार्वती के कन्दुक- प्रहार द्वारा उनका काम तमाम करने तथा कन्दुकेश्वर की स्थापना और उसकी महिमा का प्रतिपादन किया गया है।
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शतरूद्र-संहिता
शतुरुद्र-संहिता में कुल 42 अध्याय हैं। इसमें शिव जी द्वारा जगत् में किये गये अनेक चरित्रों का वर्णन है, जिनको पुराणकर्त्ता ने शिव का अवतार कहा है। शिव शीघ्र प्रसन्न होने वाले दया के अवतार हैं। जहाँ भी किसी भक्त पर कष्ट पड़ा उन्होंने किसी न किसी रूप में प्रकट होकर कष्ट निवारण किया है। सृष्टि प्रक्रिया में मैथुनी सृष्टि की आवश्यकता होने पर ब्रह्मा की प्रार्थना पर अर्धनारीश्वर के रूप में, शिलाद मुनि की तपस्या पर नन्दी रूप में, ब्रह्मा के गर्वनाश हेतु काल भैरव के रूप में प्रकट हुए। इसी प्रकार शिव जी ने अनेक लोगों की तपस्या से प्रसन्न हो पुत्रादि देकर मनोकामना पूर्ण की है।
इस संहिता के प्रथम अध्याय में शिवजी के सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान नामक पाँच अवतारों का वर्णन है। द्वितीय तथा तृतीय अध्यायों में शिव जी की अष्टमूर्तियों का तथा अर्धनारीनर रूप का सविस्तार प्रतिपादन है। चतुर्थ अध्याय में वाराहकल्प में होने वाले शिवजी के प्रथम अवतार से लेकर नवम ऋषभ अवतार तक का वर्णन है। पंचम अध्याय में शिवजी द्वारा दसवें से लेकर अट्ठाईसवें योगेश्वरावतारों का विवेचन है। छठे और सातवें अध्यायों में नन्दीशवरावतार का वर्णन है।
आठवें से तेरहवें अध्याय में कालभैरव के माहात्म्य, विश्वानर की तपस्या और शिवजी के प्रसन्न होकर उनकी पत्नी शुचिष्मती के गर्भ से उनके पुत्र रूप में प्रकट होने का उन्हें वरदान देने का उल्लेख है। चौदहवें और पन्द्रहवें अध्यायों में शिवजी का शुचिष्मती के गर्भ से प्राकट्य, ब्रह्मा द्वारा बालक का संस्कार करके ' गृहपति' नाम रखा जाना, पिता को आज्ञा से गुहपति का काशी में जाकर तप करना, शिवजी का प्रकट होकर उन्हें बरदान देकर दिक्पाल पद प्रदान करना तथा अग्नीशवर-लिङ्ग और अग्नि का माहात्म्य दर्शाया गया है।
शतरुद्र-संहिता के सोलहवें से बीसवें अध्यायों में शिवजी के महाकाल आदि दस
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अवतारों, ग्यारह रुद्र अवतारो, दुर्वासावतार तथा हनुमदवतार का वर्णन किया गया है। इक्कोसवें से पच्चीसवें अध्यायों में शिव जी के पिप्पलाद-अवतार के प्रसङ्ग में देवताओं की दधीचि मुनि से अस्थि-याचना, दधीचि का शरीर-त्याग, वञ्र-निर्माण तथा उसके द्वारा वृत्रासुर का वध, सुवर्चा का देवताओं को शाप तथा पिप्पलाद के जन्म की कथा का विवेचन है। छब्बीसवें और सत्ताइसवें अध्यायों में भगवान् शिव के द्विजेश्वरावतार की कथा तथा अट्ठाईसवें अध्याय में यतिनाथ एवं हंस नामक अवतार को कथा का वर्णन है। उन्तीसवें अध्याय में भगवान् शिव के कृष्ण-दर्शन नामक अवतार, तीसवें अध्याय में अवधूतेश्वरावतार, इक्तौसवें अध्याय में भिक्षुवर्यावतार, बत्तीसवें अध्याय में सुरेश्वरावतार, तैतीसवें से इक्तालीसवें अध्यायों में किरातावतार तथा बयालीसवें अध्याय में द्वादश ज्योतिर्लिङ्गावतारों की कथा का सविस्तार वर्णन किया गया है।
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कोटिरुद्र-संहिता
कटिरुद्र संहिता के 43 अध्यायों में द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों का वर्णन है, जो देश के विभिन्न भागों में स्थापित हैं और जिनको अर्चना से सदैव अगणित व्यक्ति सन्तुष्ट होते हैं । सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्री-शैल में मल्लिकार्जुन, उज्जैन में महाकाल, ओंकार में अमरेश्वर (परमेश्वर), हिमालय में केदार, डाकिना में भीमशंकर, काशी में विश्वनाथ, गोमती के तट पर त्यंबक, चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुक वन में नागेश, सेतुबन्ध में रामेशवर तथा शिवालय में घुश्मेश--ये द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग प्रसिद्ध हैं। ये ज्योतिर्लिङ्ग शिव जी के बारह अवतार माने जाते हैं। इन ज्योतिर्लिङ्गों का इतना प्रभाव बतलाया गया है--'जो मनुष्य हृदय में जिस-जिस मनोरथ के उद्देश्य से इन द्वादश शम्भु के शुभ नामों का पाठ एवं स्मरण करेंगे, वे उन मनोरथों को इस लोक और परलोक में अवश्य प्राप्त कर लेंगे।''
इस संहिता के प्रथम अध्याय में द्वादश ज्योतिरलिङ्गों तथा उनके उपलिङ्गों का वर्णन एवं उनके दर्शन-पूजन की महिमा का निरूपण किया गया है। द्वितीय से चतुर्थ अध्यायों में काशी आदि के विभिन्न लिङ्गों का वर्णन तथा अत्रीश्वर की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में गङ्गा और शिव के अत्रि के तोपवन में नित्य निवास करने की कथा वर्णित है। पाँचबें से सातवें अध्यायों में ऋषिका पर भगवान् शिव को कृपा और एक असुर से उसके धर्म की रक्षा करके उसके आश्रम में 'नन्दिकेश' नाम से निवास करने की कथा का विवेचन हे |
आठवें से चौदहवें अध्यायों में प्रथम ज्योतिर्लिङ्ग सोमनाथ के प्रादुर्भाव की कथा तथा पन्द्रहवें और सोलहवें अध्यायों में मल्लिकार्जुन एवं महाकाल नामक ज्योतिर्लिङ्गों के आविर्भाव को कथा तथा उसको महिमा का प्रतिपादन है । सत्रहवें अध्याय में महाकाल के माहात्म्य के प्रसङ्ग में शिव भक्त राजा चन्द्रसेन तथा गोप-बालक श्रीकर की कथा का उल्लेख है। अठारहवें अध्याय में विन्ध्य को तपस्या तथा ओंकार में परमेश्वर के प्रादुर्भाव एवं उसकी
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महिमा का कथन है । उन्नीसवें से इक्कीसबें अध्यायों में केदारेश्वर तथा भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिङ्गों के आविर्भाव की कथा तथा उनका माहात्म्य दर्शाया गया है। बाईसवें और तेईसवें अध्यायों में विश्वेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग और उसकी महिमा के प्रसद्ध में पञ्चकोशी की महत्ता का प्रतिपादन है ।
इस संहिता के चौबीसवें से छब्बीसवें अध्यायों में त्र्यम्बक ज्योतिर्लिङ्ग के प्रसङ्ग में महर्षि गौतम के द्वारा किये गये परोपकार, उनका तप के प्रभाव से अक्षय जल प्राप्त करके ऋषियों की अनावृष्टि के कष्ट से रक्षा करना, पत्नी-सहित गौतम को आराधना से सन्तुष्ट होकर भगवान् शिव का उन्हें दर्शन देना, गङ्गा को वहाँ स्थापित करके स्वयं भी स्थिर होना और गङ्गा का गौतमी (गोदावरी) नाम से और शिव का त्यम्बक ज्योतिर्लिङ्ग के नाम से विख्यात होने का कथन है। सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें अध्यायों में वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग के प्राकट्य की कथा एवं उसकी महिमा तथा उन्तीसवें और तीसवें अध्यायों में नागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग के प्रादुर्भाव एवं उसकी महिमा का वर्णन है। इकत्तीसवें से तैंतीसवें अध्यायों में रामेशवर एवं घुश्मेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्ग का आविर्भाव एवं माहात्म्य दर्शाया गया है।
चौंतीसवें अध्याय में शंकर जी की आराधना से भगवान् विष्णु को सुदर्शन चक्र की प्राप्ति तथा उसके द्वारा दैत्यों के संहार और पैंतीसवें एवं छत्तीसवें अध्यायों में भगवान् विष्णु द्वारा पठित शिवसहस्तनामस्त्रोत का विवेचन है। सैंतीसवें से चालीसवें अध्यायों में भगवान् शिव को सन्तुष्ट करने वाले व्रतों का वर्णन, शिवरात्रि-ब्रत को विधि एवं महिमा का कथन है | इक्तालीसवें अध्याय में मुक्ति और भक्ति के स्वरूप का तथा बयालीसवें अध्याय में शिव, विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा के स्वरूप का विवेचन किया गया है। अन्तिम अध्याय में शिव-सम्बन्धी तत्त्वज्ञान का वर्णन तथा उसकी महिमा का प्रतिपादन है।
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उमा-संहिता
शिव पुराण को उमा-संहिता में विभिन्न पापो तथा दण्ड-स्वरूप मिलने वाले नरकों को यातनाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। पापों का प्रतिकार कुछ अंशों में दान द्वारा कहा गया है, पर उसका मुख्य उपाय 'तप' ही है। तप का अर्थ यह होता है कि मनुष्य से परिस्थिति-वश जो पाप-कर्म हो जाते हैं, उनका दण्ड उसने स्वेच्छा-पूर्वक सहन कर लिया |
इस संहिता के प्रथम तीन अध्यायों में भगवान् श्रीकृष्ण के तप से सन्तुष्ट हुए शिव और पार्वती का उन्हें अभीष्ट वर देने तथा शिव की महिमा का उल्लेख है । चौथे से छठें अध्यायों में नरक में गिराने वाले पापों का संक्षिप्त परिचय है । सातवें अध्याय में पापियों और पुण्यात्माओं की यमलोक-यात्रा का वर्णन है। आठवें अध्याय में नरकों को अट्ठाईस कोटियों तथा प्रत्येक के पाँच-पाँच नायक के क्रम से एक सौ चालीस रौरवादि नरकों की नामावली दी गयी है। नौवें एवं दसवें अध्यायों में विभिन्न पापों के कारण मिलने वाली नरक-यातना का वर्णन तथा कुक्कुरबलि, काकबलि एवं देवता आदि के लिए दी हुई बलि की आवश्यकता एवं महत्ता का प्रतिपादन है।
ग्यारहवें अध्याय में यमलोक के मार्ग में सुविधा प्रदान करने वाले विविध दानों का वर्णन है तथा बारहवें अध्याय में जलदान, जलाशय-निर्माण, वृक्षारोपण, सत्य भाषण और तप की महिमा का विवेचन है। तेरहवें से सोलहवें अध्यायों में वेद और पुराणों के स्वाध्याय तथा विविध प्रकार के दान की महिमा, नरकों का वर्णन तथा उनमें गिराने वाले पापों का दिग्दर्शन, पापों के लिए सर्वोत्तम प्रायश्चित्त शिव स्मरण तथा ज्ञान के महत्त्व का प्रतिपादन है ।
इसी संहिता के सत्रहवें से पच्चीसवें अध्यायों में मृत्युकाल निकट आने के कौन-कौन से लक्षण हैं, इसका वर्शन किया गया है। छब्बीसवें अध्याय में काल को जीतने का उपाय, नवधा शब्द ब्रह्म एवं तुंकार के अनुसंधान और उससे प्राप्त होने वाली सिद्धियों का विवेचन है |
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सत्ताइसवें अध्याय में काल या मृत्यु को जीतकर अमरत्व प्राप्त करने की चार यौगिक साधनाओं--प्राणायाम, भ्रूमध्य में अग्नि का ध्यान, मुख से वायुपान तथा मुडी हुई जिह्वा द्वारा गले की घाँटी का स्पर्श का उल्लेख किया गया है |
अट्ठाईसबें से पैंतालीसवें अध्यायों में भगवती उमा के कालिका-अवतार की कथा का वर्णन हे । छियालीसवें अध्याय में सम्पूर्ण देवताओं के तेज से देवी का महालक्ष्मी रूप में अवतार और उनके द्वारा महिषासुर के वध का विवेचन हे । सैंतालीसवें अध्याय में देवी उमा के शरीर से सरस्वती का आविर्भाव, उनके रूप को प्रशंसा सुनकर शुम्भ का उनके पास दूत भेजना, दूत के निराश लौटने पर शुम्भ का क्रमश: ध्रूमलोचन, चण्ड, मुण्ड तथा रक्तबीज को भेजना तथा देवी द्वारा उन सबके मारे जाने का उल्लेख है। अडतालीसवें अध्याय में देवी के द्वारा सेना और सेनापतियों सहित निशुम्भ एवं शुम्भ के संहार का कथन है। उन्चासवें अध्याय में देवताओं का गर्व दूर करने के लिये तेजः पुञ्जरूपिणी उमा के प्रादुर्भाव का चित्रण है। पचासवें अध्याय में उमा देवी के द्वारा दुर्गमासुर का वध तथा उनके दुर्गा, शताक्षी, शाकम्भरी और भ्रामरी आदि नाम पड़ने का कारण दिया गया है तथा इक्यावनबें अध्याय में देवी के क्रिया योग का वर्णन है।
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केलास-संहिता
कैलास-संहिता में योगशास्त्र के आसन, प्राणायाम, जप, ध्यान के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करके सांसारिक बन्धनों से छुटकारा पाने का मार्ग-दर्शन है। इस संहिता के प्रथम ग्यारह अध्यायों में ऋषियों द्वारा सूत जी से प्रणवार्थ-निरूपण के लिए अनुरोध करने पर सूत जी प्रणव का अर्थ बतलाते हैं । बारहवें अध्याय में प्रणव के वाच्यार्थ रूप सदाशिव के ध्यान, वर्णाश्रम- धर्म के पालन का महत्त्व, ज्ञानमयी पूजा, संन्यास के पूर्वाङ्गभूत नान्दीश्राद्ध एवं ब्रह्म यज्ञ आदि का वर्णन किया गया है। तेरहवें अध्याय में संन्यास-ग्रहण की शास्त्रीय विधि-गणपति-पूजन, होम, तत्त्व-शुद्धि, सावित्री-प्रवेश, सर्वसंन्यास और दण्ड-धारण आदि का प्रकार बतलाया गया है। चौदहवें अध्याय में वामदेव द्वारा प्रणव के छः प्रकार के अर्थ पूछने पर स्कन्द जी ने उसका छः प्रकार से विवेचन किया है।
कैलास-संहिता के पन्द्रहवें और सोलहवें अध्यायों में शैव दर्शन के अनुसार शिव तत्त्व, जगत्-प्रपञ्च और जीव तत्त्व के विषय में विशद विवेचन तथा शिव से जीव और जगत् की अभिन्नता का प्रतिपादन है । सत्रहवें से उन्नीसवें अध्यायों में महावाक्यों के अर्थ पर विचार तथा संन्यासियों के योगपट्ट का प्रकार बतलाया गया है। बीसवें और बाईसवें अध्यायों में यति के अन्त्येष्टि-कर्म को दशाहपर्यन्त विधि का वर्णन है। तेईसवें अध्याय में यति के द्वादशाह-कृत्य का वर्णन, स्कन्द और वामदेव का कैलास पर्वत पर जाना और सूत जी के द्वारा इस संहिता के उपसंहार का विवेचन किया गया है ।
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वायवीय-संहिता
यह संहिता दो खण्डों में विभक्त है--पूर्व खण्ड और उत्तर खण्ड। पूर्व खण्ड में कुल 35 अध्याय हैं। पूर्व खण्ड के प्रथम अध्याय में ऋषियों द्वारा प्रश्न पूछने पर लोमहर्षण सूत जी ने 14 विद्याओं का वर्णन किया | 14 विद्याएँ हैं--6 वेदाङ्ग, 4 वेद, मीमांसा, न्यायशास्त्र, पुराण और धर्मशास्त्र। इनके साथ आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्थर्ववेद और अर्थशास्त्र को भी गिन लिया जाय तो ये विद्याएँ 18 हो जाती हैं। द्वितीय अध्याय में ऋषियों का ब्रह्मा जी के पास जाकर उनकी स्तुति करके उनसे परम पुरुष के विषय में प्रश्न करना और ब्रह्मा जी का आनन्दमग्न होकर 'रुद्र' कहकर उत्तर देने का कथन है | तृतीय अध्याय में ब्रह्मा जी के द्वारा परमतत्त्व के रूप में भगवान् शिव की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है।
चौथे और पाँचवें अध्यायों में नैमिषारण्य में दीर्घसत्र के अन्त में मुनियों के पास वायु देवता का आगमन, उनका सत्कार तथा ऋषियों के पूछने पर वायु के द्वारा पशु, पास एवं पशुपति का तात्त्विक विवेचन किया गया है | छठें अध्याय में महेश्वर की महत्ता का प्रतिपादन है। सातवें से बारहवें अध्यायों में ब्रह्मा जी को मूर्च्छा, उनके मुख से रुद्रदेव का प्राकट्य, सप्राण हुए ब्रह्मा जी के द्वारा आठ नामों से महेश्वर को स्तुति तथा रुद्र की आज्ञा से ब्रह्मा द्वारा सृष्टि-रचना का कथन है | तेरहवें और चौदहवें अध्यायों में भगवान् रुद्र के ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट होने का रहस्य तथा रुद्र के महामहिम स्वरूप का वर्णन किया गया है।
पन्द्रहवें अध्याय में ब्रह्मा जी के द्वारा अर्द्धनारीश्वर की स्तुति तथा उस स्त्रोत की महिमा का उल्लेख है। सोलहवें अध्याय में महादेव के शरीर से देवी का प्राकट्य और देवी के भ्रूमध्य भाग से शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। सत्रहवें से चौबीसवें अध्यायों में भगवान् शिव का पार्वती तथा पार्षदों के साथ मन्दराचल पर जाकर रहना, शुम्भ-निशुम्भ के बध के लिए ब्रह्मा जी की प्रार्थना से शिव का पार्वती को 'काली' कहकर कुपित करना और काली का 'गौरी' होने के लिए तपस्या के निमित्त जाने की आज्ञा माँगने का प्रतिपादन है । पच्चीसवें अध्याय में
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पार्वती की तपस्या, एक व्याघ्र पर उनकी कृपा, ब्रह्मा जी का उनके साथ वार्तालाप, देवी द्वारा काली त्वचा का त्याग और उससे कृष्णवर्णा कुमारी कन्या के रूप में उत्पन्न हुई कौशिकी के द्वारा शुम्भ-निशुम्भ के वध की कथा का विवेचन है। छब्बीसवें अध्याय में गौरी देवी का व्याघ्र को अपने साथ ले जाने के लिए ब्रह्मा जी से आज्ञा माँगना, ब्रह्मा जी का उसे दुष्कर्मी बताकर रोकना, देवी का शरणागत को त्यागने से इनकार करना, ब्रह्मा जी का देवी की महत्ता बताकर अनुमति देना और देवी का माता-पिता से मिलकर मन्दराचल को जाने का कथन हे |
सत्ताईसवें अध्याय में मन्दराचल पर गौरी देवी का स्वागत, महादेव जी के द्वारा उनके और अपने उत्कृष्ट स्वरूप एवं अविच्छेद्य सम्बन्ध पर प्रकाश तथा देवी के साथ आये हुए व्याघ्र को उनका गणाध्यक्ष बनाकर अन्तःपुर के द्वार पर सोमनन्दी नाम से प्रतिष्ठित करने का वर्णन है। अट्ठाईसवें और उन्तीसबें अध्यायों में अग्नि और सोम के स्वरूप का विवेचन तथा जगत् को अग्नीषोमात्मकता का प्रतिपादन है । तीसवें से तैंतीसवें अध्यायों में ऋषियों के पूछने पर वायुदेव के द्वारा शिव के स्वतन्त्र एवं सर्वानुग्राहक स्वरूप का विवेचन, परम धर्म का प्रतिपादन, शैवागम के अनुसार पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनों का वर्णन किया गया है।
इसी खण्ड के चौंतीसवें और पैंतीसवें अध्यायों में वायुदेव ने ऋषियों को बतलाया कि उपमन्यु ने अपनी माता की आज्ञा से भगवान् शिव को कठोर तपस्या को और भगवान् शिव ने
इन्द्र-रूप धारण करके उपमन्यु के भक्ति-भाव को परीक्षा लेकर उन्हें क्षीर-सागर आदि बहुत से वर प्रदान किये।
वायवीय संहिता ( उत्तर खण्ड )
वायवीय संहिता के उत्तर खण्ड में कुल 41 अध्याय हैं, जिनमें ऋषियों के पूछने पर वायुदेव द्वारा श्रीकृष्ण और उपमन्यु के मिलने के प्रसङ्ग का विवेचन किया गया है। प्रथम दो अध्यायों में श्रीकृष्ण को उपमन्यु से ज्ञान का और भगवान् शंकर से पुत्र-लाभ का वर्णन है। तृतीय अध्याय में भगवान् शिव को ब्रह्मा आदि पञ्च-मूर्तियों, ईशानादि ब्रह्म-मूर्तियों तथा पृथ्वी एवं शर्व आदि अष्ट मूर्तियों का परिचय और उनको सर्वव्यापकता का उल्लेख है । चतुर्थ और
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पंचम अध्यायों में परमेश्वर शिव के यथार्थ स्वरूप का विवेचन तथा उनकी शरण में जाने से जीव के कल्याण का कथन है | छठें अध्याय में शिव के शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वमय, सर्वव्यापक एवं सर्वातीतं स्वरूप का तथा उनकी प्रणवरूपता का प्रतिपादन किया गया है |
सातवें और आठवें अध्यायों में परमेश्वर की शक्ति का ऋषियों द्वारा साक्षात्कार, शिव के प्रसाद से प्राणियों की मुक्ति, शिव की सेवा-भक्ति तथा पाँच प्रकार के शिव-धर्म का वर्णन है। नौवें अध्याय में शिव-अवतार, योगाचार्यों तथा उनके शिष्यों की नामावली दी गयी है। दसवें अध्याय में भगवान् शिव के प्रति श्रद्धा-भक्ति की आवश्यकता का प्रतिपादन, शिव-धर्म के चार पादों का वर्णन एवं ज्ञानयोग के साधनों तथा शिव-धर्म के अधिकारियों का निरूपण किया गया है।
ग्यारहवें अध्याय में वर्णाश्रम-धर्म तथा नारी-धर्म का वर्णन, शिव के भजन, चिन्तन एवं ज्ञान की महत्ता का प्रतिपादन है। बारहवें और तेरहवें अध्यायों में पञ्चाक्षर-मन्त्र की महिमा, उसमें समस्त वाङ्मय की स्थिति, उसकी उपदेश-परम्परा, देवी-रूपा पज्चाक्षर-विद्या का ध्यान, उसके समस्त और व्यस्त अक्षरों के ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति तथा अङ्गन्यास आदि का विचार व्यक्त किया गया है। चौदहवें अध्याय में गुरु से मन्त्र लेने तथा उसके जप करने की बिधि, पाँच प्रकार के जप तथा उसकी महिमा, मन्त्र-गणना के लिये विभिन्न प्रकार की मालाओं का महत्त्व तथा अंगुलियों के उपयोग का वर्णन, जप के लिये उपयोगी स्थान तथा दिशा, जप में वर्जनीय बातें, सदाचार का महत्त्व, आस्तिकता की प्रशंसा तथा पञ्चाक्षर-मन्त्र को विशेषता का वर्णन किया गया है।
इस खण्ड के पन्द्रहवें अध्याय में त्रिविध दीक्षा का निरूपण, शक्तिपात की आवश्यकता तथा उसके लक्षणों का वर्णन, गुरु का महत्त्व, ज्ञानी गुरु से ही मोक्ष की प्राप्ति तथा गुरु के द्वारा शिष्य को परीक्षा का विवेचन किया गया है। सोलहवें से उन्नीसवें अध्यायों में समय- संस्कार या समयाचार को दीक्षा को विधि एवं षडध्वशोधन की विधि का प्रतिपादन है। बीसवें
से तेईसवें अध्यायों में अन्तर्याग अथवा मानसिक पूजा विधि का वर्णन है । पच्चीसवें से सत्ताइसवें अध्यायों में शिव-पूजा की विशेष विधि तथा शिव-भक्ति की महिमा का उल्लेख है | अट्ठाइसवें और उन्तीसवें अध्यायों में काम्य कर्म के प्रसद्ध में शक्ति-सहित पञ्चमुख महादेव की पूजा का विधान दर्शाया गया है। तीसवें अध्याय में आवरण-पूजा की विस्तृत विधि तथा उक्त विधि से पूजन की महिमा का वर्णन है।
इक्तीसवें अध्याय में शिव के पाँच आवरणों में स्थित सभी देवताओं की स्तुति तथा उनसे अभीष्टपूर्ति एवं मंजुल को कामना का विधान दर्शाया गया है। बत्तीसवें अध्याय में ऐहिक फल देने वाले कर्मो और उनको विधि का वर्णन, शिव-पूजन की विधि, शान्ति-पुष्टि आदि विविध काम्य कर्मा में विभिन्न हवनीय पदार्थो के उपयोग का वर्णन है। तैंतीसवें से छत्तीसवें अध्यायों में पारलौकिक फल देने वाले कर्म-शिवलिङ्ग-महाब्रत की विधि और महिमा का विवेचन है। सैंतीसबें अध्याय में योग के अनेक भेद, उसके आठ और छः अङ्घों का विवेचन- यम नियम, आसन, प्राणायाम, दशविधि प्राणों को जीतने को महिमा, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का निरूपण किया गया है। अड्तीसवें अध्याय में योगमार्ग के विघ्न, सिद्धि-सूचक उपसर्ग तथा पृथ्वी से लेकर बुद्धि तत्त्वपर्यन्त ऐश्वर्य गुणों का वर्णन है।
उन्तालीसवें अध्याय में ध्यान और उसको महिमा, योगधर्म तथा शिवयोगी का महत्त्व, शिवभक्त या शिव के लिये प्राण देने अथवा शिव क्षेत्र में मरण से तत्काल मोक्ष-लाभ का कथन है। चालीसवें अध्याय में वायुदेव का अन्तर्धान, ऋषियों का सरस्वती में अवभृथ-स्नान और काशी में दिव्य तेज का दर्शन करके ब्रह्मा जी के पास जाना, ब्रह्माजी की उन्हें सिद्धि-प्राप्ति को सूचना देकर मेरु के कुमारशिखर पर भेजने का उल्लेख है। इस संहिता के अन्तिम अध्याय में मेरुगिरि के स्कन्द-सरोवर के तट पर मुनियों का सनत्कुमार जी से मिलना, भगवान् नन्दी का वहाँ आना और दृष्टिपात मात्र से पाशच्छेदन एवं ज्ञानयोग का उपदेश करके चला जाना, शिवपुराण को महिमा का प्रतिपादन किया गया है।
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तृतीय अध्याय
शिव पुराण के प्रमुख पात्रो का चरित्र-चित्रण
४० 972 ४४ ७ (४ # (४ ७० ५0
भगवान् शिव सती
पार्वती
कुमार कार्तिकेय गणेश
ब्रह्मा
भगवान् विष्णु शंखचूड तारकासुर
चरित्र-चित्रण
प्रस्तुत अध्याय में शिव पुराण के प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण विवेचित हे । शिव पुराण में भगवान् शंकर, सती, पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु आदि देव-पक्ष तथा तारकासुर, शंखचूड आदि दैत्य-पक्ष के प्रमुख पात्र वर्णित हैं।
जिनका विवेचन अधोलिखित है--
भगवान् शिव
भगवान् शिव सृष्टि के आदि काल से ही समस्त प्राणी-समूह के दुःख-विनाशक एवं मंगलदायक आशुतोष के रूप में प्रतिष्ठित हैं। यह आदि और अन्त में मंगल रूप, समदर्शी एवं भक्तों का कल्याण करने वाले हैं। आद्यन्त में भी सम्पूर्ण विश्व कारणात्मा से इनमें स्थित है। ये जरा-मरण रहित, स्वप्रकाश-स्वरूप पंचमुख एवं पञ्चमहापातक दूर करने वाले हैं।! शिव- पुराण के प्रमुख नायक, परमशक्ति-सम्पन्न, देवाधिदेव भगवान् शंकर हैं। शिव पुराण का अध्ययन करने से भगवान् शिव के चरित्र में निम्नलिखित विशेषतायें परिलक्षित होती हैं ।
शिव पुरण में भगवान् शिव निर्गुण और सगुण, निराकार एवं साकार, दोनों रूपों में वर्णित हैं। कोटिरुद्र-संहिता के 42वें अध्याय में सूत जी ने ऋषियों को बताया है किआदि सृष्टि में जो निर्गुण परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं, वेद और वेदान्त के ज्ञाताओं ने उनको ही शिव नाम वाला कहा है।2 भगवान् शिव ने स्वयं कहा है--'' मेरे सकल और निष्कल भेद से दो स्वरूप हैं। इसमें ब्रह्म रूप निष्कल है और ईश-रूप सगुण है। मैं ही परब्रह्म हुँ और मेरा ही
1. शि० पु०, वि० सं०--1 : 1 2. शि० पु०, को० रु० सं०--42 : 2 3. शि० पु०, वि० सं०--9 : 30, 31
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'सकल', 'अकल' रूप है । ब्रह्म होने से मैं ईश्वर हूँ, अनुग्रहादि मेरा कृत्य है ।1 प्रथम तो ब्रह्म ज्ञान के निमित्त निष्कल ब्रह्म का प्रादुर्भाव हुआ 2
शिव ही एक ब्रह्म होने से निष्कल कहलाते हैं । रूपी होने से वह सगुण हो जाते हैं इस कारण वह सगुण-निर्गुण कहलाते हैं । निष्कल होने से वह निराकार हैं 13 लिंग, बेर आदि से सदा प्राणी इनकी पूजा करते हें ४ भगवान् शिव भक्तों एवं देवताओं की प्रार्थना पर निर्गुण से सगुण हो जाते हैं। शिव ब्रह्म-रूप और कला-रहित होने से निर्गुण कहलाते हैं ।5
रुद्र-संहिता के पार्वती--खण्ड में पार्वती ने ब्रह्मचारी-वेषधारी शिव से कहा है कि यथार्थ में वे निर्गुण ब्रह्म हैं; कारणवश सगुण हो जाते हैं, निर्गुण गुणात्मक की जाति किस प्रकार हो सकती है।6 भगवान् शिव देवताओं में ब्रह्मा, रुद्रों में नीललोहित, सब भूतों की आत्मा हैं, सांख्य वाले शिव को 'पुरुष' कहते हैं। पर्वतों में सुमेरू, नक्षत्रों में चन्द्रमा हैं, ऋषियों में वशिष्ठ, देवताओं में इन्द्र हैं । वेदों में ओंकार, संसारके रक्षक हैं; लोक के हित के लिए सब प्राणियों की रक्षा करते हैं 7
शिव पुराण में शिव के विभिन्न स्वरूप वर्णित हैं। शिर पर गंगा धारण करने वाले, मस्तक पर चन्द्रमा, तीन नेत्र, पाँच मुख, प्रसन्नात्मा, दशभुजा, त्रिशूलधारी, कर्पूरगौरांग, भस्म शरीर में लगाये हुए शिव का बाह्य स्वरूप हे |8 शिव आश्रय-रहित, असंग, कुरूप, गुणहीन, श्मशानवासी, सर्पधारी, योगी, नग्न, मलिन-शरीर, सर्पों के भूषण धारण करने वाले, कुल नाम
शि० पु०, वि० सं०--9 : 36
वही--9 : 39
वही--5 : 10, 11
वही--5 : 13
वही--5 : 20
शि० पु०, रु० सं०, पा० सं०--28 : 6
. शिल पु, रु० सं०, कु० सं०--12 : 42-44 . शि० पु०, रु० सं०, सृ० सं०--6 : 25, 26
9० 3 9४ फ ४४ ० :-
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से अज्ञात, कुशील, विहार-रहित, शरीर में भस्म मलने बाले, क्रोधी, अज्ञानी, अज्ञात आयु वाले, सदा विकट जटाधारी सबको आश्रय देने बाले भ्रमण करने वाले, नागों के हार धारण करने वाले, भिक्षुक, कुमार्ग में निरत, हठ से वेद मार्ग का त्यागने वाला रूप भी वर्णित हे ।1
शिव-पुराण में शिव सामान्य देवता नहीं हैं। वे परमात्मा, सबके ईश्वर हैं। इन्द्रादिक सभी देवता उनकी आज्ञा मानते हें । प्रजापति, मुनि, सिद्ध, उरग-गण उनके वशवर्ती हैं। उनके भुकुटी फेरने मात्र से प्रलय हो जाता है। वह शिव पूर्ण रूप, लोक का संहार करने वाले हैं। वह सत्पुरुषों गति, दुष्टों को मारने वाले, निर्विकार से परे हैं। वह ब्रह्मा और हरि के भी
अधिपति महेश्वर हैं। उनके शासन की कोई अवमानना नहीं कर सकता 2
भगवान् शम्भु दीनबन्धु, परात्पर हैं। आप भक्त-वत्सल अपने ही कर्त्तव्य से आप प्रसन्न होते हैं 13 यद्यपि शिव सबके ईश्वर हैं, तथापि भक्तों के अधीन हें ।4 भगवान् शिव गुणमयी अपनी माया में प्रवेश करके जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हुए क्रिया के अनुसार नाम धारण करते हें | वास्तव में वे एक ही हैं।5 भगवान् शिव, विष्णु आदि देवताओं के निन्दकों को कभी भी स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है--जो हरि-भक्त होकर मेरी निन्दा करे तो हम दोनों देवताओं के शाप से उसको तत्त्व की प्राप्ति नहीं होगी 16
भगवान् शिव दुःसाध्य एवं दुर्लभ हें । गिरिराज हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती से शिव- प्राप्ति को दुर्गम बताते हुए कहा कि जैसे आकाश में स्थित चन्द्रमा को कोई ग्रहण नहीं कर
. शि० पु०, रु० सं०, पा० सं०--31 : 44-47 . शि० पु०, रु० सं०, यु० खण्ड--32 : 24-28 . शिल पु०, रु० सं०, स० खं०--42 : 41
. वही-43 : 3
. शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--43 : 13
. वही-43 : 21
(७ (८7 POD >
{ 55)
सकता उसी प्रकार हे पापरहित! तुम शिव को दुर्गम जानो।! परन्तु वे तपस्या से प्राप्त होने वाले भी हैं । पार्वती कहती हैं कि मैं सत्य-सत्य कहती हूँ कि भगवान् शंकर केवल महान् तपस्या के बल से ही सेवित हो सकते हैं।2 महर्षि नारद ने भी पार्वती के माता-पिता को समझाते हुए कहा कि शिव जी शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं। वे शिवा को अवश्य ग्रहण करेंगे। वे शंकर तप से सिद्ध हो सकते हैं, यदि तुम्हारी पुत्री तपस्या करे 13
भगवान् शिव युवतियों को तपस्या में विघ्न करने वाली मानते हैं। वे पार्वती के पिता हिमालय से पार्वती को दर्शनार्थ अपने निकट लाने के लिए मना करते हैं। वे कहते हैं कि सुन्दर नितम्ब वाली, श्रेष्ठ चन्द्रमा के समान मुख वाली इस कुमारी को तुम मेरे समीप मत लाना। इस विषय में तुमको बार-बार निषेध करता हूं । वेद-पारगामी ब्राह्मणों ने स्त्री को मायारूपिणी कहा है। विशेषकर युवती, तपस्वियों को विघ्न करने वाली होती है। मैं तपस्वी, योगी, माया से सदा पृथक् हूँ। हे भूधर! युवती, स्त्री से मेरा प्रयोजन ही क्या है? हे पर्वतराज! स्त्रियों से शीघ्र ही विषयोत्पत्ति होती है। उससे वैराग्य और श्रेष्ठ तप नष्ट हो जाताहै। हे शैलराज! इस कारण तपस्वियों को स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिए। यह महाविषय का मूल, ज्ञान-वैराग्य का नाश करने वाला है 4
पर्वतराज-पुत्री पार्वती के विवाह के लिए सहमत करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं के कहने पर शिव जी कहते हैं कि जहाँ तक बने, मनुष्यों तक को विवाह-बन्धन उचित नहीं है। यह दृढ़ बन्धन विवाह मायानिगड बन्धन है | लोगों को संसार में बहुत से कुसंग हैं । उनमें स्त्री-संग महा हानिकारक है। सब बन्धनों से उद्धार हो सकता है, परन्तु स्त्री-बन्धन
. शिन पु०, रु० सं०, पा० खं०-23 : 7 वही--22 : 15
. बही--8 : 22
. वही--12 : 28-33
> ७०) r
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से छुटकारा नहीं हो सकता । लोहे के तथा दारुमय पाशों से दृढ़ बंधा हुआ भी पुरुष छुटकारा पा सकता है, परन्तु स्त्री-संग के पाश में बंधा हुआ कभी छुटकारा नहीं पा सकता।!
भगवान् शिव कामदेव को भस्म करने वाले हैं। रति के विलाप तथा देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर रति को वरदान दिया कि श्रीकृष्ण का पुत्र प्रद्युम्न तुम्हारा पति होगा 2
शिव जी का पत्नी के प्रति अगाध प्रेम है। उमा ने स्वयं विष्णु आदि देवताओं से कहा है--वह (शिव) प्रेम से मेरी अस्थियों की पवित्र माला को प्रेम से गले में धारण किये भी कहीं शान्ति को नहीं प्राप्त होते और निरन्तर जागृत् रहते हैं। अनीश के समान वह प्रभु इधर-उधर ऊँचे स्वर से रोदन करते हैं। योग्य-अयोग्य के ज्ञान से रहित सर्वदा सर्वत्र भ्रमते रहते हैं। इस प्रकार कामियों की गति दिखाते हुए शंकर लीला करते हैं और विरह से व्याकुल हो कामियों के समान वाणी बोलते हैं 8
भगवान् शिव लोक-रीति एवं मर्यादा के प्रतिपालक हैं। उन्होंने थोडे से दोष के कारण सती-जैसी पवित्र नारी का परित्याग कर दिया। उन्होंने कहा--यदि मैं दक्षसुता से पूर्ववत् स्नेह करूँगा तो लोक-लीला का अनुसरण करने वाली मेरी प्रतिज्ञा भंग हो जायेगी ।4
शिव ही जगत् के धाता, सब विद्या के प्रति प्रभु हैं। वही आदि विद्या के श्रेष्ठ स्वामी, सब मंगलों के मंगल करने बाले हैं 5
भगवान् शिव लीलाधारी हैं। पार्वती-प्राप्ति हेतु नट का रूप धारण किया। उसी समय लीला करने में तत्पर, भक्त-वत्सल, नचाने वाले नट का रूप धारण कर मेनका के समीप गये |
शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--24 : 60-62 वही--19 : 40
वही--4 : 37-39
शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--25 : 50
. वही--31 : 18
ती दक पक जी ता
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बायें हाथ में शृंगी और दाहिने हाथ में डमरू, पीठ पर गुदडी धारे लाल वस्त्र पहने नृत्य और गान में चतुर, इस प्रकार का रूप धारण कर मेनका के द्वार पर बड़ी प्रसन्नता से अनेक प्रकार का नृत्य और मनोहर गान करने लगे।!
पार्वती-विवाह में द्वार-पूजा के अवसर पर शिव तथा उनके अनुचरों का दृश्य दर्शनीय है । कोई वायु का रूप धारे पताका के समान मर-मर शब्द वाले वक्रतुण्ड और विरूपाक्ष थे। किन्हीं को विकराल दाढी, मूळे, कोई गंजे, कोई नेत्रहीन, कोई दण्ड, पाश और कोई मुद्गर हाथों में लिये थे। कोई-कोई विरुद्ध वाहनों पर चढे शृंगीनाद करने वाले, कोई डमरू बजाते और कोई-कोई मुख से शब्द करते थे। कोई मुख-रहित, कोई विकट-मुख, कोई गण बहुत मुख वाले थे। कोई हाथ-रहित, कोई विकट हाथ वाले और कोई बहुत हाथ वाले थे। वता इस प्रकार शिव जी के साथ नाना वेशधारी गण थे 2
इस प्रकर के गणों के मध्य में निर्गुण, सगुण रूप शंकर को वृष पर चढे, पाँच-मुख, तीन-नेत्र, विभूति-भूषित मेना ने देखा। जो जटा-जूट, बांधे, माते पर चन्द्रमा धारे, दश हाथ, कपाल धारे, व्याघ्र चर्म ओढे, हाथ में पिनाक् धनुष लिए, शूल-युक्द, विरूपाक्ष, विकट-रूप, गजचर्म ओढे, शंकर के देख पार्वती की माता बडी व्याकुल हुई 8 भगवान् शंकर मेना की व्याकुलता को देखकर पुन: परमानन्द-दायक रूप धारण करते हैं-- कोटिसूर्यप्रतीकाशं सर्वावयवसुन्दरम् । विचित्रवसनं चात्र नानाथूषणभूषितम् ॥ सुप्रसन्नं सुहासं च सुलावण्यं मनोहरम्।
1. शिल पु, रु० सं०, पा० खं०--30 : 26 : 28 2. वही-43 : 51-55 3. वही-43-59-61
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गोराभंद्ुतिसंयुक्तं चन््ररेखाविभूविताम् XN > > > > X
अर्थात् कोटि सूर्य के समान कान्तिमान, सम्पूर्ण अवयवों से सुन्दर, विचित्र वस्त्र और अनेक प्रकार के भूषण धारण किये, प्रसन्नता से युक्त, सुन्दर लावण्य से मनोहर, गौर-कांति, चन्द्रशेखर से विभूषित, विष्णु आदि सब देवता प्रेम से जिनकी सेवा कर रहे हैं, शिर के ऊपर सुन्दर छत्र और चन्द्रमा विशेष रूप से शोभायमान हो रहा था ।< > <! वहीं हिमाचल के नगर में शिव का परम रमणीय रूप दर्शनीय है, चम्पे के वर्ण के समान कान्ति वाले, पंच-मुख, तीन-नेत्र, कुछेक हास्य से प्रसन्न-मुख, रत्न और सुवर्णादि से भूषित, मालती की माला पहने, अच्छे रत्नों का उज्ज्वल मुकुट धारण किये, सुन्दर कंठ का भूषण धारण किये, कंगन और बाजूबन्दों से शोभायमान, अति सूक्ष्म मनोहर विभूति लगाये, अमूल्य शोभायमान वस्त्र धारण किये हुए थे ७८ > »2
भगवान् शिव ने विवाहोपरान्त अपने स्थान में आकर मुनियों को प्रणाम किया। यद्यपि सब देवता उनको प्रणाम करते हैं, तथापि लौकिक आचार से उन्होंने ब्रह्मा और विष्णु को प्रणाम किया 13
शिव जी का एक नाम पशुपति है। चूंकि देवता, असुर सब कोई उन प्रभु के पशु हैं और शिव जी उन पशुओं को पाश-मुक्त करने वाले हैं, इसलिए उन्हें पशुपति भी कहा जाता है ।4
इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान् शिव चराचर के स्वामी, सृष्टि-पालन-संहारकर्ता,
. शिल पु०, रु० सं०, पा० खं०--45 : 9-18 . वही - 46 : 5-10
. वही-51 : 33
. शि० पु०, रु० सं०, यु० खं०--9 : 23-24
न> (0 ७ r—
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आशुतोष, भक्त-वत्सल, क्षमाशील, काम-क्रोधादि-दोष-विवर्जित, कामारि, अद्भुत-लीलाधारी, दिगम्बर, श्मशान-सेवी, सर्पादि भूषणों से भूषित, करुणा-सागर, सती-पार्वती के प्रति अगाध- प्रेम वाले, मर्यादा-रक्षक, देवाधिदेव आदि गुणों से सम्पन्न, सुरासुर-दैत्य-दानवादि से सेवित, सर्वशक्ति-सम्पन्न देवता के रूप में भी शिव पुराण में प्रतिष्ठित हैं।
सती
किसी भी काव्य अथवा नाटक में नायिका की भूमिका नायक से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती । वह भी नायक के सामान्य गुणों से युक्त होती है।! स्वकीया, परकीया एवं सामान्या भेद से नायिका तीन प्रकार की होती है। साहित्य-दर्पण,2 दशरूपक,3 काव्यानुशासन4 एवं रसार्णव-सुधाकरऽ5 में भीइसी प्रकार नायिका के तीन भेद वर्णित हैं ।
नाट्यशास्त्र तथा नाट्यदर्पण में कुलजा, दिव्या, क्षत्रिया और पण्यस्त्री-इन चार प्रकार की नायकिाओं का उल्लेख है 16
शिव पुराण के नायक भगवान् महादेव की दो पत्नियाँ थीं। 1. दक्ष-सुता सती । 2. हिमाचलतनया पार्वती ।
शिवजी का पहले सती के साथ विवाह हुआ था। दक्ष के यज्ञ में देहत्याग के पश्चात् उनका पुनर्विवाह हिमालय को पुत्री पार्वती, जो सती का ही अवतार थीं, के साथ हुआ। सती और पार्वती लोकोत्तर-प्रतिभा-सम्पन्न, दैवी शक्तियों से युक्त सुरासुर-पूजित दिव्य नारी हैं। इनका क्रमशः चरित्र-चित्रण किया जायेगा |
1. “संस्कृत नाटक' ए० बी० कोथ, पृष्ठ 329 ( 1965) 2. अथ नायिका त्रिभेदा स्वान्या साधारणस्त्रीति।
नायकसामान्यगुणैर्भवति यथासम्भव युक्ता ॥ साहित्य दर्पण, 3 : 56 3. स्वान्या साधारशस्त्रीति तद्गुणा नायिका त्रिधा। दशरूपक, 2 : 15 4. ' तद्गुणा स्वपरसामान्या नायिका त्रिधा।' काव्यानुशासन, सप्तम अधिकार 5. नेतृसाधारणगुणैरुपेता नायिका मता।
स्वकोया परकीया च सामान्या चेति सात्रिधा॥ रसार्णवसुधाकर, 1 : 94
6. “नायिका कुलजा दिव्या क्षत्रिया पण्यकामिनी।' नाट्य दर्पण, 4 : 255
( 61)
शिव पुराण में सती भगवान् शिव को पार्वती से पूर्व अर्द्धागनी थीं । ये ब्रहमाके पुत्र दक्ष प्रजापति की कन्या हें । इनकी माता का नाम असिक्नी वारिणी था। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवों की स्तुति पर देवी ने सती रूप में जन्म लेना स्वीकार किया।2 उन्होंने कहा कि जैसे पृथ्वी पर सभी जन्तु स्त्री के वश में होते हैं, उसी प्रकार मेरी भक्ति से वह महादेव स्त्री के वश में हो जायेंगे,3 क्योंकि उन्हें पूर्ण विश्वास है कि उन्हें दुर्गा-शिव शक्ति को छोड़कर शंकर को मोहित करने वाली दूसरी नहीं है ४ दक्ष की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने कहा-मैं उनकी प्रत्येक जन्म में दासी ही हूँ और नाना रूप धारण करने वाले वे भी मेरे पति हैं । हे पुत्र! घर जाओ, शीघ्र ही मैं तुम्हारी कन्या होकर शिव-पत्नी होऊँगी।5
सती नारी-शिरोमणि एवं अनुकरणीय चरित्र वाली हैं। वे शिव के लिए दुःसह तपस्या करती हैं। शिव प्रसन्न होकर उनके सम्मुख प्रकट होते हैं तो सती लज्जित हो जाती हैं।6 लज्जा को धारण कर सती ने शिव से कहा जो कुछ आप की इच्छा हो वही वर दे दीजिए। शिव ने अपनी वामांगी होने का वरदान दिया 7 सती ने शिव से विनम्र निवेदन किया कि हे जगत्पति! देवों के देव! पिता के सन्मुख विवाह की विधि से आप मुझे स्वीकार कीजिए 18 शिवजी के तथास्तु कहने पर उनकी आज्ञा प्राप्त कर सती जी प्रसन्नतापूर्वक अपनी माता के समीप चली गई।? शिव जी ने समय आने पर देवताओं की प्रार्थना पर और स्वयं अपना
. शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--1 : 17 वही--11 : 46
वही--11 : 49
वहीं--11 : 42
वही--12 : 31
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वही--17 : 15
वही--17 : 22
. वही--17 : 24
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( 62 )
अनुराग होने के कारण सती के साथ विवाह किया और ब्रहमा की आज्ञा से दोनों ने अग्नि की प्रदक्षिणा को।! शिवजी संसार के पिता और सती जी संसार की माता और ब्रह्मादि देवता सब उनके दास हैं 2
विवाहोपरान्त सती जी शिव जी के साथ कैलास पर्वत पर जाती हैं, जहां उनके साथ सुन्दर रमणीय स्थानों पर विहार करती हैं । शिव की चेष्टाओं के अनुकूल उन्हें सुख देती हैं 3 सती जीशिव को इतना प्रिय थीं कि शिवजी सती जी के चन्द्ररूपी मुख के अमृत के पान से प्रसन्न हुए। शिव अपनी विशिष्ट अवस्था का कुछ ध्यान न करते थे। उनके मुख कमल के आवास से, उसकी सुन्दरता से, उसकी क्रीडा से महादेव जी ऐसे बंधे, जैसे कोई हाथी रस्सियों से बँधी हो। इस प्रकार हिमालय के कुंजो में, सानुओं पर और गुफाओं में शिब जी सती के साथ प्रतिदिन रमण करते थे।4
सती के चरित्र की अगली विशेषता है उनका सद्गृहिणी होना। सतीजी केवल रमणी ही नहीं, अपितु उनमें गृहिणी के भी गुण विद्यमान हैं। बैवाहिक (दाम्पत्य) जीवन के नूतन सुख सागर में निमज्जित होते हुए भी उन्हें भावी परिस्थितियों का पूर्ण ज्ञान है। वर्षाकाल के आगमन के पूर्व ही वह शिव जी से वर्षाकाल को भयंकरता एवं आवासीय व्यवस्था के प्रति सजग करती हैं। वे कहती हैं कि विषम काल में काक और मयूर भी अपना घोषला बनाते हैं, भला कहो कि बिना घर के तुम कैसे शान्ति पाओगे? हे पिनाको! मुझे मेघों से बड़ा डर लगता है इसलिए मेरे कहने से कहीं घर का प्रबन्ध करो। हे वृषभध्वज! कैलास में अथवा हिमालय में अथवा महाकाशी में अथवा पृथ्वी में, जहाँ उचित -हो, प्रबन्ध करो 5
. शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--19 : 11 वही--19 : 38
. वही-21 : 27
. वही--21 : 45-47
- शि० पु०, ₹० सं०, स० खं०--22 : 18-20
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( 63)
सती नारी-शिरोमणि होते हुए भी नारी-सुलभ मोह से वंचितं नहीं हैं । बन में, सीता के विरह में, विचरण करते समय शिव जी ने जब श्री रामचन्द्रजी को प्रणाम किया तो सती ने उनका परिचय और प्रणाम का कारण पुँछा। भगवान् शिव ने बताया कि हे देवी! यह राम- लक्ष्मण नाम वाले सूर्य-वंशोत्पन्न महाप्राज्ञ दशरथ के पुत्र हैं। इनमें राम नाम वाले पूर्णाश निरुपद्रव विष्णु रूप हैं। यह भूमि पर साधुओं की रक्षा के निमित्त अवतरित हुए हैं 11
शिव, सती के मन में अविश्वास को जानकर उनसे राम की परीक्षा लेने को कहते हैं। सती पति की बात में अविश्वास करके सीता का रूप धारण कर वनचारी विरही राम के पास जाती हैं 2
प्रस्तुत स्थल पर सती के अविवेक का आभास होता है, क्योंकि बिना भावी परिणाम की कल्पना किये वे सीता का रूप धारण कर लेती हैं रामचन्द्रजी द्वारा सती को पहचान लेने पर चकित सती सहज भाव से अपनी शंका कह देती हैं कि शिवजी बिना चुतर्भुज आप का रूप देखकर अत्यन्त आनन्द-मग्न हैं। उन्होंने आप के विषय में मुझसे कहा, पर शिव के वचनों से मेरे मन में भ्रम हो गया, हे राघव! उन्हीं की आज्ञा से मैं आप की परीक्षा लेने आई थी 13
वस्तुतः सती के चरित्रमें एक दोषपूर्ण मोड़ पुन: आया जबकि अपने पति सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वभूतात्मा भगवान् शंकर से उन्होंने असत्य-भाषण किया। जब शिव जी ने सती से पूँछा कि परीक्षा किस प्रकार ली तो सती ने मस्तक झुका लिया और कहा--' कुछ भी परीक्षा न ली ४ सती के जीवन की यह घटना संत-शिरोमणि गोस्वामी जी की निम्नलिखित पंक्तियों का
. शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--24 : 38-40 वही--24 : 41
वही--24 : 57, 58
वही--25 : 45, 46
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ध्यान दिलाती है--
नारि सुभाउ सत्य सब कहही। अवगून आठ सदा उर रहहां॥
साहस अनृत चपलता याया। भय अबिबेक असौच अदाया॥
सती पति के अपमान को न सहन करने वाली स्त्री हैं। यह जानकर कि उनके पिता ने अपने यज्ञ में ब्रहमा, विष्णु, इन्द्र, वशिष्ठ आदि को बुलाया है, सिर्फ शिव को न बुलाकर उनका अपमान किया, वह क्रोधित होकर कहती हैं-जो महादेव की निन्दा करते हैं व निन्दा करते हुए को सुनते हैं वे दोनों चन्द्र-सूर्य की स्थिति पर्यन्त नरकगामी होते हैं 12
इसलिए हे तात! अग्नि में प्रवेश करके देह-त्याग करती हूँ। स्वामी का अनादर सुनने से फिर मुझे जीने से क्या प्रयोजन है 8
सती कहती हैं कि उस जन्म को धिक्कार है, जिस जन्म में महान् पुरुषों की निन्दा हो। बुद्धिमान् को, विशेष कर तुम्हारा सम्बन्ध त्याग देना चाहिए 4
सती स्वाभिमानी नारी हैं। वे अपने पिता के नाम से सम्बन्धित अपने नाम दाक्षायणी तथा दक्ष से उत्पन्न शरीर को भीअपने पास नहीं रखना चाहती हैं। वे कहती हैं-तुम्हारे गोत्रसे जो शंकर मुझे दाक्षायणी कहते हैं, में अब उससे दुःखी होऊँगी। इस कारण तुम्हारे शरीर से उत्पन्न इस गर्हित देह को मैं अभी त्यागकर सुखी होऊँगी।5 इस प्रकार सती, अपने पति शंकर
. श्री रामचरित मानस--लेका काण्ड, दोहा-15 से आगे . शिल पु०, रु० सं०, स० खं०--29 : 38
. वही--29 : 39
. वही-29 : 59
. शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--29 : 60, 61
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(65)
के चरणों का ध्यान करती हुई, योगाग्नि में अपनी देह को भस्म कर सती-शिरोमणि हो गई।!
सती त्रिलोकी की माता, कल्याणी, सदा शंकर के अर्धांग में निवास करने वाली थीं ।2 वह सती विष्णु-माता, जगन्माता, विलासिनी तथा ब्रहमा, इन्द्र, चन्द्र, अग्नि, सूर्यादि को अनादि जननी हैं । वह सती ही तपस्या, दान, धर्म के फल की दात्री हैं। बह शिव की शक्ति, महादेवा, दुष्ट-संहारिणी, परे से परे हैं ।
इस प्रकार सार रूप में कहा जा सकता हे कि सती शिव की शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा का अवतार हैं। ये अनेक दिव्य गुणों से सम्पन्न परम तपस्विनी तथा शिव कौ अनन्य उपासिका हैं। यह सती-शिरोमणि, अनुकरणीय चरित्र वाली, पति में रमणशील, सदगृहिणी, दूरदृष्टि, न्याय, साहस एवं स्वाभिमान सम्पन्न, त्रिजगत् को अनादि जननी, दुष्ट-दल-संहारिणी एवं भक्त-हदय-विहारिणी शिव की अर्द्धांगिनी हैं। यद्यपि इनके चरित्र में नारी-सुलभ दुर्बलता की श्यामलता की झलक दिखाई पड़ती है, तथापि वह निशाकरकी धवल ज्योत्सना में उसकी मलिनता की भाँति विलीन होकर दिव्य चरित्र की नैसर्गिक सुषमा में श्री-बुद्धि ही करती हें सती का चरित्र वह अलौकिक प्रकाश-पुंज है जो नारी-जगत् में सदैव नवजीवन का संचार करता रहेगा।
1. शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--30 : 8 2. वहो--31 : 8
( 66 )
पार्वती
पार्वती लोकोत्तर-प्रतिभा-सम्पन्न, अलौकिक शक्तिमती दिव्य नारी हें । ये पर्वतराज हिमालय और मेना की पुत्री हें । मेना पूर्वजन्म में पितरों (स्वधा) की कन्या थीं।! इनका विवाह विष्णु के अंश-रूप हिमालय से हुआ। इन्हीं मेना और हिमालय से पार्वती का जन्म हुआ।2
पार्वती त्रिलोक-जननी, सब शक्तियों की आद्या हें । यह सदा शिव की प्रिया, सब देवताओं से स्तुति को प्राप्त हैं 13 इन्होंने मेना और हिमालय से कहा था कि मैं पृथ्वी पर अद्भुत लीलाकर देवकार्य करूँगी; शिव-पत्नी होकर सज्जनों को तारूँगी।4 पार्वती हिमालय के यहाँ महाकान्तिमान कन्या होकर लौकिकी गति को आश्रय कर रोदन करने लगीं।5 अरिष्ट को शय्या में उनके मुख के तेज से अर्ध रात्रि के दीपक निस्तेज चित्र के समान रह गये ॥6
पार्वती का वर्ण श्याम है, क्योंकि कहा गया है कि नीलोत्पल-दल के समान श्याम-वर्ण ्रेष्ठद्युति से मनोहर ऐसी कन्या को देखकर गिरिराज बड़े प्रसन्न हुए।? पार्वती-खण्ड अध्याय 46 के 24वें श्लोक में पार्वती को नील अंजन-पर्वत के समान वर्ण वाली अपने अंगों से विभूषित कहा गया है 8
. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--2 : 7, 8 वही-2 : 28
वही--6 : 45
वही--6 : 53
वही--7 : 01
वही--7 : 02
वही--7 ; 07
. वहो--46 : 24
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पार्वती के जन्म के पश्चात् शुभ मुहूर्त में हिमालय ने मुनियों के साथ सुता के काली, तारा, महाविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवीविद्या, धूमावती, बगलामुखी, सिद्धविद्या, मातंगी, कमलात्मिका इत्यादि सुखदायक नाम किये।! इनका कुलोचित नाम पार्वती (पर्वतस्य अपत्यं कन्या पार्वती) लेकर सब उच्चारण करने लगे।
पार्वती अनेक गुणों एवं शुभ लक्षणों से युक्त हें । महर्षि नारद ने इनके गुणों का वर्णन करते हुए हिमालय से कहा है--यह आप की कन्या चन्द्रकला के समान बढती है हे मेने! हे शैलराज! यह सब लक्षण-संयुक्त आद्या कला है। अपने पति को अत्यन्त सुखदायिनी और पति की कीर्ति बढ़ाने वाली होगी । महापतिब्रता सब नारियों में होगी । सब को महा आनन्द करने वाली होगी 12 पार्वती जी का वह प्रभाव है कि भगवती के प्रकट होने से हिमालय के यहाँ
सर्वस्व हो गया और उस नगर के सब दुःख मिट गये।2
महर्षि नारद ने बताया कि पार्वती का पति योगी, नंगा, गुण-रहित, अकाम, माता-पिता से रहित, अमंगल-वेशधारी होगा।* नारद जी की बात को सुनकर मेना और हिमालय दोनों दु: खी हुए; किन्तु जगदम्बिका शिवा शिव जी में यह लक्षण विचार कर मन में अत्यन्त प्रसन्न हुई। दुःखी दम्पति से महर्षि नारद ने पुनः कहा-कर-रेखा तथा ब्रह्मा की लिपि कभी मिथ्या नहीं होती उन्होंने बताया-यह सारे अशुभ लक्षण लीला-रूप-धारी शंकर में पाये जाते हैं । जितने कुलक्षण हैं, शंकर में बह सब सुलक्षण ही हें । प्रभुओं में दोष भी दु:ख के निमित्त नहीं होते, कारण है कि वह दुःख को दूर करने में समर्थ हैं। जैसे रवि पावक और गंगा में अशुभ
. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०-7 : 11 क्ही-8 : 8, 9
वही--6 : 36
वही--8 : 11
. वही--8 : 17
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वस्तु भी पड़ने से वह दोष नहीं होता।!
पार्वती-खण्ड के 12वें अध्याय में प्रथमारूढ-यौवना पार्वती के स्वरूप का वर्णन भगवान् शंकर ने इस प्रकार किया है । पार्वती यौवन को प्रथमावस्था में विकसित नील कमल के समान कांति वाली तथा पूर्ण चन्द्र के समान मुख वाली थी। सम्पूर्ण लालाओं का स्थान सुन्दर वेश से प्रकाशित शंख के समान गर्दन, विशाल नेत्र, सुन्दर दोनों कानों में कर्ण-भूषणों से उज्ज्वल, मृणाल के समान चिकनी लम्बायमान भुजा, कमल-कली के समान घने दृढ़ दोनों स्तन, क्षीणकटि को धारण लिये, त्रिवलीयुक्त मध्य भाग से शोभायमान, स्थल-पद्य के समान दोनों चरणों में विराजमान थी।2 पार्वती का सौन्दर्य, ध्यान में निमग्न मन को वशीभूत करने वाले मुनियों के भी मन को दर्शन मात्र से हरण करने में समर्थ था। वह स्त्रियों की शिरोमणि थीं ।3
पार्वती अति बुद्धिमती एवं विवेकशील तथा साहसी नारी हैं । शिव द्वारा अपने को माया रूपिणी, तपस्या में बाधक एवं ज्ञान-वैराग्य-नाशिनी आदि कह कर समीप आने के लिए निषेध करने पर पार्वती कहतीं है कि हे शिव! तप की शक्ति से युक्त होकर ही आप महातपस्या करते हो, सो आप महात्मा की भी तपस्या करने में बुद्धि लगी।4 वह सब कर्मो को शक्ति प्रकृति कहलाती है। उसी से सबकी उत्पत्ति, पालन और संहार होता है।5 जो आप सुनते, खाते देखते और करते हो यह सब प्रकृति का ही कार्य है। यदि आप प्रकृति से परे हो तो तपस्या
क्यों करते हो। हे प्रभो शंकर! यदि ऐसा ही है तो यहाँ एकान्त तपस्या की आवश्यकता क्या
. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--8 : 19, 20 वही--2 : 6-9
वही--12 : 12
क्ही-13 : 2
. क्ही-13:3
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( 69)
है?!
आगे पार्वती पुनः कहती हैं कि हे योगीश! बहुत कहने से क्या है, आप मेरे वचन सुनें। वह प्रकृति मैं हूँ। आप पुरुष हैं, यह सत्य है, इसमें कुछ सन्देह नहीं है। मेरे अनुग्रह से ही आप सगुण ब्रह्म रूप वाले हुए हैं। मेरे बिना आप निरीह हैं और कुछ भी करने को समर्थ नहीं हैं। आप वशी होकर भी अनेक कर्म करने वाले हो, आप निर्विकारी कैसे हो, मुझसे कैसे लिप्त नहीं हो। यदि आप प्रकृति से परे हो और यह आप के वचन सत्य हैं तो हे शंकर! मेरे समीप रहने से आप को भय नहीं करना चाहिए 2
भगवती पार्वती भगवान् शिव को प्राप्त करने हेतु कठोर तपस्या करती हैं। यद्यपि उनकी माता मेना ने कहा कि हे वत्से! तेरा शरीर बडा कोमल हे और तप करना बड़ा कठिन है। इससे तुम यहीं तपस्या करो, बाहर मत जाओ। साथ ही यह भी कहती हैं कि स्त्रियों की तपोवन में गति नहीं सुनी जाती। अत: वन में गमन मत करो।3 माता के निषेध करने पर भी अनेक प्रकार के मत और अनेक प्रकार के वस्त्रों को छोड़कर पार्वती ने सुन्दर मौंजी कमर में बांधकर वल्कल वस्त्र धारण किये। हार को छोड़कर मृगचर्म धारण किया और गंगोत्री के समीप तपस्या करने गई ४
पार्वती की महातपस्या से चर, अचर, तीनों लोक देवता और असुर सब कोई सन्तप्त होने लगे 15
पार्वती शिव की प्राप्ति न होने पर अग्नि में प्रवेश करने को चेष्टा करती हें । वे विप्र- वेषधारी भगवान् शिव से कहती हैं कि मैंने प्राण-वल्लभ की प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या की
. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--13 : 13, 14 . वही--13 : 18-21
. वही--22 : 22-23
वही--22 : 29, 30
. वही--23 : 19
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( 70 )
है, परन्तु उनकी प्राप्ति नहीं हुई। इस कारण अग्नि में प्रवेश करती हूँ। तुमको देखकर क्षणमात्र को विलम्ब करती हँ। आप पधारें। मुझको शिव जी ने अंगीकार नहीं किया, इस कारण अग्नि में प्रवेश करती हूँ, जहाँ कहीं जन्म होगा, पति होंगे तो शंकर ही होंगे। यह कह कर शिवा अग्नि में प्रवेश करती हैं, किन्तु अग्नि चन्दन के समान शीतल हो गई ॥
भगवान् शिव ने पार्वती को स्त्रीरत्न बताया है -- तुम स्त्रियों में रत्न हो। आप के पिता भी सब पर्वतों के राजा हैं। तब ऐसे पति के लिए ऐसी कठिन तपस्या से केसे इच्छा करती हो 2 विप्र-वेषधारी शिव द्वारा शिव को निन्दा करने पर पार्वती ने कहा मैंने इतना जाना था कि यह कोई अन्य है, पर इस समय तुम्हारा सब बात जान ली। क्या करूँ क्रोध तो बहुत है, पर ब्रह्मचारी अवध्य होते हैं। हे देव! जो तुमने कहा वह सब ही मिथ्या है। जो तुमने कहा कि हम उनको जानते हैं, यह सब तुम्हारा कहना मिथ्या है। यदि तुम जानते होते तो ऐसे बचन कभी न कहते ।3 जिसके मुख से शिव ऐसा मंगल नाम निरन्तर निकलता है उसके दर्शन से दूसरे प्राणी भी सदा पवित्र हो जाते हैं--
शिवेति मंगलन्नास मुखे यस्य निरन्तरम् । तस्यैव दर्शनादन्ये पवित्रास्यन्ति सर्वदा ^
विप्र-वेष से शिव-वेष में आने पर प्रसन्न हो पार्वती कहती हैं--
यदि प्रसन्नो देवेश करोषि च कृपां यदि। पतिर्भवयमेशान मय वाक्यं कुरु प्रभो। 5
अर्थात् यदि आप प्रसन्न हो,यदि आप कृपा करते हो तो हे ईशान! मेरे बचन मानकर
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. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--26 : 22 . वही--28 : 20 . वही--28 : 12 , वही--27 : 20 . वहो--28 : 12
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( 71 )
आप मेरे पति होइये | पार्वती शिव-दर्शन के पश्चात् उनके कहने पर पिता जी के घर आ गई | उनके आने पर हिमालय और मेना बहुत प्रसन्न हुए॥
विवाह के पूर्व पार्वती एवं शिव का यज्ञोपवीत संस्कार होता है: तत: शैलवर: सोऽपि प्रीत्या दुर्गोषवीवकम् ।
कारयामास सोत्साहं वेदमन्त्रेशिशव्स्य च॥ 2
पार्वती की विदाई के समय उन्हें पतित्रता-धर्म की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि--
धन्या पतिव्रता नारी नान्या पूज्या विशेषत; । यावनी सर्वलोकानां सर्वपापौघनाशिनी॥ 3
पार्वती पुत्र-वात्सल्य से परिपूर्ण हैं। यद्यपि स्कन्द उनके औरस पुत्र नहीं हैं, फिर भी ` शरकण्डे के वन में जब शिशु रूप में स्कन्द का जन्म होता है तो वात्सल्य का रस उनके स्तनों से दूध के रूप में टपकने लगता है--
शिवाकुचाभ्यां सु्राव पय आनन्दसंथवग् । 4
भगवान् शिव द्वारा गणेश का शिरच्छेद करने पर क्रुद्ध होकर देवी पार्वती ने अपनी शक्तियों से कहा--तुम सब देवी अभी मेरी आज्ञा से इस देव सेना में जाकर प्रलय कर डालो। देवता, ऋषि, यक्ष, राक्षस, अपने पराये जो मिलें, इन सबको हठ से भक्षण कर जाओ 5
ऋषियों की प्रार्थना एवं स्तुति पर देवी ने कहा--मेरा पुत्र यदि जीवित हो जाय और
शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--30 : 21 वही--47 : 01
वही--54 : 09
. शिर पु० रु० सं० कु० खं०--2 : 70
. वही--17 : 10, 11
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(72)
तुम सबके बीच में वह प्रथम पूज्य हो तो यह संहार नहीं होगा।! देवी पार्वती को इस बात को स्वीकार करके, हाथी का सिर जोड़कर गणेश जी को पुनर्जीवित करके, उन्हें गणाधिपति बनाकर सभी देवों ने उनकी पूजा करके उन्हें पूज्य बनाया। तब पार्वती जी का क्रोध शान्त हुआ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पार्वती का चरित्र अपरिमित दिव्य गुणों का आगार है। यह अखिलदेव-पूज्या, अद्भुत लीलाधारिणी, माता-पिता की अति प्रिय कन्या हैं। यह आद्या कला आदि शक्ति दुर्गा का अवतार होते हुए भी माता-पिता तथा गुरु के प्रति पर्याप्त श्रद्धा एवं सम्मान से युक्त हैं। शिव जो पुरुष हैं तो पार्वती प्रकृति। यह पति हेतु अखण्ड-व्रत-धारिणी परमतपस्विनी, नारी हैं। यह अत्यन्त बुद्धिमती, विवेकशीला एवं साहसी नारी तथा दृढ़ संकल्प वाली आदर्श जननी हैं।
पार्वती का चरित्र वह विशाल वट वक्ष है जिसकी शीतल स्निग्ध सान्द्र छाया में नारी जीवन के समस्त सुकुमार भावों को सुन्दर जीवन प्राप्त होता है। इनके चरित्र में जहाँ एक ओर दैवी शक्तियों की चारूहासिनी, पापनाशिनी, पतितपावनी, मनोहारिणी, भक्तजनतारिंणी, भव्यभावोद्भासिनी पवित्र गंगा है वही दूसरी यौवन को उत्तालतरंगमयी, भावसंदोहवाहिनी, कलकलनिनादिनी पुण्यसलिला रवितनया कालिन्दी को छटा भी है, साथ ही ज्ञानस्रोतस्विनी, अज्ञानतमोहारिमी सरस्वती भी अलुप्त हैं। इस पावन संगम पर स्नान करने से दु:खी, सुखी, निधनीधनवान्, दुर्वृत्त, सद्वृत्त, एवं पापात्मा पुण्यात्मा हो जाते हैं।
1. शि० पु०, रु० सं०, कु० खं०--17 : 42
( 73)
कुमार कार्तिकेय
स्वामी कार्तिकेय जगत्पिता भगवान् शंकर के ज्येष्ठ पुत्र हैं। शिव पुराण की रुद्र-संहिता के कुमार-खण्ड के द्वितीय अध्याय से इनका वर्णन प्राप्त होता हे । इनके जन्म के विषय में विचित्र कथा वर्णित है । भगवान् शंकर पार्वती से विवाह करके कैलाश पर्वत पर जाते हैं। वहाँ पुष्प-चन्दन से चर्चित, रति को बढ़ाने वाली दिव्य शय्या पर भगवान् शिव जी पार्वती सहित रमण करने लगे और मान के देने वाले देवताओं के सहस्र वर्ष तक विहार करते रहे |! दूसरी ओर तारकासुर से त्रस्त्र देवतागण ब्रह्मा को लेकर विष्णु के पास गये और ब्रह्मा ने कहा कि शिव जी देवताओं के सहस्र वर्ष पर्यन्त रति में रत हुए हैं, बह निश्चेष्ट योगी होकर विराम को प्राप्त नहीं होते 2 इस पर विष्णु भगवान् ने समझाया कि इसमें चिन्ता को कोई बात नहीं है, सब कल्याण होगा, हे देवेश! तुम महाप्रभु शंकर की शरण में जाओ। < > »1 हे विधाता! पर यह समय शृंगार के भंग करने का नहीं है, समय पर किये गये प्रयोग सिद्धि को देने वाले होते हैं, अन्यथा नहीं। शंकर का भोग भंग करना उचित नहीं है। वह स्वयं अपनी इच्छा से ही विराम करेंगे 3 साथ ही उन्होंने बताया कि शंकर का वीर्य भूमि में पतित हो जाय तो उस वीर्य से स्कन्द नाम वाला एक पुत्र होगा 4
समय पूरा हो जाने पर देवताओं को प्रार्थना पर शिव जी, पार्वती को छोड़कर देवों के सम्मुख आते हैं वहाँ उनका वीर्य स्खलित होकर भूमि पर पतित हो जाता है, उसे देवताओं की प्रेरणा से अग्नि कपोत रूप से धारण कर लेते हैं 5 किन्तु उस दह्यमान वीर्य को न सह सकने
. शि० पु०, ₹० सं०, कु० खं०--1 : 13-15 . क्ही-1 : 24
- क्ही-1 : 25, 26
. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--1 : 41
. वही-2 : 10, 11
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( 74)
के कारण अग्नि ने महादेव से प्रार्थना की कि हे महादेव! मैं आपका सेवक बडा मूढ़ हूँ। मेरा अपराध क्षमा करके मेरा दाह निवारण करो।! इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि इस वीर्य को किसी स्त्री कौ योनि में स्थापित करो, इससे तुम दाहमुक्त होकर सुखी हो जाओगे 2 इस शक्तिशाली, कठिन शिव के वीर्य को कौन धारण कर सकेगी, इस पर नारद जी ने बताया कि माघ के महीने में जो स्त्री स्नान करने के निमित्त गमन करे उसकी देह में तुम इस महत् वीर्य को स्थापन कर दो। इसी समय वहां सात मुनियों की स्त्रिया सबेरे ही स्नान के निमित्त आयीं। उनमें से छः स्त्रियाँ शीत से व्याकुल होकर अरून्धती के मना करने पर भी अग्नि की ज्वाला के समीप गईं ७८ > > अग्नि के तापते ही शिव वीर्य के कण उनके शरीर में रोएं के द्वारा प्रवेश कर गये जिससे वह छः स्त्रियाँ गर्भवती हो गयीं। गर्भवती जानकर उनके पतियों ने उन्हें त्याग दिया। स्त्रियाँ अपना व्यभिचार जानकर दुःख से व्याकुल हुई और उन मुनियों की स्त्रियों ने गर्भ रूप उस शिव वीर्य को हिमालय के पृष्ठ में त्यागकर सुख का अनुभव किया। हिमालय ने उसके दाह से विकम्पित होकर सहने में असमर्थ हो उस वीर्य को गंगा जी में डाल दिया। गंगा जी भी शंकर के वीर्य को न सह सकीं और पीडित होकर अपनीतरंगों से उस वीर्य को शरकण्डे के वन में त्याग दिया। वहाँ वह वीर्य पतित होते ही तत्काल बालक हो गया, जो सुन्दर, सुभग, श्रीमान् तेजस्वी, प्रीति को बढ़ाने वाला था।3
शरकण्डे के वन में शिव-पुत्र स्कन्द का ब्रह्मा की प्रेरणा से स्वयं आये हुए विश्वामित्र ने विधिपूर्वक संस्कार किया 14
शक्तिधारी स्कन्द अपने माता-पिता के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु एवं आदरवान् हैं । कैलास
. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--2 : 43
. वही--2 : 48
. शि० पु०, रु० सं०, कु० खं०--2 : 54-68 ; वही--3 : 14
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( 75 )
पर्वत पर प्रथम बार आने पर वे पार्वती एवं शिव को देखकर रथ से शीघ्र उतरकर शिर से प्रणाम करते हैं--
अथ शक्तिधरः स्कन्दो दुष्ट्वा तौ पार्वतीशिवौ। अवरुह्य रथात्तूर्णे शिरसा प्रणनाम ह॥ !
स्वामी कार्तिकेय को शिव महापुराण में अदभुत शक्ति एवं वीरता से परिपूर्ण चित्रित किया गया है। बालक-अवस्था में ही लोक-रक्षा के निमित्त बलशाली दैत्य तारक से युद्ध करने जाते हैं। तारक द्वारा प्रयुक्त शस्त्रों को युक्तिपूर्ण ढंग से निष्प्रभावी बना देते हैं और स्वयं प्रहार करते हैं--
यथा सिंहो मदोन्मत्तो हन्तुकामस्तथासुरम् कुमारस्तारकं शक्त्या स जघान प्रतापवान् /2
अर्थात् जिस प्रकार मदोन्मत्त होकर सिंह प्रहार करता है, उसी प्रकार प्रतापवान् कुमार ने उस असुर पर शक्ति से प्रहार किया। इस प्रकार वह कुमार और तारक असुर बड़े वेग से युट करने लगे 3 अन्त में स्वामी कार्तिकेय ने शक्ति के प्रहार से उस दैत्यराज का बध किया 4
इस प्रकार शिव महापुराण में स्वामी कार्तिकेय अप्रतिम शारीरिक-सुषमा-सम्पन्न, माता एवं धर्म माता कृत्तिकाओं के प्रति समान प्रेम, श्रद्धा एवं आदर देने वाले, अलौकिक तेज से युक्त, देवों में पूज्य एवं श्रद्धा के पात्र, दीनबन्धु, अद्भुत शक्ति, शौर्य एवं पराक्रम से सम्पन्न, ब्रह्मचर्य-पालक, महावीर आदि गुणों से युक्त हैं। इनका चरित्र अनेक दिव्य गुणों से परिपूर्ण है ।
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. शि० पु०, रु० सं०, कु० खं०--5 : 27 . वही--10 : 19
. वही--10-20
. वहो--10 : 31
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( 76 )
गणेश
शिव महापुराण में विघ्नविनाशक, गजानन, एकदन्त, गणेश्वर गणेश जी का प्रथम दर्शन रुद्र-संहिता के कुमार-खण्ड के 13वें अध्याय में होता है। गणेश जी भगवान् शिव एवं पार्वती के द्वितीय पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं, यद्यपि ये न तो शम्भु-शुक्र-जनित हैं और न ही पार्वती के उदर से ही उत्पन्न हैं। इनके जन्म कौ कथा भी विचित्र रूप से वर्णित है।
एक समय माया परमेश्वरी पार्वती ने मन में विचार किया कि कोई अत्यन्त श्रेष्ठ मेरा सेवक हो जो सब कार्य करे, जो मेरी आज्ञा के बिना रेखामात्र भी चलायमान न हो। यह विचार कर पार्वती देवी ने अपने शरीर के मैल से सब लक्षण-सम्पन्न एक महाबली पुरुष निर्माण किया और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। उस पुरुष ने भी उन्हें माता कहकर सम्बोधित किया।! पार्वती ने गणेश को द्वारपाल के रूप में नियुक्त करके कहा कि हे पुत्र! मेरी आज्ञा के बिना कोई मेरे घर के भीतर न आने पाये, चाहे कोई कितना ही हठ क्यों न करे।
बिना मदाज्ञां मत्पुत्र नवैयान्म द्वहान्तूरम् । कोऽपि क्वापि हठा्तात सत्मेतन्मयोदितम् /2
गणेश जी को, माता पार्वती के प्रति अपार श्रद्धा एवं प्रेम है। वे माता की आज्ञा का निष्ठा से पालन करते हैं। यहाँ तक कि शिव तथा उनके गणों के आने पर भी नहीं जाने देते। उनके द्वारा भय दिखाने पर भी नहीं जाने देते, बल्कि निर्भर होकर शिव-गणों को घुड़क देते हैं-- इत्युक्तोऽपि गणेशश्च गिरिजातनयोऽ भय: ।
स
1. शि० पु०,रु० सं०,कु० खं०--13 : 18-23 2. वही--13 : 26
{ 77)
निर्शर्त्स्य शंकरगणान द्वारं मुक्तवास्तदा ॥ 1
वे शिव के गणों को साहस के साथ ललकार देते हैं कि शिव की आज्ञा पालन करने वाले सब गण आवें, मैं अकेला ही बालक, शिवा की आज्ञा पालन करने वाला हुँ-
आयान्तु गणापास्सर्वे शिवाज्चापरिपालकः
अहमेकश्च बालश्च शिवाज्ञापरिपालक:॥ 2
गणेश जी में अद्भुत शौर्य एवं युद्ध-कौशल है। वे अकेले शिवगणों तथा अन्य देवों से युद्ध करने का साहस रखते हैं। उनमें कोई भी संग्राम में गणेश जी के सम्मुख ठहर न सका 3 गणेश जी ने सम्पूर्ण शिव-सेना को विलोडित कर डाला और शिव को त्रिसूल उठाने को मजबूर कर दिया 4
शिव द्वारा शिरच्छेदन के पश्चात् गणेश की माता पार्वती ने अति क्रुद्ध होकर अपनी शक्तियों को देवों, ऋषियों आदि का विनाश करने का आदेश दे दिया और दु:खी ऋषियों आदि को प्रार्थना पर देवी ने गणेश को पुनजीर्वित करने को कहा। शिव जी की कृपा से हाथी का शिर काटकर जोड़ा गया और पुनर्जीवित करके गजानन को गणाध्यक्ष पद पर अभिषिक्त किया
गया 13
गणेश जी सभी देवताओं में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की भाँति त्रिजगत् में पूजनीय हैं । स्वयं शिव जी ने कहा है-हम और यह सब मनुष्यों में पूज्य होंगे और गणेश विशेष पर
. शिल पु०, रु० सं०, कु० खं०--14 : 9 , वही--15 : 3
. वही--15 : 18
. वही--17 : 33
. वही--18 : 03
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( 78 )
विघ्नहर्ता और सब कामना तथा फल के देने वाले होंगे ॥1
गिरिजा-नन्दन गणेश महाबुद्धि-सागर हैं । स्वामी कार्तिकेय और गणेश जी दोनों के बडे होने पर माता-पिता के द्वारा विवाह की बात आने पर दोनों पुत्र पहले अपना विवाह करने का हठ करते हैं।2 माता-पिता ने एक युक्ति सोचकर दोनों पुत्रों से कहा--
“यश्चैव पृथिवीं सर्वा क्रांत्वा पूर्वमुपाव्रजेत् । तस्यैव प्रथमं कार्यो विवाहश्शुभलक्षणः॥''
अर्थात् जो इस समय सम्पूर्ण पृथ्वी को परिक्रमा करके पहले चला आयेगा, उसी का शुभ लक्षण वाला विवाह पहले किया जायेगा।3 माता-पिता की बात सुन महाबली कार्तिकेय तत्काल ही पृथ्वी की परिक्रमा के लिए चल देते हैं,4 किन्तु बुद्धिमान् गणेश जी वहीं सुबुद्धि से अपने मन में विचारने लगे।
महा बुद्धिमान् गणेश जी ने माता-पिता को सिंहासन पर बैठाकर विधिवत् पूजन करके सात परिक्रमा की।5 अनेक प्रकार से माता-पिता की स्तुति कर बोले
“शीघ्रं चोवात्र कर्तव्यो विवाहश्शोभनो मम।''
अर्थात् शीघ्र आप मेरा शुभ विवाह कर दें। माता-पिता के यह कहने पर कि सातों द्वीपों वाली समुद्र पर्यन्त पृथ्वी की तुमने कब परिक्रमा की। बुद्धिमान् गणेश जी कहते हैं कि मैंने तो अपनी बुद्धि से मानो समस्त पृथ्वी की परिक्रमा कर ली। वेद, शास्त्र और धर्म-संचय में लिखा है--जो माता-पिता का पूजन कर उनको परिक्रमा करता है, उसको पृथ्वी की परिक्रमा
. शि० पु०, रु० सं०, कु० खं०--18 : 22 वही--19 : 12 वही--19 : 18 . वही-19 : 19 . वही--19 : 26
0५ क्री २ >
का फल प्राप्त होता है। जो माता-पिता को घर छोड़कर तीर्थ को जाता है उसको उनके मारने का पाप लगता है 11
विध्न- विनाशक गणेश की बुद्धि की प्रशंसा करते हुए स्वयं भगवान् शिव और माता पार्वती ने भी कहा है कि संकट पड़ने पर जिसकी बुद्धि विशेष रूप से बनी रहती है उसका दुःख नष्ट हो जाता है। जैसे सूर्य के सामने अन्धकार नष्ट हो जाता है। जिसको बुद्धि है उसी को बल है, निर्बुद्धि को बल कहाँ है, एक बुद्धिमान् खरगोश ने मदोन्मत्त सिंह को कुये में डालकर नष्ट कर दिया। पुत्र तुमने धर्म का पालन किया है 2
गणेश जी अपनी विलक्षण बुद्धि के बल पर पहले विवाह करने में सफल हो गये। विश्वरूप प्रजापति की दिव्यरूप दो कन्यायें थीं, यह सिद्धि-बुद्धि नाम से विख्यात थीं। प्रभु शंकर ने उन दोनों के साथ गणेश जी का विवाह-महोत्सव कराया।3 सिद्धि नामक गणेश की स्त्री से ' क्षेम' नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और बुद्धि के परम सुन्दर 'लाभ' नामक पुत्र उत्पन्न हुआ
इस प्रकार हम देखते हैं कि विघ्न-विनाशक गणेश जी के चरित्र में कर्तव्य-निष्ठा, माता-पिता के प्रति अटल विश्वास एवं अटूट श्रद्धा, अद्भुत शौर्य, गणपतित्व, विघ्नविनाशकता, सभी कामनाओं को पूर्ण करना, विलक्षण बुद्धि-विवेक आदि विशेषताएं परिलक्षित होती हैं, जो उपासकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं ।
. शि० पु०, रू० सं०, कु० खं०--19 : 37-40 . वही--19 : 51-53
. वही--20 : 2, 3
. वही--20 : 8
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(8४)
ब्रहमा
ब्रहमा जी त्रिदेवों में से एक हें । यद्यपि सांसारिक जगत् में भगवान् शंकर एवं भगवान् विष्णु जैसी श्रद्धा एवं लोकप्रियता ब्रह्मा की नहीं है, फिर भी उनके दैवी महत्त्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। सम्पूर्ण सृष्टि को रचना का कार्य ब्रहमा का ही है। शिव महापुराण का अध्ययन करने से ब्रह्मा उपदेशक, सृष्टिकर्ता, भक्तों के वरदाता, देव, दानव, दैत्य, असुर सबको समभाव से देखने वाले, करुणामय, दयालु के रूप में हमारे समक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। ये अहंकार की भावना से युक्त हैं। स्त्रियों के प्रति कामियों जैसी श्रृंगार - भावना का भी समावेश उनमें दिखायी पड़ता है।
शिव महापुराण में लोक-पितामह ब्रहमा की उत्पत्ति भगवान् विष्णु के नाभि से निकले हुए कमल से बताई गयी है। भगवान् नारायण देव के शयन कर जाने से सहसा उनकी नाभि से एक बड़ा कमल प्रकट हुआ जो कोटि सूर्य के समान कान्तिमान्, सुन्दर तत्त्वों से युक्त, अत्यन्त अद्भुत, महामनोहर और महादर्शनीय था।! ब्रहमा ने स्वयं नारद से कहा है कि उसे विष्णु के नाभि-पंकज से भगवान् शिव ने अपनी माया से प्रकट किया। इस प्रकार वह ब्रहमा हिरण्यगर्भ उस कमल से प्रकट हुए--
“तन्नाथिपंकजादाविर्भावयामास लीलया। एक्म्पद्मात्ततोजज्ञे युत्रोऽहं हेमगर्भक: ॥ 2
ब्रह्मा चार मुख एवं रक्त वर्ण त्रिपुण्ड से शोभायमान मस्तक वाले हें |3 इन्होंने अपने
1. शि० पु०, रु० सं०, सृ० खं०--7 :1, 3 2. वही--7 : 5 3. वही--7 : 6
(81)
जनक के विषय में जानने के लिए कमलनाल के ऊपर-नीचे सैकडों वर्ष भ्रमण किया, किन्तु अपने जनक को न जान सके । तब आकाशवाणी से “तप करो'' ऐसा सुनकर 12 वर्ष तपस्या करने के उपरान्त अपने जनक शंख, चक्र, गदा, पद्म, आयुध धारे कोटि कामदेव के समान सुन्दर भगवान् विष्णु को देखा।2 दूसरी ओर उन्हें भगवान् शिव के दक्षिणपार्श्व से प्रकट हुआ बताया गया है--
अयं मे दक्षिणात्पाश्वद्ब्रह्या लोकपितामहः।'3
ब्रह्मा जी में अहंकार को भावना तीव्र है। इसका प्रकाशन उस समय होता है, जब भगवान् विष्णु क्षीर-सागर में शेष शय्या पर गरूड़ादि पार्षदों से संयुक्त लक्ष्मी सहित शयन कर रहे थे। उस समय ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ ब्रह्म जी अपनी इच्छा से वहाँ आये और बोले-तुम कौन हो? जो मुझे देखकर अभिमानी पुरुष के समान शयन करते हो। हे वत्स उठो, देखो, मैं तुम्हारा स्वामी आया हूँ 4 विष्णु जी ने अपने क्रोध को दबाते हुए शांत वाणी में उनसे कहा--हे पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो! स्वागत है, आओ, बैठो, मैं तुम्हारा पिता हं । इस समय तुम्हारा नेत्र कुटिल और मुख वक्र क्यों हो रहा है।5 ब्रह्मा बोले-समय के फेर से तुझे अभिमान हो गया है। पुत्र, मैं तुम्हारा रक्षक हं । इस समस्त जगत् का पिता मैं हूँ। विष्णु बोले-अरे चोर! तू अपना बड्प्पन क्या दिखाता है। सारा जगत् तो मुझमें निवास करता है। तू मेरे ही नाभि-कमल से उत्पन्न हुआ है और मुझसे ऐसी बातें कर रहा है।6 इस प्रकार दोनों में विवाद बढ़ गया। वे दोनों अपने को प्रभु कहते-कहते आपस में युद्ध करने लगे। इसके पश्चात् भगवान् शिव ने
. शि० पु०, रु० सं०, सु० खं०-7 : 8-14 . वही--7 : 20, 21
. वही--9 : 17
. शि० पु०, वि० सं०--6 : 3
. वही-6 : 5, 6
. वही-6 :7, 8
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६92)
स्तम्भ-रूप में प्रकट होकर उन दोनों का अनुशासन किया 1!
ब्रह्मा जी को एक अन्य विशेषता यह है कि वे अपना कार्य येन केन प्रकारेण सिद्ध करना चाहते हें । अपने और विष्णु के बीच में स्थित स्तम्भ का अन्त जानने के लिए क्रमश: हंस और वारह रूप धारण कर दोनों ऊपर नीचे जाते हैं 12 पर अन्त न पाकर विष्णु तो स्पष्ट कह देते हैं कि मैंने अन्त नहीं पाया | पर ब्रह्मा केतक पुष्प की झूठी गवाही दिलाकर विष्णु के समक्ष स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर देते हैं। विष्णु उन्हें श्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-उपासना करते हैं 3 इससे क्रुद्ध होकर शिव जी प्रकट हो भैरव से उनके असत्यभाषी पंचम शिर का छेदन करवाते हैं4 और विष्णु को प्रार्थना पर उन्हें क्षमा कर देते हैं।5 असत्यभाषी केतक को भी अपनी समीपता से बंचित कर देते हैं ।6
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मा की सृष्टि है। ब्रह्मा जी ने नारद से स्वयं कहा है--' हे नारद! मैंने स्वयं शब्दादि पंचभूतों द्वारा पंचीकरण करके उनसे स्थूल आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी तथा पर्वत, समुद्र, वृक्षादि और कल्यादि युग पर्यन्त कारणों की रचना की। हे मुने! और भी सृष्टि के पदार्थों की रचना की पर में सन्तुष्ट नहीं हुआ। तब मैंने साम्ब शंकर का ध्यान करके सृष्टि के पदार्थ निर्माण किये।'”7 इससे भी सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से नहीं चलता था तब ब्रह्मा ने अपने दो भाग करके नारी-पुरुष की रचना की, जिससे मनु और शतरूपा हुई। उस अत्यन्त शोभावाली शतरूपा को मनु ने ग्रहण किया और उन्होंने विवाह की विधि से मैथुनी
. शि० पु. वि० सं०--6 : 11
वही--7 : 16, 17
वही--7: 27, 28
वही--8 : 4
वही--8 : 8
. वबही--8 : 15
, शि" पु०, रु० सं०, सृ० खं०--16 : 1-3
3 9 ७ # 9 2८
सृष्टि उत्पन्न को 11
काम-वाण से पीडित होना भी ब्रह्मा के चरित्र की एक विशेषता हे। एक समय यह अपनी सन्ध्या नाम को कन्या को देखकर काम-वाण से पीडित हो जाते हैं--
पुराहं स्वसुतां दृष्टवा संध्याहवां तनयैस्सह । अभव विकृतस्तात कामवाणप्रपीडित: ॥2
अपनी सुता सरस्वती के साथ ब्रह्मा के विवाह की बात लोक-प्रसिद्ध ही है। सती - विवाह के समय सती द्वारा परिक्रमा के समय उनके पदहूय का दर्शन कर मदन से आविष्टचित्त ब्रह्मा को सती का मुख देखने की अतीव उत्कंठा हुई। काम से दुःखी ब्रह्मा ने अत्यन्त धुँआ करने की इच्छा करके अग्नि में गीली लकड़ी डाल दी। धुँआ से व्याकुल शिव जी ने दोनों हाथों से अपने नेत्र मूँद लिये। फिर ब्रह्मा ने प्रसन्न हो सती के मुख से वस्त्र हटा कर उनके मुख को देखा 13
इसी प्रकार पार्वती के विवाह के समय देवी पार्वती के नख-चन्द्र को देखकर ब्रह्मा जी काम-मोहित हो जाते हैं और उनका वीर्य-पात होता है। शिव जी ब्रह्मा पर क्रोधित होते हैं,4 किन्तु देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्मा को अभयदान देते हैं 5
लोक-पितामह ब्रह्मा को एक प्रमुख विशेषता है भक्तों को वरदान देना। भगवान् ब्रह्मा भक्तों पर शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले, करुणासागर देव हैं। देव, दानव, असुर, दैत्य, मनुष्य आदि कोई भी हो जिसने इनको पूर्ण श्रद्धा से तपस्या की, प्रसन्न होकर इन्होंने उसे दुर्लभ वरदान दे
मृ
. 'शि० पु, रु० सं०, सु० खं०--16 : 10-13
[
2. शिर पु०, रु० सं०, स० खं०--1 : 10 3. वही--19 : 26, 27
4. शि० पु०,रु० सं०,पा०खं०--49 : 5-9 5. वही--49 : 32
दिया । दैत्यराज तारकासुर की कठिन तपस्या से देवताओं के लोक को दग्ध होता जानकर ब्रह्मा जी उसके पास जाते हैं और कहते हैं कि तुम वर मांगो, तुमने बडी तपस्या की है; कोई वस्तु मुझे तुम्हें अदेय नहीं है-- ““अवोचं वचनं तं वे वरं ब्रूहीत्यहं मुने। तपस्तप्तं त्वया तीव्रं नादेयं विद्यवे वव॥*1
उसने दो दुर्लभ वरदान मांगे । प्रथम--सम्पूर्ण सृष्टि में मुझसे बलवान कोई न हो और दूसरा-शिव के वीर्य से उत्पन्न सेनापति पुत्र से ही मेरा मरण हो। ब्रह्मा ने उसे ऐसा दुर्लभ वरदान प्रदान किया 12
ब्रह्मा जी की एक सर्वश्रेष्ठ विशेषता है--परदुःखकातरता। देवताओं पर जब भी कोई विशेष कष्ट होता था तब वे सर्वप्रथम ब्रह्मा जी के पास जाते थे। ब्रह्मा जी उन्हें साथ लेकर आवश्यकतानुसार क्षीरसागर में भगवान् विष्णु अथवा कैलास पर्वत पर भगवान् शिव के पास जाते हैं और उनके दुःख का निवेदन करते हैं। भगवान् शिव के नेत्रों से निकली अग्नि काम को भस्म करने के उपरान्त जब चराचर जगत् को भस्म करने लगी तो देवताओं ने जाकर पितामह से निवेदन किया।3 उनके इस निवेदन को स्वीकार कर ब्रह्मा जी उस क्रोधाग्नि को स्तंभित कर बड़वारूप में ले जाकर समुद्र में स्थापित करके सबकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार जगत् स्वस्थ हो गया, देवता और मुनि सब महासुखी हुए
उपर्युक्त सम्पूर्ण उदाहरणों का अवलोकन करने से विदित होता है कि लोक-पितामह ब्रह्मा का चरित्र अनेक अदभुत गुणों से परिपूर्ण है। एक ओर तो ये कथाकार एवं उपदेशक के
- शि० पु०,रु० सं०, पा०खं०-15 : 36 . वही--15 : 40-42
. वही-21 : 34
. वही--20 : 23
PY 92) —
रूप में है तो दूसरी ओर काम-मोहित होना भी परिलक्षित है । वस्तुतः काम-मोहित होना, वीर्यस्खलनादि जगत् की सृष्टि आदि गूढ़ तत्त्वों से सम्बन्धित है । इनका अभिधार्थ ग्रहण करना न्यायोचित नहीं होगा । इसके अतिरिक्त ब्रह्मा जी सृष्टिकर्ता के रूप में ही लौकिक जगत् में प्रसिद्ध हैं। विष्णु से श्रेष्ठ होने का अहंकार, भक्तों को वर देना, परदुःखकातरता, बुद्धिविवेकशीलता आदि लोक-पितामह ब्रह्मा के चरित्र को अन्यतम विशेषताएं हैं ।
भगवान् विष्णु
शिव महापुराण में प्रमुख नायक भगवान् शंकर के बाद भगवान् विष्णु का ही स्थान है। ये सृष्टि के पालनकर्ता, शिव के सहयोगी, भक्तवत्सल, परमवीर, लोकरक्षक, दीनबन्धु,
करुणा के सागर देव हें । इनका आवास-स्थल क्षीर-सागर है तथा शय्या शेषनाग है। इनका वस्त्र पीताम्बर है ।
शिव पुराण में भगवान् विष्णु को उत्पत्ति शिवजी द्वारा अपने कार्यों को सुचारू रूप से सम्पन्न करने हेतु को गयी। एक बार आनन्दकानन में जब शिवाशिव विहार कर रहे थे तो उनके मन में यह इच्छा हुई कि कोई दूसरा पुरुष निर्माण किया जाय जिस पर, स्वच्छ विहार करने वाले हम यह भार अर्पण करके निर्वाण-शान्ति को धारण कर केवल काशी में शयन करें । तब उस प्रभु-शिवा के व्यापार से त्रिलोकी में एक अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ, जो
शान्त, सत्त्व गुण से युक्त एवं गम्भीरता में सागर के समान था। शिवजी ने उस दिव्य पुरुष का नाम विष्णु रखा —
“'विष्ण्वितिव्यापकत्वात्ते नाम ख्यातं भविष्यति ।
बहुन्यन्यानि नामानि भक्तसौख्यकराणिह ॥ 1 सती-खण्ड के दूसरे अध्याय में शिव के वामांग से विष्णु का उत्पन्न होना वर्णित है- “तस्य वामांगजो विष्णु: 1 '2
शिव पुराण में भगवान् विष्णु चार भुजा, सुन्दर नेत्र वाले हैं। यह शंख, चक्र, गदा, पद्म आयुध धारण करने वाले हैं। ये घनश्याम अंग वाले, पीताम्बरधारी हैं। भगवान् विष्णु
1. शि० पु०, ₹० सं०, सृ० खं०-6 : 43 2. वही-2 : 14
( 87 )
महाराजाओं के समान मुकुट आदि आभूषणों से भूषित हैं, प्रसन्न मुख वाले हें । कामदेव के समान उनका सुन्दर रूप है 1
भगवान् विष्णु के चरित्र की सर्वप्रमुख विशेषता है--सृष्टि के समस्त प्राणियों का पालन करना | सर्वेश्वर भगवान् सदाशिव ने ब्रह्म को सृष्टि तथा विष्णु को चराचर के पालन का कार्य सौंपा है। हे वत्स नारायण | तुम चराचर का पालन करो-
““वत्स वत्स हरे त्वं च पालयैवं चराचरम् ।'2
भगवान् विष्णु भक्तवत्सल हैं । यह देवों पर किसी प्रकारकी आपदा या उत्पात होने पर उनकी रक्षा में सदैव तत्पर रहते हैं। दक्ष प्रजापति के यज्ञ में जब सती ने देह त्याग कर दिया तो भगवान् शिव ने वीरभद्र को प्रकट कर यज्ञविध्वंस करने को कहा। वीरभद्र के आगमन एवं आकाशवाणी से भावी विपत्ति की कल्पना कर दक्ष ने भगवान् विष्णु की स्तुत कर अपनी और यज्ञ की रक्षा को प्रार्थना को।3 इस पर भगवान् विष्णु ने समझाया कि--
“अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते । त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दाखियं मरणं भयम् ॥" अर्थात् जहाँ अपूज्यों का पूजन और पूज्यों का असत्कार होता है वहाँ दारिद्र, मरण और भय-ये तीन बातें होती हैं 14 अनेक विषम परिस्थितियों के होते हुए भी विष्णु जी ने दक्ष से कहा कि दक्ष जी। मैं तुम्हारे यज्ञ की रक्षा करूंगा, कारण कि धर्म का पालन करना मेरा प्रण त
““मया रक्षा विधातव्या तव यज्ञस्य दक्ष वे ।
शि० पु०, रु० सं०, सृ० खं०--17 : 17-19 वही--9 : 20
वही--35 : 1
, शिर पु०, रु० सं०, स० खं०--35 : 9
> (22) >> ४7
( 88 )
ख्यातो मम पण: सत्यो धर्मस्य परिपालनम् ॥/ 7
भक्तवत्सल भगवान् विष्णु ने वीरभद्र के साथ विषम परिस्थितियों में भी युद्ध कर दक्ष एवं उनके यज्ञ को रक्षा को। इसी प्रकार अन्य स्थलों पर भी भगवान् विष्णु ने भक्तों की पुकार पर, अविलम्ब पहुँच कर उंनके मनोकामना की पूर्ति की।
भगवान् विष्णु भक्तों के मोह को भी दूर करने वाले हैं। एक बार महर्षि नारद ने अपने तप द्वारा कामदेव को जीत लिया। गर्व से युक्त हो कैलास पर्वत पर जाकर शिवजी से काम- विजय को बात साभिमान कही। शिवजी ने समझाया कि पुनः इस बात को नारायण से मत कहना | पूँछने पर भी इस वृतान्त को गुप्त रखना।2 फिर भी शिव-माया से मोहित नारद ने विष्णुजी से भी इस काम-विजय के वृतान्त को सगर्व बताया | विष्णुजी ने कहा आप को काम - विकार किस प्रकार हो सकता है। आप तो जन्म से ही विकाररहित एवं सुन्दर बुद्धि वाले हैं । आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी, ज्ञान-विज्ञान वाले हैं --
“नैष्ठिको ब्रह्मचारी त्व ज्ञानवैराग्यवान्सदा / 3
विष्णुजी ने शीलनिधि राजा को कन्या के स्वयम्बर के माध्यम से नारद के काम-विजय
के गर्व को दूर कर दिया और मुनि के द्वारा दिये गये शाप को ग्रहण करके भी उनका उपकार किया।
शिव पुराण में विष्णु जी शंकर के सहयोगी देव हैं। राक्षसों, दैत्यों का बध करने में ये शिव के अग्रगामी हैं । जलंधर, शंखचूड, हिरण्यकशिपु, हिरण्ययाक्ष आदि महादैत्यों के 'बध में इनको प्रमुख भूमिका रही। इनमें समायोजन की प्रवृत्ति भी पर्याप्त मात्रा में दृष्टिगोचर होती है।
1, शि० पु०, रु० सं०, स० खं०--35 : 24 2. शि० पु०, रु० सं०, सृ० खं०--2 : 32, 33 3. वही--2 : 52, 53
( 89 )
ब्रह्मा के ऊपर क्रुद्ध भैरव जब एक सिर काट देते हैं और अन्य सिरों को काटने को उद्यत होते हैं तो दयासागर भगवान् विष्णु शंकर को स्तुति करके भैरव को शिरच्छेदन से निवृत्त करते हैं।। सती के आंगिक सौन्दर्य को देखकर काममोहित होने से वीर्य-स्खलन के समय शिवजी द्वारा मारने के लिए उद्यत होने के समय भी विष्णु जी ने हौ शिव जी से, अनेक ज्ञान-विज्ञानमय तर्क प्रस्तुत करके ब्रह्मा को मारने से बचाया था। विष्णु जी ने कहा न तो ब्रह्मा आप से भिन्न हैं और न आप उनसे भिन्न हैं--
““न ब्रह्मा भवतो धिनो न त्वं तस्मात्सदाशिव।'2
इसी प्रकार पार्वती के नखचन्द्र को देखकर कामार्त्त एवं स्खलित ब्रह्मा को शिवजी जब मारने को उद्यत होते हैं तो देवताओं सहित विष्णु की प्रार्थना स्वीकार कर वे उन्हें अभयदान देते हैं 3 भगवान् विष्णु करुणासागर हें | पार्वती को उग्र तपस्या से व्याकुल देबतागण उनको स्तुति करके कहते हैं-''हे नारायण! तेज से व्याकुल हो हम आप की शरण में आये हैं। आप हमारी रक्षा करें। हम पार्वती की परम उग्र तपस्या से संतप्त हो गये हैं।''4 देवताओं की आरत्तवाणी को सुनकर दुःखकातर, शेषशय्या पर विराजमान प्रभु ने देवताओं से कहा--'' हे देवताओं ! हम गिरिजा के पाणिग्रहण के लिए शिव से प्रार्थना करेंगे। इस पारिग्रहण के लिए शिव से प्रार्थना करेंगे। इस पाणिग्रहण से लोकों का कल्याण होगा।''5 भगवान् विष्णु ने विविध प्रकार से स्तुति करके शिव को पार्वती से विवाह के लिए तैयार किया |
शिव पुराण में भगवान् विष्णु का मायावी रूप भी दृष्टिगोचर होता हे | दैत्यराज जलन्धर पत्नी के पतिब्रत-धर्म के कारण अजेय बना हुआ था। उसने अधर्म-वश पार्वती को
शि० पु०, वि» स०--8 : 8
झि० पु०, रु० सं०, सृ० खं०--19 : 68 . शिन पु०, रु० सं०, पार खं०--49 : 32 . वही--23 : 29
. वही--23 : 32
( 90 )
भी पत्नीत्वेन अभिलाषा को। पार्वती ने भयभीत होकर विष्णु जी का स्मरण किया | उनके प्रकट होने पर उनसे बोलीं--“ हे बत्स! जो मार्ग उस दैत्य ने खोल दिया उसी का अनुसरण उचित है। मेरी आज्ञा से उसकी स्त्री का पतिव्रत-धर्म नष्ट करो। इसमें अब दोष न होगा! हे रमेश्वर! अन्यथा वह मारा न जायेगा। पृथ्वी पर पतिब्रत-धर्म के समान दूसरा धर्म नहीं हे ।''! विष्णुजी ने पार्वती की आज्ञा से वहाँ जाकर अपनी माया से जलन्धर का रूप धारण कर वृन्दा के साथ उसी बन में बहुत दिनों तक रमण किया।2 एक समय सुरत के अन्त में उसने विष्णु को देखा 13 तब वृन्दा ने महाक्रोधकर, अपना तेज दिखाते हुए विष से भी तीक्ष्ण शाप दे दिया £
इस प्रकार भगवान् विष्णु ने शाप ग्रहण करके भी जलन्धर के बध का मार्ग प्रशस्त कर देवताओं का महान् उपकार किया |
इसी प्रकार लीलाधारी भगवान् विष्णु ने दैत्याधिपति शंखचूड से, ब्राह्मण का वेष धारण कर श्री कृष्ण का दिव्य कवच माँगा। सत्यभाषी शंखचूड ने प्राणों से भी प्यारा कवच ब्राह्मण को दे दिया-- तद्ददौ कवचं दिव्यं विप्राय प्राणसम्भतम् 6
भगवान् विष्णु को एक अन्य प्रमुख विशेषता है--दुष्टों का संहार और धर्म की स्थापना । जब-जब पृथ्वी पर धर्म का पतन होता है और अधर्म को प्रधानता होने लगती है, तब-तब भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की स्थापना करने के लिए भगवान् विष्णु अवतरित होते हैं 16
जल
. शि० पु०, रु० सं०, यु० खं०--22 : 50, 51 वही--23 : 39
वही--23 : 40
वही--23 : 43
वही--40 : 19
. श्रीमदभगवद्गीता--4 : 7, 8
9 (७ # ७२ > ४
(91)
इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान् विष्णु के चरित्र में सत्य-वक्ता, सत्यपालक, शिव के सहगामी, परम शिव-भक्त, परमवीर, अनेक दिव्य गुणों से परिपूर्ण, भक्तवत्सल, सृष्टि के पालनकर्ता, देवताओं तथा भक्तों के दुःख को दूर करने वाले, भक्तों के मोह को दूर करने वाले, लोक-मंगलकारी, लोक-रक्षक, माया-विशारद, शिव के प्राण-बल्लभ, दया-सिन्धु, करुणासागर आदि को विशेषतायें परिलक्षित होती हें । ये पीताम्बरधारी, परम-शोभा-सम्पन्न, कमल-नेत्र एवं चार भुजाओं से सुशोभित हें । ये शंख, चक्र, पद्म, गदा आदि आयुध को धारण करने वाले परम शक्तिमान् देवता हैं ।
वस्तुतः भगवान् विष्णु का चरित्र उस सुरम्य चित्ताकर्षक गुलदस्ते के समान है जिसमें निसर्ग-सिद्ध वासन्ती सुषमा तो विद्यमान है, पर पतझड की नीरसता का संचार नहीं । इनका चरित्र उस श्याम नीरद-माला के तुल्य है जो अपनी वारिधारा से, भगवान् अंशुमाली की प्रचण्ड रश्मिमाला से दग्ध धरती के संताप को दूर कर शीतलता प्रदान करती है। इस सम्पूर्ण नीरस सृष्टि को संजीवनी शक्ति प्रदान कर पुष्पित, पल्लवित एवं सुवासित करने का गुरुतर भार भक्तवत्सल, जगत्पालक, परम शैव, करुणा सिन्धु, दीन बन्धु भगवान् विष्णु पर ही है ।
(92)
शंखचूड
शंखचूड अनन्य विष्णु-भक्त दानवेन्द्र दम्भ का पुत्र था। दम्भ ने कठोर तपस्या करके भगवान् विष्णु से यह वर माँगा था कि आप महाबली, पराक्रमी एवं अपना भक्त पुत्र दीजिए जो त्रिलोकी को जीतने वाला वीर हो और जिसे देवता भी न जीत सकें-
''स्वभक्तं तनयं देहि महाबलपराक्रमम् । त्रिलोकजयिनं वीरमजेयं च दिवौकसाम् ॥ १ भगवान् विष्णु के वरदान से दम्भ के एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ जो पूर्वजन्म में श्रीकृष्ण का पार्षद सुदामा नाम का गोप था। दम्भ ने अपने पुत्र का नाम शंखचूड रखा।2 वह
पिता के घर में शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भांति बढ़ने लगा और बालकपन में विद्याभ्यास करके बड़ा दीप्तिमान हुआ।
“'पितुर्गेहे स ववृधे शुक्लपक्ष यथा शशी। शैशवेभ्यस्तविद्युस्तु स वभूव सूदीप्तिमान् ॥ 2
शंखचूड गुरु को वाणी पर विश्वास करता था। इसने जैगीषत्य के उपदेश से पुष्कर में बहुत काल तक तप किया। जितेन्द्रिय होकर गुरु को दी हुई ब्रह्मविद्या को जपने लगा तथा एकाग्रमन होकर और इन्द्रियों का निग्रह कर तप भी करने लगा ५ ब्रह्मा ने उसे देवताओं से
अजेय होने का वर दिया तथा प्रसन्न होकर जगत् का मंगलकारक तथा सब जगह जय देने
. शि० पु०, रु० सं० यु० खं०--27 : 28 वही--27 : ३4
. वही-27 : 35
. वही-28 : 1, 2
> 09 > ८
(93)
वाला, श्रीकृष्ण जी का दिव्य कवच दिया | साथ ही बदरिकाश्रम में तपस्यारत तुलसी से विवाह करने को कहा ।!
शंखचूड ने तुलसी के पास जाकर गान्धर्व-विवाह का प्रस्ताव रखते हुए कहा--'' मैं शंखचूड देवताओं का विद्रावण कर सकता हूँ। हे भद्रे! तू मुझे नहीं जानती। में दम्भपुत्र दानव दनु के वंश में प्रकट हुआ हूँ। मैं सुदामा नामक गोप, नारायण का पार्षद हँ। इस समय मैं राधिका के शाप से दानव हुआ हूँ !''2 तुलसी ने शंखचूड के गुणों से प्रभावित होकर गान्धर्व विवाह कर लिया।3 शंखचूड पुरुष-रत्न है तथा उसकी पत्नी तुलसी स्त्री-रत्न है।
““त्व॑ वे पुरुषरत्न च त्वियं सती । विदगधाया विदरधेन संगमो गुणवान् भवेत ॥
शंखचूड अपने पराक्रम से इन्द्र-सहित सभी देवताओं को जीतकर सबका अधिपति बन गया।5 उसके राज्य में दुर्भिक्ष, महामारी और अशुभ-ग्रह जनित आधि-व्याधिकी पीड़ा नहीं थी। सभी प्रजा सुखी थी। बिना जोते पृथ्वी अनेक प्रकार का धान्य उत्पन्न करती थी। खानों से मणियॉ और सागरों से रत्न निकलते थे। वृक्षों में सदा फूल, फल लगते थे। चारों वर्ण, चारों आश्रम अपने धर्मो में स्थित थे। इसके शासन-काल में देवताओं को छोड़कर कोई दुःखी नहीं
था 16
शंखचूड स्वाभिमानी दानवाधिपति था। शिवजी के दूत पुष्पदन्त से संदेश सुनकर
. शिल पु, रु० सं० यु० खं०--28 : 6, 7 वही-28 : 21-24
वही--28 : 40
वही-28 : 35
वही--29 : 24
वही--29 : 25-29
8 ७ # ४० 2:
शंखचूड उससे हँसकर कहता है--''मैं देवताओं को राज्य न दूँगा, यह पृथ्वी वीरभोग्या है, मैं देवों के पक्षपाती रुद्र को युद्ध दूगा।''!
शंखचूड अत्यन्त विनम्र तथा गुरु को सम्मान देने वाला है। वह अपने से बड़ों का आदर करता है। गुरु शुक्राचार्य को दण्डवत् प्रणाम करता है तथा उनके अनुशासन में कार्य करता है ।2 शंखचूड, शत्रु देवताओं के पक्ष से, उसका बध करने हेतु आने वाले भगवान् शिव के प्रति भी श्रद्धावान् है। बीर रूप धारण करने वाले, काल के समान युद्ध भूमि में पधारने वाले शिवजी को देखते ही शंखचूड ने विमान से उतरकर परमभक्ति से शिर से भूमि में दण्डवत् प्रणाम किया 13
शंखचूड़ दानवीरता में भी अप्रतिम हे । युद्ध-भूमि में, विप्र-वेषधारी महामायावान् विष्णु द्वारा कवच मांगे जाने पर उस सत्यभाषी दानवराज ने उसी समय प्राणों के समान प्यारा कवच प्रदान कर दिया ४
शंखचूड़ महान् विष्णु-भक्त था। वह पूर्व जन्म में विष्णु के अवतार कृष्ण का सुदामा नामक पार्षद था। राधिका के शाप के कारण दानवेन्द्र हुआ। शंखचूड़ ने इस जन्म में तपस्या द्वारा ब्रह्मा जी से भगवान् विष्णु का दिव्य कवच प्राप्त किया था 5
इस प्रकार हम देखते हैं कि शंखचूड़ प्रतापी शासक, पुरुष-रत्न, प्रजापालक, स्वाभिमानी, विनम्र, गुरुजनों एवं पूज्यों के प्रति श्रृद्धावान्, दानवीर एवं विष्णु- भक्त आदि गुणों से सम्पन्न है। यह दैत्य-बंशोत्पन्न होने से देव-विरोधी क्रियाकलाप में आसक्त हुआ और अन्तत: शिवजी के हाथों से मारा जाकर दैत्य शरीर तो त्यागकर पूर्व दिव्य रूप को प्राप्त हुआ।
चा त
शि० पु०, रु० सं०, यु० खं०--32 : 18 वही-29 : 04 वही 39 : 06 वही 40 : 19 वही--28 : 06
(४) प्र> (2२ > “८
तारकासुर
तारकासुर 'दिति' और 'कश्यप' से उत्पन्न बज्रांग का पुत्र था। उसकी माता का नाम वरांगी था। तारकासुर के उत्पन्न होते ही स्वर्ग, भूमि और अन्तरिक्ष में सब लोकों के भयदायक तीन प्रकार के उत्पात हुए। महाशब्द करते हुए भयंकर उल्कापात होने लगे, दुःखदाई केतुओं का जहाँ-तहाँ उदय हुआ। पर्वतों-सहित पृथ्वी चलायमान हो गयी। अनेक प्रकार के भय- सूचक शब्द होने लगे। इस प्रकार उसके जन्म के समय सारे संसार में भारी उपद्रव और अपशकुन होने लगे।!
प्रजापित कश्यप ने बहुत विचारकर उस बालक का नाम 'तारक' रखा ८2 तारकासुर माता एवं गुरु को आज्ञा का पालन करने वाला था। उनकी आज्ञा मानकर वह मधुवन में जाकर ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगा।3 तारकासुर महान् तपस्वी के रूप में वर्णित है। वह एक पांव से खड़ा होकर, ऊपर को भुजा किये, नेत्रों से सूर्य को देखता हुआ, दृढ़ चित्त और दृढ़ व्रत से बराबर सौ वर्ष तक तपस्या करता रहा।
तारकासुर को कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे सम्पूर्ण सृष्टि में बलवान् होने तथा शिव के वीर्य से उत्पन्न सेनापति पुत्र से ही बध्य होने का वरदान दिया (४ वर-प्राप्ति के बाद शोणितपुर पहुँचने पर दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने असुरों के साथ त्रिलोकी के अधिपति के रूप में उसका अभिषेक किया। तब वह महादैत्य त्रिलोकी-नायक हुआ। उसने चर, अचर सब को पीडित कर सर्वत्र अपनी आज्ञा का प्रचार किया 5 दैत्याधिपति तारक ने त्रिलोकी का
manne प णा णी FN
1. शि० पु०, रु० सं०, पा० खें०--15 : 4-17 2. वही--15 : 18
3. वही-15 : 22
4. वही--15 : 40, 41
5. वही--15 : 44, 45
( 96 )
शासक होने के बाद इन्द्रादि देवताओं से, जो जिसके यहाँ रत्न थे, मांगे और उन्होंने उसके भय से स्वयं दे दिये। इन्द्र ने भयवश ऐरावत दिया तो कुबेर ने नौ निधियाँ। वरुण ने श्वेत रंग के घोड़े, ऋषियों ने कामधेनु, सूर्य ने दिव्य उच्चैःश्रवा घोड़ा भय से उसको अर्पण कर दिया। उस असुर ने जहाँ-जहाँ उत्तम वस्तु देखी, वहाँ-वहाँ उसे बलपूर्वक ग्रहण कर तीनों लोकों को निस्सार कर दिया - “यत्र यत्र शुभं वस्तु दुष्टं तेनासुरेण हि। तत्तद्गृहीतं तरसा निस्सारस्त्रिभकोऽ भवत् ॥ '1
तारकासुर ने इतने पर भी संतोष नहीं किया। देवता और पितृ आदि का जो द्रव्य था, उस दुरात्मा असुर ने वह सब ग्रहण कर लिया। त्रिलोकी को वश में करके वह स्वयं इन्द्र हुआ। वह अद्भुत स्वामी बना और उसने अद्वितीय राज्य किया 2
उस दैत्येन्द्र ने सब स्थानों से देवताओं को निकाल कर वहाँ दैत्यों को स्थापित किया। उसके इस आतंक से बाधित होकर सब इन्द्रादि देवता अनाथ और विहल हो ब्रह्मा की शरण में गये ब्रह्मा के वरदान से तारकासुर शिव-पुत्र के अतिरिक्त अन्य किसी से भी अवध्य था। ब्रह्मा ने स्वयं देवताओं से भी कहा है कि मैं, विष्णु, इन्द्र या कोई और देवता तारकासुर को नहीं मार सकता। यह मेरा वर सत्य है। यदि शिवजी के वीर्य से कोई पुत्र उत्पन्न हो तो वही तारक नामक दैत्य को मार सकता है, दूसरा नहीं ४
तारकासुर क्रूर, करुणारहित एवं देवपीड़क होते हुए भी अपने वरदाता ब्रह्माजी की आज्ञा का पालन निष्ठापूर्वक करता है। ब्रह्माजी ने जब उससे यह कहा कि मैंने तुम्हें स्वर्ग के
I SN IS
शिल पु०, रु० सं०, पा० खं०-15 : 47-50 वही--15 : 53, 54 . वही--15 : 55, 56 . वही--16 : 25, 26
7 त्रे. हग
( 97}
राज्य का वर नहीं दिया है । तुम स्वर्ग के राज्य को त्याग कर भूमण्डल का राज्य करो हे असुरोत्तम ! वहाँ देवताओं के ही योग्य सम्पूर्ण कार्य हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं । तब वह तारकासुर स्वर्ग को त्यागकर भूमि पर आ जाता है और शोणितपुर का राज्य करने लगता है ।!
दानवेन्द्र तारक परम साहसी और विद्वान् योद्धा है। वह कुमार के सेनापतित्व में आने वाली देवताओं की विशाल सेना को देखकर विचलित नहीं होता, बल्कि एक बडी सेना लेकर युद्ध के लिए गमन करता है (2 युद्ध में कुमार को देखकर विष्णु और इन्द्र को धिक्कारते हुए वीर-धर्म-मर्मज्ञ एवं युद्ध-विशारद दैत्येन्द्र तारक ने कहा कि यह दोनों महाढ़ीठ हैं जो इस बालक को इन्होंने मेरे सामने कर दिया है। मैं इस बालक को मरूंगा तो इन दोनों को वह भी पाप प्रतीत होगा।
““महाधृष्टावियो मेद्य कृतवन्तौ पुरश्शिष्टुम्। अहं बालं वधिष्यामि तयोस्योऽपि भविष्यति॥'3
तारकासुर में अपार साहस तथा वीरता थी। युद्ध में वह अकेले इन्द्र, विष्णु और वीरभद्र आदि महावीरों से सफलता-पूर्वक लड़ रहा था। महाबाहु कार्तिकेय द्वारा छाती में मारी गयी शक्ति का तिरस्कार कर दैत्य-श्रेष्ठ तारक ने महाक्रोध कर अपनी शक्ति को कुमार पर प्रहार किया | उससे शिवजी ने पुत्र मूर्छित हो गये ।4
प्रतापवान् दैत्यराज की मृत्यु से पूर्व पवन का चलना बन्द हो गया; सूर्य कान्तिहीन हो
गया, पर्वत-वन सहित पृथ्वी चलायमान हो गयी। इसी अवसर पर हिमालय आदि को लेकर
. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--16 : 38-42 . वही--7 :3
. वही-9 : 33
. वही--10 : 17, 18
PD रे ND ~
( 98)
पर्वत, स्नेह से व्याकुल होकर, दैत्यराज के शत्रु कुमार के समीप आये ।!
तारकासुर विशिष्ट-गुण-सम्पन्न शासक था | उसके राज्य में सूर्य उतना ही चमकता था जितने से किसो को दुःख न हो; चन्द्रमा कान्तियुक्त था और वायु अनुकूल चलती थी।2 वह अद्वितीय शासक था तथा उसने त्रिलोकी को वश में करके अद्भुत शासन किया--
“वशीकृत्य स लोकांस्त्रीन्स्वयमिंद्रो बधूव ह। अद्वितीय; प्रभृश्चासीद्राज्यं चक्रेऽद्भुतं वशी ॥ 2
इस प्रकार तारकासुर महाप्रतापी, परमवीर, गुरु-आंज्ञाकारी, सृष्टि की सभी उत्तम वस्तुओं का ग्रहण करने वाला, अद्वितीय शासक, परम साहसी और युद्ध-कला-विशारद आदि दिव्य गुणों से युक्त था। परम-शक्ति-सम्पन्न महान् योद्धा होते हुए भी वह अपने वरदाता ब्रह्मा को आज्ञा शिरोधार्य करके, स्वर्ग त्यागकर शोणितपुर का शासन करने लगता हे | तारकासुर शिव पुराण का एक महत्त्वपूर्ण पात्र है। इस दैत्याधिपति के कारण देव-संस्कृति में एक ऐसे व्यक्तित्व का आविर्भाव हुआ जिसके बिना उसका इतिहास ही लंगडा होता। यदि तारक न होता तो देव-संस्कृति स्वामी कार्तिकेय-सहित अनेक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों से वंचित रह जाती | अतः शिव पुराण में कुमार कार्तिकेय के साथ ही साथ दैत्येश्वर तारक की भूमिका भी महनीय है 12
कयन त
1. शि० पु०, रु० सं०, पा० खं०--10 : 24, 25 2. वही-15 : 52 3. वही-15 : 54
( 99 )
चतुर्थ अध्याय
शिव पुराण की धार्मिक अवधारणा
NO की तके. कि पीले टे
शिव-आराधना
लिङ्ग-पूजा
द्वादश ज्योतिलिङ्ग
शिव आराधना के प्रमुख उपादान शैव-व्रत
वर्णाश्रम-धर्म
शिव के विभिन्न अवतार
शिव पुराण की धार्मिक अवधारणा
“शिव पुराण' शैव धर्म का एक मान्य ग्रन्थ है। इसका अन्वेषण करने पर शैव धर्म की प्राय: सभी मान्यतायें इसमें मिल जाती हैं। शिव से सम्बन्धित धर्म को शैव धर्म कहा गया तथा इस धर्म के भक्तों और अनुयायियों को शैव | शैव धर्मावलम्बियों के प्रधान इष्टदेव भगवान् शिव हैं। शिव को प्राचीनता प्रागेतिहासिक है। यदि सैन्धव सभ्यता के अवशेषों को आधार माना जाय, जिनमें छोटे-बड़े अनेक लिङ्ग प्राप्त हुए हैं, तो शैव धर्म विश्व का प्राचीनतम् धर्म हो जायेगा। ऋग्वेद में शिव के लिए 'रुद्र' नाम का व्यवहार हुआ हे, जो अपनी कठोरता और रुद्रता के लिए प्रसिद्ध हैं। वहाँ उन्हें 'पशुप' उपाधि से युक्त बतलाया गया है।! उत्तर वैदिक काल में उन्हें पशुओं का स्वामी कहा गया,2 जो *पशुपति' के रूप में उनका विशिष्ट नाम हो गया। चर्म धारण करने के कारण वे 'कृत्तिवासनः' के रूप में भी चित्रित किये गये हैं। सम्भवतः निषाद आदि अनार्यो से सम्बद्ध होने के कारण ही उनको चर्म परिधान धारण करने वाला माना गया था। कतिपय विद्वान् उन्हें अनार्य जातियों के उपास्य एवं आराध्य देव के रूप में स्वीकार करते हैं। सूत्र ग्रन्थों में भी शिव की अपनी अलग विशेषता है। उपलब्ध साक्ष्यों से यह प्रमाणित होता है कि उनका अनार्य तत्त्वों पर विशेष प्रभाव था।3 श्वेताश्वर, अथर्वशिरस् आदि उपनिषदों में शिव तत्त्व को प्रमुखता से वर्णित किया गया है। तैत्तिरीय संहिता में तो ईश्वर, जीव और प्रकृति तत्त्वों को एकता शिव से स्थापित की गयी है।4 महाभारत में शिव का उल्लेख श्रेष्ठ देवता के रूप में है; जिनसे “पाशुपत' अस्त्र प्राप्त करने के लिए अर्जुन को हिमालय जाना पड़ा था और भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर अर्जुन को “पाशुपत' अस्त्र प्रदान
- ऋग्वेद--1 : 114 : 9
- “पशुनां पतये नमः'—वा० सं० 16 : 1 - ० गृ० सू०--3 : 15
. तै० सं०--4 : 5 : 1
> YD ८-४
( 100 )
किया ।1 पुत्र-प्राप्ति के लिए योगेश्वर कृष्ण ने स्वयं शिव की आराधना की थी तदन्तर भगवान् शिव ने कृष्ण को मनोवांछित वर प्रदान किया था 12 गुप्त-काल में शैव धर्म सम्मानजनक स्थिति में था | तत्कालीन महाकवि कालिदास ने तो 'कुमारसम्भव' में शिव के चरित्र, महिमा और गुणों का मनोरम चित्रण किया है। पुराणों में उनको त्र्यंबक, भव, शर्व, महादेव, ईशान, शूलपाणि, शंकर, त्रिशूलधारी, पिनाको, नीललोहित, नीलग्रीव, शितिकण्ठ, सहस्राक्ष, वृषभध्वज पशुपति, अतिभैरव आदि विविध नामों से अभिहित किया गया है।
साहित्यिक अनुशीलन इस तथ्य की पुष्टि करता है कि शैव धर्म का विभिन्न सम्प्रदायो के रूप में विकास हुआ।3 शैव, कालानन (कालमुख), पाशुपत और कापालिक आदि सम्प्रदाय इसके उदाहरण हैं ४ कलचुरि-अभिलेख में शिव को परम ब्रह्म देवदेव और जगदगुरु कहा गया है, जिनको सेवा में ब्रह्मा और अन्य देव प्रस्तुत किये गये हैं।5 कलचुरि-शासकों ने अनेक शिव-मन्दिर बनवाकर शिव उपासक के रूप में अपने को प्रतिष्ठित किया। खजुराहों का शिव-मन्दिर, सोमनाथ-मन्दिर, काशी-विश्वनाथ मन्दिर सहित विभिन्न शिव-मन्दिरों का निर्माण शिव एवं शैव धर्म की विशिष्टता को प्रतिध्वनित करते हैं ।
. महाभारत-वनपर्व--38-40
. वही- अनुशासन पर्व-14
- पाठक, वी० एस०-हिस्ट्री अव शैव कल्टस् इन नार्दर्न इण्डिया, पृष्ठ-3 . इपींग्रापिया इण्डिया, 2-पृष्ठ 18
. वामन पुराण-अध्याय 6
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( 101 )
शिव-आराधना
शैव धर्म की मान्यता है कि भगवान् शिव की आराधना से अभ्युदय एवं निःश्रेयस दोनों की प्राप्ति होती है । शिव पुराण में शिव नाम को समस्त पापों का नाशक तथा मोक्षदायक प्रतिपादित किया गया हे ॥ अत: जीवन को सफल बनाने की इच्छा वाले प्राणी को चाहिए कि वह पूर्ण निष्ठा से भगवान् शिव की पूजा, अर्चना, वन्दन एवं शरण का आश्रय प्राप्त करे । भगवान् शिव कोआराधना लिङ्ग एवं प्रतिमा दोनों रूपों में करने का विधान शिव पुराण में वर्णित है किन्तु वहाँ शिव प्रतिमा की अपेक्षा लिङ्गार्चन की महत्ता विशेष रूप से दृष्टिगोचर होती है। शिवलिङ्ग को शिव मूर्ति की अपेक्षा श्रेयस्कर प्रतिपादित किया गया है।2 शिवलिङ्ग के यजन में मानवमात्र का, चाहे वे किसी भी जाति के हों, अधिकार हैं 13 यहाँ पुरुष और स्त्री को समान अधिकार प्राप्त है।4 विद्येश्वर संहिता में द्विजों के लिए वैदिक पद्धति से शिवलिङ्ग के यजन का विधान है जबकि अन्य लोगों के लिए वैदिक मार्ग अपनाने की सम्मति नहीं है 5
शिव पुराण के अनुशीलन से यह स्पष्ट होता है कि अन्य लिङ्गों की अपेक्षा पार्थिव लिङ्ग उत्कृष्ट है।6 विद्येश्वर संहिता में पार्थिव पूजा की पद्धति का बैदिक विधान विस्तार के साथ वर्णित है, जो भोग और मोक्ष दोनों का प्रदाता है। व्यक्ति को अपनी रुचि के अनुसार सम्पूर्ण नित्यकर्म को पूर्ण करके शिव स्मरण पूर्वक भस्म और रुद्राक्ष धारण करना चाहिये।
- शि० पु०, विर सं०--23 . वही--५ : 46 . वही--21 : 39-40 . वही 16 : 5 . “ द्विजानां वैदिकेनापि मार्गेणाराधनं वरम्। अन्येषामपि जन्तूनां वैदिकेन न सम्मतम्॥ वही-21 : 41 6. वही - 21:4
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( 102 )
तदनन्तर सम्पूर्ण मनोवांछित फल को सिद्धि के लिए उच्च भक्ति भाव के साथ उत्तम पार्थिव लिङ्ग का वेदोक्त विधि से सम्यक् पूजन करना चाहिये। नदी अथवा तालाब के किनारे, पर्वत पर, वन में, शिवालय में अथवा और किसी पवित्र स्थान में पार्थिव पूजा करने का विधान है। ब्राह्मण के लिए श्वेत, क्षत्रिय के लिए लाल, वैश्य के लिए पीली और शूद्र के लिए काली मिट्टी से शिवलिङ्ग बनाने का विधान है। अथवा जो मिट्टी जहाँ प्राप्त हो जाय उसी से शिवलिङ्ग बनाना चाहिये |
शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में पार्थिव लिङ्ग पूजन की वैदिक विधि का वर्णन इस प्रकार किया गया है--
'सद्यो जातं' 1 इस ऋचा से पार्थिव लिङ्ग बनाने के लिए मिट्टी लाये। ' वामदेवाय० '2 इत्यादि मन्त्र पढ़कर उसमें जल डाले। (जब मिट्टी सनकर तैयार हो जाय तब) “अघोर० 3 मन्त्र से लिङ्ग का निर्माण करें। फिर “तत्पुरुषाय'4 इस मन्त्र से विधिवत् भगवान् शिव का उसमें आवाहन करें। तदनन्तर 'इशान०'5 मन्त्र से भगवान् शिव को वेदी पर स्थापित करें । इनके अतिरिक्त अन्य सब विधानों को भी शुद्ध बुद्धि वाला उपासक संक्षेप से ही सम्पन्न करे | इसके बाद विद्वान् पुरुष पंचाक्षर मन्त्र से अथवा गुरु प्रदत्त अन्य किसी शैव मन्त्र से षोडश उपचारों द्वारा विधिवत् पूजन करे। अथवा
1. सद्यो जातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्वाय नम:॥
2. 3% वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नम: कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय् नमो मनोन्मथाय नम: ।
3. 3» अधघोरेभ्यो5थ घोरेभ्यो घोरघोतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः।
4. 3» तत्पुरुषाब विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् |
5. 3% ईशान: सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर््रह्मणो ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदा शिवोम्।
{ 103 )
“भवाय भवनाशाय महादेवाय धोमहि । उग्राय उग्रनाशाय शर्वाय शशिमौलिने ॥ 0
इस मन्त्र द्वारा विद्वान् उपासक भगवान् शङ्कर की पूजा करे। वह भ्रम छोड़कर उत्तम भक्तिभाव से शिव की आराधना करे, क्योंकि भगवान् शिव भक्ति से ही मनोवांछित फल देते हँ ।
पार्थिव लिङ्ग पूजन को उक्त विधि के अतिरिक्त शिव पुराण में एक अन्य विधि का उल्लेख है जिसमें पार्थिव लिङ्ग की पूजा भगवान् शिव के नामों से निर्दिष्ट को गई है। हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि, पिनाकधृक्, शिव, पशुपति और महादेव ये शिव के आठ नाम परिगणित है। इस अष्ट नामों में प्रथम नाम 'हर' का आश्रय लेकर “3७ हराय नमः' इस प्रकार उच्चारण करके पार्थिव लिङ्ग बनाने के लिए मिट्टी लायी जाय। दूसरे नाम 'महेश्वर' का आश्रय लेकर ' ३» महेश्वराय नमः' का उच्चारण करके शिवलिङ्ग का निर्माण करें फिर तृतीय नाम 'शम्भु' का आश्रय लेकर ' ३७ शम्भवे नमः' बोलकर पार्थिव लिङ्ग की प्रतिष्ठा करें और तत्पश्चात् शिव के चतुर्थ नाम 'शूलपाणि' का आश्रय लेकर ' ३% शूलपाणये नमः' कहकर उस पार्थिव लिङ्ग में भगवान् शिव का आवाहन करें। पंचम नाम 'पिनाकधृकू' का आश्रय लेकर ' 3 पिनाकधृषे नमः' बोलकर उसको पूजा करें, पुनः शिव के षष्ठ नाम 'शिव' का आश्रय लेकर *३% शिवाय नमः' कहकर पूजा करें फिर सप्तम नाम 'पशुपति' का आश्रय लेकर ' ३% पशुपतये नमः' बोलकर क्षमा प्रार्थना करें और अन्तिम नाम “महादेव” का आश्रय लेकर ' 3% महादेवाय नम:' कहकर आराध्य देव का विसर्जन कर दें। प्रत्येक नाम के आदि में ओंकार और अन्त में चतुर्थी विभक्ति के साथ “नमः” पद लगाकर आनन्द और भक्तिभाव से पूजन सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्य करना चाहिये।2 उक्त दोनों विधियों में वैदिक विधि के प्रति शिव पुराण विशेष आदर का भाब व्यक्त करता है 9
1. शि० मु०, विन सं०--20 : 43 2. वहो--20 : 47-49 3. वही--20 : 45
( 104 )
लिङ्ग-पूजा
लिङ्ग की पूजा प्राचीन काल से ही संसार में होती रही है।! ख्रीष्टीय धर्म के प्रचार के पूर्व पाश्चात्य देशों की सभी जातियों में लिङ्ग पूजा किसी न किसी रूप में प्रचलित थी। रोम तथा यूनान में क्रमशः “प्रियेपस' और “फल्लुस' नाम से लिङ्ग की सी पूजा होती थी। यहाँ लिङ्ग पूजा प्राचीन धर्म का प्रधान अङ्ग था। वृष को मूर्ति लिङ्ग के साथ ही पूज्य थी। पूजा की विधि में धूप, दीप, पुष्पादि हिन्दुओं को ही तरह प्रयोग में आते थे 12
भारत में तो हिमालय में मानवसरोवर और कैलास से लेकर कन्याकुमारी तक तथा अटक से लेकर कटक तक असंख्य लिङ्ग और शिवालय हैं । शिवलिङ्ग और शिवालय भारतीय संस्कारों में व्याप्त हैं। “मोहनजोदड़ों' और 'हड्प्पा' को खुदाई में ऐसी तहों में शिवलिङ्ग मिलते हैं जो समय को निकट से निकट खींच लाने वाले कट्टर आनुमानिकों की अटकल से आज से कम से कम छः हजार वर्ष पहले ठहरते हैं।
शिव पुराण के अनुसार इस भूतल पर जो शिवलिङ्ग सर्वप्रथम आविर्भूत हुआ, वह आदि-अन्त-विहीन था।3 उसे स्तम्भ भी कहा गया है। उसी समय से सुर, असुर, ऋषि, नर, नाग, नारी सब ने लिङ्ग प्रतिष्ठा एवं लिङ्ग में शिव को पूजा प्रारम्भ को हे 15 सर्वप्रथम आविर्भूत होने वाला उक्त शिवलिङ्ग ज्चालामाला से आवृत्त बतलाया गया है।6
शिव पुराण में बाह्य और आध्यात्मिक लिङ्गों की चर्चा को गई है। यह इस बात का
- KEliments of Hindu Iconography, Page 70 . लिङ्ग रहस्य-रामदास गौड
. शि० पु०, रु० सं०, सु० खं०--7 : 48
- वबही--7 : 51
. शि० पु०, वा० सं०, उ० स्ं०-35 : 85
. वहीं--34 : 33
(7५ ५. त> (> (७3 r—
( 105 )
साक्ष्य देता है कि शिवलिङ्ग, फाल्लुस न होकर शिव बोधक चिह है। प्रारम्भ में जो शिलाखण्ड देवता का एकमात्र उपलक्षक था, चिह्न था, कालान्तर में समय की गति के साथ शिवलिङ्ग का रूप धारण कर शिव को निराकारता का बोधक बना। इसके अतिरिक्त शिव पुराण में इस बात का भी सङ्केत किया गया है कि शिवलिङ्ग शिव बोधक चिह्न ही है--
“ततः स्वलिंगचिह्वत्वात्स्तम्भतो निष्कलं शिव: । स्वलिंगं दर्शयामास जगतां हितकाम्यया ॥ 1
यद्यपि शिव पुराण में ऐसा स्थल दुर्लभ नहीं जहाँ पर कि शिवलिङ्ग को लिङ्ग लक्षण से युक्त बतालायागया है।2 किन्तु स्पष्ट ही ऐसा स्थल प्रक्षिप्त है, जिसे किसी शैव विद्वान् ने बाद में जोड़ दिया है,क्योंकि उक्त श्लोक के तत्काल बाद वाले श्लोक में कहा गया है कि-शिवलिङ्ग मदात्मक (शिवात्मक) है और यह मेरे सान्निध्य का कारण है। लिङ्ग (चिह्न) एवं लिङ्गी (शिव) में नित्य ही अभेद होने के कारण यह लिङ्ग बड़े लोगों के लिए पूज्य है 13 यहाँ पर लिङ्ग एवं लिङ्गी शब्द से जिस भाव एवं अर्थ की अभिव्यक्ति हो रही है वह पूर्व श्लोक के अर्थ से पूर्ण भिन्न है। उत्तर श्लोक का भाव शिव पुराण में कतिपय स्थलों में आवृत्त हुआ है। ऐसी अवस्था में स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि पूर्व श्लोक प्रक्षिप्त एवं बाद का है। अत: शिवलिङ्ग का अर्थ शिवज्ञापक चिह्न ही करना अधिक युक्तियुक्त है |
1. शि० पु०, वि० सं०--5 : 29
2. वही--9 : 42
3. ` मदात्मकमिदं नित्यं मम सान्निध्यकारणम्। महत्पूञ्यमिदं नित्यमभेदालिंगसिंगिनो: ॥''--वही--9 : 43
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द्वादश ज्योतिर्लिड्र
भारत वर्ष के कुछ शिवलिङ्ग प्राचीन काल से आज तक जनता की श्रद्धा और भक्ति के केन्द्र बने हुये हैं । भारतीय लोग इनका दर्शन एवं पूजन कर अपने ऐहिक कल्याण के साथ ही पारलौकिक विभूति की कामना करते हैं। इस प्रकार के शिवलिङ्गों में द्वादश ज्योतिलिंङ्गों का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। भारत की विभिन्न दिशओं में स्थित ये ज्योतिर्लिङ्ग आध्यात्मिक प्रेरणा के साथ ही इस देश की एकता एवं अखण्डता के भी प्रतिपादक रहे हैं। आज भी श्रद्धालु जनता इनका दर्शन कर अपने को कृतकृत्य मानती है।
1. सोमनाथ
भगवान् शिव का यह अवतार सौराष्ट्र प्रान्त के 'प्रभास' नामक क्षेत्र में हुआ था!! शिव पुराण के अनुसार महामना प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्विनी, रोहिणी आदि सत्ताईस कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ किया था। उन सत्ताईस पत्नियों में चन्द्रमा को रोहिणी नाम की पत्नी जितनी प्रिय हुई उतनी अन्य नहीं। तब रोहिणी को छोड़कर अन्य स्त्रियाँ दुखित होकर अपने पिता दक्ष के शरण में गयी। दक्ष द्वारा सभी स्त्रियों के साथ समान व्यवहार करने के लिये सुझाव देने पर भी जब चन्द्रमा ने उनकी बातों पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया तब दक्ष ने उसे क्षयी होने का शाप दे दिया।2 चन्द्रमा को क्षीणता से हाहाकार मच गया। इन्द्रादि देवता सहित चन्द्रमा ब्रह्मा जी के पास गये। ब्रह्मा जी की आज्ञा से देवताओं के साथ चन्द्रमा प्रभास क्षेत्र में जाकर महामृत्युञ्जय के विधान से शिव जी की आराधना करने लगे। उन्हें तपस्या करते देख भक्तवत्सल भगवान् शङ्कर उनके सामने प्रकट होकर कहने लगे--' मैं तुम्हारे ऊपर
1. शि० पु०, श रु० सं०--42 : 2 2. शि० पु०, कौ० रु० सं०--14 : 2
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प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मन में जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो!” चन्द्रमा ने कहा 'हे देव! मेरे शरीर के इस क्षय रोग का निवारण कोजिए', ऐसा चन्द्रमा के कहने पर भगवान् शिव ने कहा--हे चन्द्रदेव! “एक पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण होगी और दूरे पक्ष में फिर वह निरन्तर बढ़ा करेगी ।''
“पक्षे च क्षीयतां चन्द्र कला ते च दिने दिने। पुनश्च वर्धतां पक्षे सा कला च निरन्तरम् ॥ 1
भगवान् शिव द्वारा चन्द्रमा को वर देने को बात सुनकर सम्पूर्ण देवगण प्रभास क्षेत्र में जाकर चन्द्रमा को आशीर्वाद देकर भगवान् शिव से आदरपूर्वक बोले-हे शम्भो! ' अब आप पार्वती सहित यहाँ ही स्थित रहे'। देवताओं पर प्रसन्न होकर उस क्षेत्र के माहात्म्य को बढ़ाने तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिये भगवान् शंकर उन्हीं के नाम पर वहाँ
'सोमेशवर' कहलाये और *सोमनाथ' के नाम से तीनों लोकों में विख्यात हो गये 2
'सोमनाथ' का पूजन करने से उपासक के क्षय तथा कोढ़ आदि रोगों का नाश होजाता है। वही सम्पूर्ण देवताओं ने सोमकुण्ड (चन्द्रकुण्ड) की भी स्थापना की है, जिसमें शिव तथा ब्रह्म का सदा निवास माना जाता है। 'चन्द्रकुण्ड' इस भूतल पर पापनाशन तीर्थ के रूप में प्रसिष्ठु है । जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।3 पृथ्वी और
सागर के संयोग में ' अन्तकेश' नामक सोमेश्वर का उपलिङ्ग है 4
. शिन पु०, को० रु० सं०--14 : 45 . वही--14 : 50, 51
. वही-14 : 52-54
वही--1 : 35
जि ७० ० टा
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2. मल्लिकार्जुन
भगवान् शिव का मल्लिकार्जुन नामक अवतार श्री शैल में हुआ था।! शिव पुराण के अनुसार एक बार गणेश और स्कन्द में विवाद हुआ कि किसका विवाह पहले हो। भगवान् शिव ने कहा कि 'जो सर्वप्रथम पृथ्वी की परिक्रमा करके आयेगा उसी का विवाह पहले किया जायेगा । '2 महाबली स्कन्द पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े, किन्तु गणेश जी ने शिव और पार्वती की पूजा करके उन्हीं की परिक्रमा की और उसी से अपने को पृथ्वी को परिक्रमा करने के फल का भागीदार बतलाया उनके तर्को से सहमत होकर शिव-पार्वती ने उनका विवाह कर दिया।
महाबली स्कन्द सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके जब कैलास पर्वत पर आये, तब नारद जी ने उनसे गणेश के विवाह आदि का सब वृतान्त सुनाया। इस पर शिव-पार्वती के मना करने पर भी वे न माने और कैलास पर्वत को छोड़कर क्रौञ्च पर्वत पर चले गये जिससे उनकी माता को बहुत दुःख हुआ। पुत्र स्नेह के वशीभूत होकर शिव एवं पार्वती क्रौञ्च पर्वत को गये। जब कुमार ने यह सुना कि उसके माता-पिता यहाँ आ रहे हैं तो वे क्रौञ्च पर्वत को छोड़कर उससे तीन योजन दूर चले गये। अपने पुत्र कुमार को दूर चला गया जानकर शिव तथा पार्वती ज्योतिर्मय स्वरूप धारण करके वहाँ प्रतिष्ठित हो गये।4 अमावस्या के दिन भगवान् शङ्कर स्वयं वहाँ जाते हैं और पौर्णमासी के दिन पार्वती जी निश्चय ही वहाँ पदार्पण करती हैं। उसी दिन से लेकर भगवान् शिव का 'मल्लिकार्जुन' नामक लिङ्ग तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ।5 उसमें पार्वती तथा शिव दोनों की ज्योतियाँ प्रतिष्ठित हैं। 'मल्लिका' का अर्थ
; शि० पु०, को० रु० सं०--1 : 35
1
2. शि० पु०, रु० सं०, कु० सं०--19 : 18 3. वही--19 : 39
4. शि० पु०, को० रु० सं०--15 : 16
5. वही--15 : 19
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पार्वती है और 'अर्जुन' शब्द शिव का वाचक है। इस लिङ्ग के दर्शन से सम्पूर्ण पाप विनष्ट हो जाते हैं और समग्र मनोरथों को सिद्धि भी होती है। भृगुकक्ष में मल्लिकार्जुन से उत्पन्न हुआ, 'रुद्रेश्वर' नामक उपलिङ्ग स्थित है ।!
3. महाकाल द्वादश ज्योतिर्लिङ्गं में भगवान् शिव का तृतीय ज्योतिर्लिङ्ग 'महाकाल' के नाम से विख्यात है। भगवान् शङ्कर का यह अवतार उज्जैन में हुआ था।2 इस ज्योतिर्लिङ्ग के प्रादुर्भाव कोकथा, शिव पुराण में इस प्रकार वर्णित की गयी है-
अवन्ति नाम से प्रसिद्ध शिव जी की प्रिय नगरी में वेदप्रिय नामक एक ब्राह्मण रहते थे। उनके देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और सुव्रत नामक चार पुत्र थे, जो नित्य शिव जी की पूजा में तत्पर तथा माता-पिता के परम भक्त थे उसी समय 'रत्नमाल' पर्वत पर 'दूषण' नामक दैत्यों का एक राजा रहता था। उसे ब्रह्माजी का वर प्राप्त था। जिसके प्रताप से वह अपने आगे संसार को तुच्छ समझता था। पृथिवी पर से धर्म का समूलोन्मूलन ही उसको प्रधान उद्देश्य था। इसी उद्देश्य से उसने उज्जयिनी पर आक्रमण किया। उसकी आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलयाग्नि के समान प्रकट हो गये, परन्तु वे शिव विश्वासी ब्राह्मण-बन्धु उनसे डरे नहों। जब नगर के ब्राह्मण बहुत घबरा गये, तब उन्होंने उनको आश्वासन देते हुए कहा--' आप लोक भक्तवत्सल भगवान् शङ्कर पर भरोसा रखें।'यों कहकर शिवलिङ्ग का पूजन करके वे भगवान् शिव का ध्यान करने लगे 3
जब सेनासहित दूषण ने उन ब्राह्मणों को देखा तो कहा--' इन्हें मार डालो, बाँध लो ।'
1. शि० पु०, को० रु० सं०--16 : 36 2. वही--36 : 37 3. वही--16 : 24-34
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वेदप्रिय के पुत्र उन ब्राह्मणों ने उस समय उस दैत्य को कही हुई वह बात नहीं सुनी; क्योंकि वे भगवान् शम्भु के ध्यान-मार्ग में स्थित थे। उस दुष्टात्मा दैत्य ने ज्यों ही उन ब्रह्मणों को मारने की इच्छा की, त्यों ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिङ्ग के स्थान में बड़ी भारी आवाज के साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया उस गड्ढे से तत्काल विकट रूपधारी भगवान् शिव प्रकट हो गये, जो महाकाल नाम से विख्यात हुए। उन्होंने अपने हुङ्कार से ही ससैन्य दूषण का वध कर
डाला ।1
उज्जयिनी के ब्राह्मणों ने भगवान् शिव से लोकरक्षार्थ वही स्थित होने की प्रार्थना की 12 उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए उसी गर्त में,महाकाल नाम से, भगवान् शिव स्थित हो गये । उनका दर्शन करने से स्वप्न में भी कोई दुःखी नहीं होता। जिस-जिस कामना को लेकर कोई उस लिङ्ग की उपासना करता है, उसे वह अपना मनोरथ प्राप्त हो जाता है तथा परलोक में मोक्ष भी मिल जाता है इस ज्योतिर्लिङ्ग का उपलिङ्ग 'दुग्धेश' नाम से प्रसिद्ध है 14
4. ओंकारेश्वर, अमरेश्वर
भगवान् शिव का चतुर्थ ज्योतिलिंङ्गात्मक अवतार ओंकार नामक स्थान में हुआ था 5 शिव पुराण के अनुसार एक समय नारद मुनि गिरिराज विन्ध्य के पास गये। मेरे यहाँ सब कुछ है, किसी प्रकार को कमी नहीं है, ऐसा अहंकार करके वह विन्ध्याचल नारद जी के आगे खड़ा हो गया।6 उन्होंने विन्ध्य से कहा--तुम्हारे यहाँ सब कुछ है, फिर भी मेरु पर्वत तुमसे
शि० पु०, को० रु० सं०--16 : 39 वही--16 : 46
वही--16 : 50, 51
वही--1 : 37
वही--1 : 21
वही--18 : 5, 6
0१ (> (22 (9 ८
( 111 )
बहुत ऊँचा है। उसके शिखरों का विभाग देवताओं के लोकों में भी पहुंचा हुआ है । किन्तु तुम्हारे शिखर का भाग वहाँ कभी नहीं पहुँच सका है।!
नारद मुनि के चले जाने के बाद सन्तप्त विन्ध्य ने भगवान् शम्भु की आराधना करने का निश्चय किया। तदनन्तर जहाँ साक्षात् ओंकार की स्थिति है, वहाँ जाकर उसने पार्थिव मूर्ति बनायी और छः: मास तक निरन्तर तप किया।2 उसको तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने अपना दुर्लभ दर्शनं देते हुए 'जो कुछ चाहोगे, वह कर सकोगे' ऐसा वरदान दिया उसी समय देवता तथा निर्मल अन्तःकरण वाले ऋषियों की प्रार्थना से भगवान् शिव वही स्थित हो गये! किन्तु भगवान् शङ्कर का जो ओंकार लिङ्ग था, बह दो स्वरूपो में विभक्त हो गया। प्रणव में जो सदाशिव थे, वे ओंकार नाम से विख्यात हुए और पार्थिव मूर्ति में जो शिव-ज्योति प्रतिष्ठित हुई, उसकी परमेश्वर संज्ञा हुई। परमेश्वर को ही अमरेश्वर भी कहते हैं ।4 ओंकार से उत्पन्न हुआ 'कर्मदेश' नामक उपलिङ्ग 'विन्दुसरोबर' में स्थित है। इसे सम्पूर्ण कामनाओं का दाता कहा गया है 15
5. केदारेश्वर
हिमगिरि के केदार शिखर पर भगवान् शिव का यह अवतार हुआ था।6 शिव पुराण में कथा आती है कि भगवान् विष्णु के अवतार नर, नारायण ने एक समय भारतवर्ष के बदरिकाश्रम में पार्थिव शिवलिङ्ग बनाकर तपस्या किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर
शि० पु०, को० ₹० सं०--18 : 9 वही--18 : 13
वही-18 : 19
. वही--18 : 23
. वही-1-38
. वही-42 : 31
DOAN ले दणी
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परमेश्वर शिव ने उनसे वर माँगने को कहा। तब नर-नारायण ने लोगों के हित की कामना से कहा--' देवेश्वर यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने स्वरूप में पूजा ग्रहण करने के लिए यही स्थित हो जाइये।'!
उन दोनों बन्धुओ के इस प्रकार अनुरोध करने पर कल्याणकारी महेश्वर हिमालय के उस केदार तीर्थ में स्वयं ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में स्थित हो गये। जो भक्त केदारेश्वर शिव का दर्शन और पूजन करता है उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं।2 केदारेश्वर के दर्शन से स्वप्न में भी दुःख नहीं प्राप्त होता।3 जो व्यक्ति केदारेश्वर महादेव के मार्ग में मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, निःसन्देह वे मुक्त हो जाते हैं तथा जो वहाँ पूजन कर जलपान करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता # केदारेश्वर लिङ्ग से उत्पन्न हुआ ' भूतेश' नामक उपलिङ्ग यमुना के तट पर स्थित है।
6. भीम शंकर
भगवान् शंकर का षष्ठ ज्योतिरलिंगात्मक अवतार “डाकिनी ' नामक स्थान में हुआ था। यह स्थान कामरूप (आसाम) में पड़ता है 5 इस अवतार का कारण इस प्रकार है-
राक्षस कर्कट से पुष्करी में उत्पन्न कर्कटी नाम की एक राक्षसी थी। एक बार रावणानुज कुम्भकर्ण ने उसके साथ संभोग किया। जिससे भीम नाम का एक बालक उत्पन्न हुआ 6 भीम ने जब अपनी माँ से सुना कि उसके सम्पूर्ण परिवार का विनाश भगवान् हरि से हुआ है तो उसने बदला देने की भावना से ब्रह्मा को उद्देश्य करके तप किया और उनसे अतुल
शि० पु०, को० रु० सं०--19 : 6 वही--19 : 11
वही--19 : 12
. वही--19 : 22, 23
. शि० पु०, श० रु० सं०--42 : 31
. शि० पु०, को०, रु० सं०--20 : 17, 18
9 ७ # 2 ० ४7
( 113 )
बल प्राप्त किया | उसने सम्पूर्ण देवों को अधिकारच्युत कर उनको स्थान से निकाल दिया।
देव विजय के अनन्तर उसने पृथिवी को जीतने के प्रसङ्ग में सबसे पहले 'कामरूपेश्वर ' को, जो भगवान् शिव के प्रबल भक्त थे, जीतकर सपत्नीक उन्हें करागार में डाल दिया। एक दिन किसी अनुचर ने जाकर राक्षस-राज भीम से कहा कि 'राजा आपको मारने के लिए कुछ आभिचारिक क्रिया कर रहे हैं।
अनुचर के उपर्युक्त कथन को सुनकर वह राक्षस तलवार को हाथ में लेकर वहाँ पहुँचा जहाँ कामरूपेश्वर ध्यानरत थे। तदनन्तर अतिक्रुद्ध उस राक्षस ने अपने तलवार से उस पार्थिव लिङ्ग पर प्रहार किया। जब तक वह तलवार उस पार्थिव का स्पर्श करती उसके पूर्व ही उस पार्थिव से स्वयं भगवान् हर प्रकट हुये।2 अपने हुङ्ारास्त्र से भगवान् शंकर ने ससैन्य भीम को जलाकर भस्म कर दिया।
राक्षस परिवार को विनष्ट देखकर देवों आदि ने भगवान् शंकर से वही निवास करने के लिये अनुरोध किया। तभी से भगवान् शंकर ' भीम शंकर' नाम से वह स्थित हो गये। इनके दर्शन से सम्पूर्ण आपत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। ' भीम शंकर' से प्रकट हुआ ' भीमेशवर' नामक उपलिङ्ग सह्य पर्वत पर स्थित है। उसके दर्शन और पूजन से बल को वृद्धि होती है 13
7. विश्वेश्वर
भगवान् शङ्कर का 'विश्श्वेशवर' नामक अवतार 'काशी' में हुआ था 4 इस ज्योतिर्लिङ्ग की पृष्ठभूमि में दार्शनिक भावना का संयोग है। शिव पुराण के अनुसार इस भूतल पर जो कोई
, शि० पु०, को०, रु० सं०--20 : 32-34 , वही-21 : 32
. वही--1-40
. शि० पु०, श० रु० सं०--42 : 3
+ परे ४ "ण
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वस्तु दृष्टिगोचर होती है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्विकार एवं सनातन ब्रह्म रूप है। जब उसी कैवल्य परमेश्वर ने कुछ अन्य होने की इच्छा की तो वही सगुण रूप से शिव हो गये | वह शिव स्त्री-पुरुष के भेद से दो प्रकार के रूप वाले हैं । उनमें जो पुरुष रूप हैं वह 'शिव' तथा जो स्त्री रूप हैं वह 'शक्ति' के नाम से जाना जाता है।! उन अदृष्ट, चिदानन्दस्वरूप से स्वभावतः प्रकृति (विष्णु को शक्ति) और पुरुष (विष्णु) निर्मित हुये ।2
भगवान् शिव ने काशी में स्वयं अविमुक्त लिङ्ग को स्थापना की। स्थापना के बाद शङ्कर जी ने अपने लिङ्ग को कभी काशी का परित्याग न करने को कहा।3 काशी में मुक्तिप्रद अविमुक्तेशवर नामक लिङ्ग सदैव विराजमान रहता है। जो महापातकी पुरुषों को भी मोक्ष प्रदान करने वाला है। अन्य मोक्षदायक धामों में प्राणियों को सारूप्यादि मुक्ति प्राप्त होती है किन्तु काशी में जीवों को सायुज्य नामक सर्वोत्तम मुक्ति मिलती है 5 इनके कोई उपलिङ्ग नहीं हैं।
8. त्र्यम्बक
भगवान् शङ्कर का 'त्र्य्बक' नामक अवतार गौतमी (गोदावरी) नदी के तट पर हुआ था |6 शिव पुराण में कथा आती है कि एक बार ऋषियों ने गौतम मुनि पर गोहत्या काआरोप लगाकर ब्रह्मगिरि आश्रम से निष्कासित कर दिया था। गोहत्या से मुक्ति होने के लिए महर्षि गौतम ने कठिन तप किया। उनको तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें पवित्र करने
1 शि० पु०, को० रु० सं०--22 : 3-4 . वही--22 : 6
- वही--22 : 21
. वही--22 : 25
. वही--22 :29
. शिन पु०, श० रु० सं०--42 : 3
(४ (2 “>> ७२2 (>
( 115 )
के लिए गंगा को दिया तथा उनसे (गंगा से) कहा-हे देवि! तुम वैवस्वत मनु के अट्ठाईसवें कलियुग तक यही निवास करो ।! |
भगवान् शिव के कथन को शिरोधार्य करती हुई गंगा जी ने उनसे निवेदन किया कि “आप भी अम्बा एवं गणों के साथ मेरे पास वास करें।'2 गंगा की इस प्रार्थना को सुनकर भगवान् शिव ने कहा कि “मैं तुमसे भिन्न नहीं हूँ, तथापि मैं तुम्हारे समीप ही स्थित रहूँगा।' इस प्रकार गौतम तथा ऋषियों की प्रार्थना से भगवान् शङ्कर तथा गंगा जी वहाँ स्थित हुई। यह ज्योतिर्लिङ्ग 'त्र्यम्बक' नाम से विख्यात है। इसके दर्शन से सम्पूर्ण पाप विनष्ट हो जाते हें 13 अन्य ज्योतिर्लिङ्गों की अपेक्षा यह ज्योतिर्लिङ्ग अर्वाचीन है। शिव पुराण के अनुसार इसको स्थापना हुये लगभग 800 वर्ष व्यतीत हुये हें ।
9. वैद्यनाथ
भगवान् शिव का नवम, वैद्यनाथ संज्ञक, ज्योतिर्लिङ्ग “चिताभूमि' में स्थित है ४ शिव पुराण के अनुसार राक्षसाधिप रावण कैलास पर्वत पर भक्ति भाव से भगवान् शिव को आराधना कर रहा था। कुछ काल तक आराधना करने पर जब महादेव जी प्रसन्न नहीं हुए, तब दैत्यराज रावण ने अपना मस्तक काटकर शङ्कर जी का पूजन आरम्भ किया। विधिपूर्वक शिव जी की पूजा करके वह अपना एक-एक सिर काटता और भगवान् को समर्पित कर देता था। इस तरह उसने क्रमशः अपना नौ सिर काट डाले। जब एक ही सिर बाकी रह गया, तब
भक्तवत्सल भगवान् शङ्कर सन्तुष्ट एवं प्रसन्न होकर वहीं उसके सामने प्रकट हो गये # भगवान्
शि० पु०, को० रु० सं०--26 : 29 . वही--26 : 32
वही--27 : 2
शि० पु०, श० रु० सं०--42 : 3 शि० पु०, को रू० सं०--28 : 2-4
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शिव ने उसके सभी मस्तकों को नीरोग करके उसे उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम उत्तम बल प्रदान किया ॥! |
भगवान् शिव का कृपा प्रसाद पाकर राक्षस रावण वे नतमस्तक होकर कहा--' देवेश्वर ! आप प्रसन्न होइये, मैं आपको लङ्का ले चलरहा हूँ। मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप मेरे इस मनोरथ को सफल कीजिये ।'2 रावण के ऐसा कहने पर भगवान् शिव ने कहा राक्षसराज! तुम इस उत्तम लिङ्ग को अपने घर ले जा सकते हो। किन्तु तुम्हें यह स्मरण रखना है कि यदि तुम कहीं मार्ग में इस लिङ्ग को भूमि पर रख दोगे तो यह वहीं पर स्थित हो जायेगा ।'3
भगवान् शङ्कर के ऐसा करने पर रावण ने उस शिवलिङ्ग को लेकर लङ्का की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में भगवान् शिव की माया से उसे लघुशंका की इच्छा हुई। वहाँ उसने एक गोप को उस लिङ्ग को देकर लघुशंका करने लगा। किन्तु एक मुहूर्त में ही शिवलिङ्ग के भार से पीडित उस ग्वाला ने उसे पृथ्वी पर रख दिया। तभी से वह हीरकमय शिवलिङ्ग वही स्थित हो गया ४ यह लिङ्ग लोक में वैद्यनाथेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके दर्शन और पूजन से सम्पूर्ण पाप दूर हो जाते हैं।
10. नागेश्वर
दारुका वन में भगवान् शङ्कर का दशम अवतार हुआ था। यह वन पश्चिम समुद्र के तट पर स्थित है।5 पहले पश्चिम सागर के तट पर राक्षसों का एक कुल था जिसका राजा
शि० पु०, को रु० सं०--28 : 10 वही-28 : 11-12 वही--28 : 14-15 वही--28 : 16-19 . शि० पु०, श० रु० सं०--42 : 4
(४५ > (“> [> ४
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दारुक था । उसकी पत्नी दारुका पार्वती के वरदान से सदा घमण्ड में रहती थी।! जब देवताओं ने उन पर आक्रमण किया तब उन लोगों ने अपनी सम्पत्ति आदि ले जाकर समुद्र के मध्य अपना-अपना नगर बसाया | आर्व ऋषि के “शाप' के कारण वे पृथ्वी पर नहीं आ सकते थे 2
एक बार राक्षसों ने नाविकों के एक ऐसे समूह को पकड़ कर कारागार में डाल दिया,
जिसका नेता 'सुप्रिय' नामक वैश्य था। वह बड़ा सदाचारी, भस्म-रुद्राक्षधारी तथा भगवान् शिव का परम भक्त था।3 वह स्वयं तो शिव-पूजा करता ही था किन्तु साथ-साथ अन्य लोगों को भी शैव-शिक्षा दिया करता था एक समय “दारुक' राक्षस के किसी सेवक ने 'सुप्रिय' के आगे शिवजी का सुन्दर रूप देखा तो दौड़कर यह सब दिव्य चरित्र अपने स्वामी को सुनाया 5 दारुक के पूछने पर भी जब 'सुप्रिय' ने अपने ध्येय के विषय में बतलाने से अस्वीकार कर दिया तब उसने अपने साथी राक्षसों से उसका वध करने का आदेश दिया। उन राक्षसों को आया देखकर 'सुप्रिय' के नेत्र भय से कातर हो गये, वह बड़े प्रेम से शिव का चिन्तन और उनके नामों का जप करने लगा।6 ठीक उसी समय एक विवर से भगवान् शङ्कर निर्गत हुए। उनके साथ ही चार दरवाजों का एक उत्तम मन्दिर भी प्रकट हो गया। उसके मध्यभाग में अद्भुत ज्योतिर्मय शिवलिङ्ग प्रकाशित हो रहा था। उसके साथ शिव परिवार के सब लोग विद्यमान थे। भगवान् शिव के इस रूप को देखकर सुप्रिय ने उनका अभिनन्दन किया। इसके बाद भगवान् शिव ने दारुक सहित उन राक्षसों को वध कर डाला।!
शि० पु०, को० रु० सं०--29 : 2 वही--29 : 33
वही--29 : 40-43
कही-29 : 45
वही--30 : 1-2
वही--30 : 3-5
बही--30 : 13
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वहाँ ज्योतिर्लिङ्ग स्वरूप शिव 'नागेश* नाम से तथा पार्वती ' नागेश्वरी ' नाम से प्रसिद्ध हुई । वे तीनों लोकों में सम्पूर्ण कामनाओं को सदा पूर्ण करने वाले हें । जो प्रतिदिन आदरपूर्वक नागेश्वर के प्रादुर्भाव का प्रसङ्ग सुनता है, वह बुद्धिमान् मानव महापातकों का नाश करने वाले सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त कर लेता है।! नागेश्वर से प्रकट हुआ ' भूतेश्वर' नामक उपलिङ्ग मल्लिका सरस्वती के किनारे स्थित है।
11. रामेशवर
भगवान् शङ्कर का ' रामेशवर' नामक ज्योतिर्लिङ्ग दक्षिण सागर के तट पर सेतुबन्ध में स्थित है।2 शिव पुराण के अनुसार भगवान् विष्णु के रामावतार में जब रावण सीता जी को हरकर लङ्का ले गया, तब सुग्रीव के साथ वानर सेना लेकर श्रीराम समुद्र तट पर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि समुद्र को कैसे पार करेंगे और किस प्रकार रावण को जीतेंगे। उसी समय एक दिन जब वे शिव को पूजा में तल्लीन थे तब उनके समक्ष ज्योतिः स्वरूप भगवान् शिव प्रकट हुए और संग्राम में विजयी होने का वरदान उन्हें दिये 13
भगवान् श्रीराम पुनः शिवजी को स्तुति करते हुए प्रार्थना को कि--' यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो संसार को पवित्र करने और दूसरों का उपकार करने के लिए आप यहाँ निवास कीजिये ।'4 श्री राम के ऐसा कहने पर भगवान् शिव वहाँ ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में स्थित हो गये | तीनों लोकों में 'रामेशवर' के नाम से उनको प्रसिद्धि हुई।5 भगवान् रामेश्वर सदा भोग और मोक्ष देने वाले तथा भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले हैं। जो दिव्य गङ्गा जल से *रामेश्वर' शिव
. शि० पु०, को० रु० सं०--30 : 44
. शि० पु०, श० रु० सं०--42 : 4
. शि० पु०, को० रु० सं०--31 : 36, 37 . वही--31 : 39
. वही--31 : 40
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को भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह इस संसार में देवदुर्लभ समस्त भोगों का उपभोग करके अन्त में उत्तम ज्ञान पाकर निश्चय ही कैवल्य मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ॥ “रामेश्वर' से प्रकट हुआ 'गुप्तेश्वर' नाम का उपलिङ्ग भी प्रसिद्ध है 2
12. घुश्मेश
भगवान् शिव का 'घुश्मेश' नामक वारहवां ज्योतिरलिङ्गात्मक अवतार दक्षिण दिशा में देवगिर के निकट “शिवालय” नामक सरोवर में हुआ था।3 इस अवतार की कथा शिव पुराण में इस प्रकार वर्णित की गयी है--
देवगिरि नामक पर्वत के निकट भरद्वाज कुल में उत्पन्न 'सुधर्मा' नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। जब उनकी पत्नी 'सुदेहा' से कोई सन्तान न हुई तब उसके सलाह पर सुधर्मा ने उसी को छोटी बहिन 'घुष्मा' से दूसरा विवाह किया ५ ' घुष्मा' भगवान् शिव को भक्त थी। वह नित्य एक सौ एक पार्थिव शिवलिङ्ग बनाकर विधिपूर्वक पूजा करके निकटवर्ती तालाब में उनका विसर्जन करती थी।5 जब शिवजी की कृपा से 'घुष्मा' को एक सुन्दर, सौभाग्यवान और सद्गुण सम्पन्न पुत्र हुआ तब उसका सम्मान बढ़ने से 'सुदेहा' का सन्ताप और ईर्ष्याभाव बढ़ने लगा। अतः उसने निश्चय किया कि वह घुष्मा के पुत्र को मारकर अपने सन्ताप को दूर करेगी 16
एक दिन रात में 'सुदेहा' ने अपने पास सोते हुए घुष्मा के पुत्र को मारकर उसी सरोवर
. शि० पु०, को० रू० सं०--31 : 44 वही--31 : 42
, शिर पु०, श० रु० सं०--42 : 4 शि० पु०, को० रु० सं०--32 : 40 . वही--32 : 45
. वही--33 : 12, 13
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में ले जाकर फेंक दिया जहाँ घुष्मा नित्य ज्योतिर्लिङ्गों का